Monday, November 26, 2007

तसलीमा के मुद्दे पर बेपर्दा हुए ये लोग


"मीठा मीठा हप्प ,और कडवा क़डवा थू", तमाम राजनैतिक और (तथाकथित)सामाजिक संगठनों ने ओढी हुई है ये नीति. मुद्दा है तसलीमा नसरीन का, जो बंग्लादेश से निर्वासित हैं और भारत मे ( तदर्थ) शरण लिये हुए हैं.

सबसे पहले धुर वामपंथियों की खबर लेते हैं, जिनके लिये दक्षिणपंथियों की हर बात नागवार है. यदि दक्षिणपंथी कहें कि सूर्य पूर्व से निकलता है तो भी इन्हे मंज़ूर नहीं.ये भारत में धर्मनिरपेक्षता के सबसे बडे (तथाकथित)ठेकेदार हैं, हालांकि 'धर्मनिरपेक्षता' शब्द की परिभाषा भी ये समय समय पर बदलते रहते है( जब जैसी इन्हे suit करे).ये मानवाधिकार के भी बहु....त बडे समर्थक है ( नन्दीग्राम को छोडकर).तस्लीमा ने जो नारीवाद के समर्थन में कहा ,वो इन्हे मंज़ूर नही, इन्होने तो मुस्लिम कठ्मुल्लाऑं को खुश करने का लक्ष्य पाला है, क्योंकि इन्हे मुस्लिम वोटों से प्यार है.
अब इसी को लेकर पिल पडे तस्लीमा पर और दे दिया 'देश निकाला' ( इनका देश-यानि कि पश्चिम बंगाल). नीति-धर्म- न्याय- आदि-आदि- की ऐसी तैसी !!!!!.

अब आइये धुर दक्षिणपंथियों पर एक नज़र डालें. धर्मनिरपेक्षता इनके लिये गाली है- ये इसे 'छद्म' मानते हैं.अपनी
धार्मिक भावनाओं पर एक भी छींटा इन्हे बरदाश्त नहीं. पेंटर एम एफ हुसैन को बहिष्कृत इसीलिये होना पडा कि हुसैन की पेंटिंग्स को इन्होने धर्म-विरोधी माना. मुस्लिम कठ्मुल्लापन तो इन्हे सुहाता नही और जो बात मुस्लिम स्वयम्भू नेता कहे ,वह भी इन्हे मंज़ूर नहीं. अब चूंकि मुस्लिम नेता तस्लीमा के पीछे पडॆ है,तो ये तस्लीमा को नागरिकता देने की मांग करने लगे. ज़ाहिर है कि यदि ये मांग मुस्लिम नेता करते ,तो ये तस्लीमा को देश से बाहर खदेडने की बात कह रहे होते.

अब आइये त्रिशंकु कांग्रेस पर. बेपेन्दी के लोटे की तरह इधर उधर जहां चाहो लुढका लो. "जा घर देखी हंडा परात, वा घर नांचें सारी रात" वाली नीति है इनकी. वाम समर्थन पर टिके हैं ये, इसलिये वाम्पंथ की ताल सुना रहेहैं आज. इनका अपना कोई स्टेंड नहीं.

मुस्लिम लीडरान की तो हालत और भी खराब है. कांग्रेस तो यहां वहां से कुछ नीति-दर्शन चुरा भी लाती है, ये क्या करें? इनका दर्शन है "माया" (मायावती नहीं) , अब वह कहां से आती है, क्या फर्क़ पडता है.जितने मुंह, उतने फतवे. इन्हे तो बस अपनी रोटिया सेंकनी है, कही भी सिकें.

और अंत में तस्लीमा. आज़ादी का मतलब सबको गाली देना तो नही होता. कहीं भी जाओ , अरे अपने दो चार दोस्त भी तो बनाओ. ये क्या कि उत्तर गये तो उनको गाली, दक्षिण गये तो उनके गाली. और गाली भी ऐसी कि चुभे. अरे इस तरह की आज़ादी कोई भी मुल्क नहीं दे सकता.ये क्या बात हुई कि आप शरण भी मांगे और शरण लेने के बाद वहां के किसी भी वर्ग के विरुद्ध लिखना भी ना छोडें ?

हां ,इस मुद्द्दे पर सबके सब बेपर्दा हो गये . सबका मुलम्मा उतर गया. कलई खुल गयी.

Tuesday, November 20, 2007

लाल झंडे का असली रंग

पूरे विश्व के सम्मुख बेनक़ाब हो गये ये तथाकथित साम्यवादी,. पिछले कुछ हफ्तों में, नन्दीग्राम के निर्दोष नागरिकों ने जो कुछ सहा है, जो भोगा है, जिस दर्द ,पीडा के दौर से वो गुजरे है, शर्मनाक है. पर काश! कम्युनिस्ट पार्टी के नुमाइन्दे ये सब समझ पाते.

कोलकाता में फिल्म समारोह के दौरान शंतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन करने वाले कलाकारों,रंग्कर्मियों के साथ कोलकाता पुलिस ने जो वर्ताव किया, वह उन सभी लोगों के सर शर्म से झुकाने के लिये काफी है, जो कभी वाम पंथियों को एक प्रतिबद्ध समूह मानकर सम्मन देते थे.
राजनैतिक विरोधियॉ पर हिंसा का नंगा नाच , सरकार का बर्बर रवैया -ऐसा यदि देश के किसी अन्य भाग में हुआ होता, तो कम्युनिस्ट दुनिया को सर पए उठा लेते. लोकतंत्र की दुहाई देते. सर्वहारा / निर्धन /विपन्न लोगों के मानवाधिकार का प्रश्न बनाकर , सरकार को बर्खास्त करने की मांग करते.

निहत्थे गरिबों पर गोलीवर्षा क्यों ? सिर्फ इसलिये कि उन्होने तानाशाही रवैये का विरोध किया था ?

और इतने सब के बावज़ूद सीनाजोरी ?

नन्दीग्राम का जिक्र करें तो काटने दौडते हैं वामपंथी .
पश्चिम बंगाल के सभी नागरिकों की आंखे खुल जानी चाहिये. अगर वे आज चुप रहे ,तो कल उनकी बारी निश्चय ही आयेगी.

नपुंसकों की जमात की तरह चुपचाप खडे रहकर तमाशा देख रही है कांग्रेस.

किसी भी द्रृष्टिकोण से देखे, धारा 356 के तहत, सरकार को बर्खास्त करने का ये फिट मामला है.

परंतु कांगरेस को अभी भी दिक्कत है कि वह गठ बन्धन के सहयोगियों का विरोध नही कर सकती. वाह्! रे बिडम्बना .


-------हे प्रभु जी, बचालो !!!!!

Saturday, November 3, 2007

सर्वेक्षण: भूत,प्रेत,जादू,टोना,झाड-फूंक में कितना विश्वास करते हैं आप ? कृपया अपना वोट देना मत भूलें


कुछ दिनों पहले याहू पर एक चौंकाने वाला समाचार दिखा. यह समाचार एक सर्वेक्षण के नतीज़ों पर आधारित था,जिसमें कहा गया था कि 34 प्रतिशत लोग भूत प्रेत आदि में पक्का यकीन रखते हैं तथा 48 प्रतिशत की राय में पराशक्तियों का अपना महत्व है. ( देखें बगल में दिये चित्र के आंकडे)

23 प्रतिशत लोगों ने तो ये भी माना कि उन्होने कभी न कभी भूत प्रेत के दर्शन भी किये हैं.

भारत में भी भूत प्रेत ,झाड-फूंक,जादू टोना अन्धविश्वास पर यकीन करने वाले बहुतायत में ही हैं ,क्योंकि यहां सिनेमा,टीवी, पत्र -पत्रिकायें आदि सब का प्रिय विषय यही सब तो रहा है. दिन पर दिन ऐसे कार्यक्रमों की संख्या भी टीवी चैनलों पर बढ ही रही है.ऐसे मे मैने सोचा कि क्यों ना इसी विषय पर एक सर्वेक्षण (survey) जाये.

एक प्रश्नावली बनायी गयी और आपकी राय जानने के लिये इसे बगल की पट्टी पर क्लिक की सुविधाके साथ उपलब्ध कराया गया है.
कृपया बटन पर क्लिक करें और questionnaire में अपनी राय दर्ज करायें. इसमें कुल दस प्रश्न है ,जो भूत प्रेत् में विश्वास से लेकर ग़ंडा-ताबीज़ तक जैसे विषयों से सम्बन्धित हैं.

तो देर किस बात की ?

दबाइये बटन और हो जाइये शुरू ? आखिर सब जानें तो सही कि पूर्व और पश्चिम में क्या फर्क़ है?

Thursday, November 1, 2007

चले गये “चल गई” वाले शैल जी





मंगलवार को दिन में लगभग बारह बजे पंडित सुरेश नीरव का फोन आया. बातचीत पूरी होते होते उन्होने पूछा कि क्या शैल जी के बारे में कुछ सुना है ? मैने पूछा तो उन्होने बताया कि लखनऊ से फोन पर अपुष्ट सूचना प्राप्त हुई है. किंतु टीवी रेडिओ पर कहीं कुछ नहीं है. शाम होते होते मीडिया में भी खबर फैल गयी. शैल जी चले गये. 1970 के आसपास की बात रही होगी. आगरा शहर अपने चचेरे भाई की बारात में गया था. शैल जी कन्या पक्ष की ओर से समारोह में उपस्थित हुए थे . शैल जी तब तक मशहूर हो चुके थे .लोग नाम से अच्छी तरह वाक़िफ थे. बच्चों ने घेर लिया और शैल जी ने सबको खुश कर दिया. आने वाले वर्षों में शैल जी की लोकप्रियता तेजी से बढी. पहले फिल्म और फिर टीवी पर हास्य कलाकार व चरित्र अभिनेता के रूप मे. कवि सम्मेलनों के प्रमुख कवि ही नही वरन एक स्तम्भ बन चुके थे. 1997 मे मालवीय नगर दिल्ली के एक कवि सम्मेलन में भेंट हुई उसके बाद दर्शन लाभ नही मिल सका.
“चल गई” उनकी एक प्रसिद्ध हास्य कविता है. इस कविता की कवि सम्मेलनों में बहुत फरमाइश होती थी. काका हाथरसी ने उनके बारे में कुछ यूं कहा :

शैल मंच पर चढे तब मच जाता है शोर्
हास्य व्यंग्य के “शैल”यह जमते हैं घनघोर
जमते हैं घनघोर, ठहाके मारें बाबू
मंत्री संत्री लाला लाली हों बेकाबू
काका का आशीष ,विश्व में ख्याति मिलेगी
बिना चरण “चल गयी” हज़ारों वरष चलेगी,


शैल जी ने मस्ती भरा विशुद्ध हास्य भी लिखा. पैना व्यंग्य भी. एक बानगी देखिये:


हमारे देश का प्रजातंत्र
वह तंत्र है
जिसमें हर बीमारी स्वतंत्र है
दवा चलती रहे,बीमार् चलता रहे
यही मूल मंत्र है.


नेता उनका प्रिय विषय था. उन्होने लिखा -

नये नये मंत्री ने
अपने ड्राइवर से कहा
”आज कार हम चलायेंगे”
ड्राइवर बोला
”हम उतर जायेंगे
हुज़ूर!
चलाकर तो देखिये
आपकी आत्मा हिल जायेगी
ये कार है,सरकार नहीं
जो भगवान भरोसे चल जायेगी”



शैल जी के जाने से निश्चय ही हिन्दी हास्य व्यंग्य मे एक रिक्तता आयी है,जिसकी पूर्ति फिल्हाल होती नही दिखती.
मेरी विनम्र श्रद्धांजलि.



( अंतर्जाल पर कल ही एक जानकारी पूर्ण आलेख शैल जी पर मिला, दैनिक भास्कर के बिलास्पुर संस्करण्
मे. पूरा आलेख जस का तस साभार यहां प्रस्तुत् है)



शहर से शुरू हुआ था शैल का सफर

हर्ष पाण्डेय


बिलासपुर. कभी क्लास रूम में अपने चुटकुलों और मिमिक्री से साथियों को हंसी के ठहाके लगवाने वाले ‘कक्काजी’ की बातें पूरे देश में लोगों को गुदगुदाएंगी, यह स्वयं उन्हें भी पता नहीं रही होगी। हंसी के इस वृक्ष ने जीवन भर पूरे देश को हंसाया, उसके बीज बिलासपुर की गलियों में पड़े थे।
टीवी सीरियल ‘कक्काजी कहिन’ और ऐसे ही कई सीरियल व फिल्मों के अलावा मंच पर सीधे संवाद कर दर्शकों को हंसाते-गुदगुदाते रहने वाला यह फनकार लोगों को हमेशा के लिए रुलाकर बिछुड़ गया। हम चर्चा कर रहे हैं शैल चतुर्वेदी की।
शायद कम लोगों को ही पता है कि राष्ट्रीय स्तर के कवि, लेखक और हास्य अभिनेता शैल चतुर्वेदी के जीवन के चुनिंदा दिन शहर की गलियों में गुजरे हैं। शैल चतुर्वेदी का नाम सुनते ही मन में उनकी तस्वीर उभर आती है, ऊंचा डील-डौल, भारी शरीर, चेहरे पर हर वक्त मुस्कुराहट और चुटीले संवाद। अपनी कविताओं के दीवानों से ‘कक्काजी’ आज सदा के लिए बिछुड़ गए और छोड़ गए अपनी यादें।
दयालबंद की गलियों में किशोर ‘शैल’ के कुछ महत्वपूर्ण बरस बीते, जब वे गवर्नमेंट स्कूल के क्लास रूम में बैठकर अपने साथियों को चुटकुले और मिमिक्री सुनाया करते थे। 1950 के दशक में हाईस्कूल में पढ़ाई के दौरान यही वह पड़ाव था, जब उन्होंने चुटकुलों को छंद-कविताओं का रूप दिया और न जाने कब ये कविताएं देशभर में रसिक श्रोताओं के दिलोदिमाग में छा गईं। उस दौरान उनके परिवार के संपर्क में रहे शहर के वरिष्ठ साहित्यकार डा. विनय कुमार पाठक बताते हैं कि शैलजी उनके बड़े भाई डा. विमल पाठक के सीनियर स्टूडेंट थे।
श्री चतुर्वेदी के पिता गवर्नमेंट स्कूल में गणित के टीचर थे और प्रमोशन के बाद प्रिंसिपल बने। डा. पाठक पढ़ाई के सिलसिले में शैल के घर अक्सर आते-जाते थे। बचपन में श्री चतुर्वेदी अपने डील-डौल, हास्य-व्यंग्य प्रदर्शित करते चेहरे और संवादों से सहपाठियों की हंसी का कारण बनते थे। यूं कहें कि उनकी चाहत भी यही थी कि हर इंसान हमेशा हंसता रहे।
उम्र की अंतिम दहलीज तक उनका उद्देश्य दूसरों के चेहरे पर मुस्कुराहट लाना रहा है। हाईस्कूल की पढ़ाई के बाद श्री चतुर्वेदी अपने परिवार के साथ होशंगाबाद चले गए थे। समय बीता, दशकों बाद 1970 में वे बिलासपुर आए तो शहर की गलियों और अपने स्कूल को याद करना न भूले। यहां जाजोदिया भवन में कार्यक्रम के दौरान मंच पर माइक संभालते ही श्री चतुर्वेदी ने शहर में बिताए दिनों को याद करते हुए कहा था कि वे यहां की गली-गली से वाकिफ हैं। इस शहर ने उन्हें जो कुछ दिया है, उसे वे कभी नहीं भूल सकते।
वर्ष 2001 में वे बिलासपुर आए थे, तब शायद किसी को यह अंदेशा नहीं रहा होगा कि ‘कक्काजी’ का यह अंतिम प्रवास है। डा. विनय पाठक कहते हैं कि उन्होंने हास्य-कविताओं के माध्यम से हिंदी को लोकप्रिय बनाने की दिशा में भी काफी काम किए हैं।
शैलजी के परिवार के करीब रहे वरिष्ठ साहित्यकार डा. पालेश्वर शर्मा बताते हैं कि उनके पिता के साथ-साथ उनके ताऊ जगन्नाथ प्रसाद चौबे ‘वनमाली’ ने भी यहां शिक्षा के क्षेत्र में योगदान दिया था। गवर्नमेंट स्कूल में उनके सहपाठी रहे कई लोग अब इस दुनिया में नहीं हैं और जो सहपाठी या परिचित हैं, उन्हें ‘कक्काजी’ के बिछुड़ने का दुख जीवन भर सालता रहेगा।

कविताओं की लाइन लिखते-लिखते न जाने कब श्री चतुर्वेदी राज्य और फिर राष्ट्रीय स्तर के कवि बन गए। उन्होंने न सिर्फ कविताएं लिखीं, बल्कि गोपाल व्यास, काका हाथरसी और हुल्लड़ मुरादाबादी की काव्य परंपरा को विकसित करने में भी योगदान दिया। उनकी कई कृतियां प्रकाशित हुईं, जिनमें से एक ‘चल गई’ पूरी दुनिया में खूब चली। इसके लिए उन्हें ‘काका हाथरसी सम्मान’ और ‘ठिठोली पुरस्कार’ भी मिल चुका है।

Wednesday, October 24, 2007

काव्य सन्ध्या Kavya Sandhya

गत वर्ष की भांति इस वर्ष भी इंटर्नेशनल मेनेजमेंट इंस्टीटुयूट ( IMI ) नई दिल्ली में छात्रॉं के प्रयास से एक कवि सम्मेलन आयोजित किया गया. क़वि सम्मेलन की रिकौर्डिंग का प्रथम भाग यहां प्रस्तुत है. प्रयोग के तौर पर मैने यह रिकौर्डिंग पहले अपने नये ब्लोग बृज गोकुलम पर डाली थी ( यहां मै आर सी मिश्र एवम संजय बैंगाणी का धन्यवाद भी ज्ञापित करना चाहूंगा ) .जब प्रयोग सफल लगा तब अपने इस ब्लोग पर प्रसारित करने की हिम्मत हुई. क़ुछ दिनों मे इस कवि सम्मेलन का दूसरा भाग भी उपलब्ध होगा.आनन्द लीजिये.
( इस भाग में आठ फाइल्स हैं, एक एक करके खोलते जाइये और काव्य सन्ध्या का लुत्फ उठाइये )
इस कवि सम्मेलन में भाग लेने वाले कवि : सर्वश्री पंडित सुरेश नीरव ( संचालक ), अरविन्द पथिक, डा.अंजू जैन,अरविन्द चतुर्वेदी, प्रभाकिरण जैन,महेन्द्र शर्मा .







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Thursday, October 18, 2007

'एंटर एट योर ओन रिस्क'


उम्दा लकडी के केबिन में प्रवेश के लिये अपार्दर्शी शीशे का दरवाजा.दरवाजे के बीचोबीच लगी एक तख्ती ,जिस पर लिखी हुई रहस्यमयी सी इबारत- " enter at your own risk.Everything is going wrong today".( अर्थात अन्दर आना जोखिम भरा हो सकता है,आज सब कुछ गलत सलत हो रहा है ) देखने वाला एक बार तो चौंक ही जाय. अगर आपने यह तख्ती पढने के बाद भी केबिन में जाने की हिम्मत की तो दरवाजा खोलते ही सामने की दीवार पर एक और तख्ती "come on in, everything else has gone wrong". ( अन्दर आइये, बाकी सब कुछ गडबड है ).

जी हां, यह केबिन था डा. राजेन्द्र कुमार पचौरी का. हैदराबाद स्थित एड्मिनिस्ट्रेटिव स्टाफ कौलेज औफ इंडिया ( ASCI) में डा. पचौरी senior faculty member थे .शायद 1980 तक. वही आर.के.पचौरी, जिनके नेट्रत्व में चलने वाले अंतरऋअष्ट्रीय संस्थान IPCC को इस वर्ष के नोबल पुरुस्कार के लिये चुना गया है.

1977 में मैं आई आई टी बम्बई में रिसर्च स्कौलर था. Hyderabad के Administrative Staff College of India जैसी प्रसिद्ध संस्था से Project Associate पद हेतु प्रस्ताव आया तो तुरंत तैयार हो गया. मई 1977 में जोइन किया. पहले ही दिन अपने कार्यालय से बाहर निकला तो बगल के केबिन पर निगाह गयी जहां वो तख्ती लगी हुई ठीक जिसका मैने शुरु में जिक्र किया .मैं प्रोजेक्ट एसोसिअट था, वह भी नया नया. हिम्मत नही हुई . बाद में मेरे अन्य सहयोगी भारत भूषण ( जो आगे चल कर Hindustan Times के सम्पादक पद पर भी पहुंचे) ने पचौरी साहब से परिचय कराया. मै Economics Area था, जबकि भारत भूषन Opeartions Management एरिया मे, जिसके प्रमुख थे डा. पचौरी.

फिर तो रोज़ का मिलना . शायद 1980 तक, जब तक डा. पचौरी वहां रहे. फिर अचानक पता लगा कि टाटा समूह ने एक कोष स्थापित करके दिल्ली में नया संस्थान खोला है " टाटा एनर्जी रिसर्च इंस्टिटयूट" ( जो बाद में TERI के नाम से मशहूर हुआ. बाद में शायद टाटा के हाथ खींच लेने के कारण ,TERI का नाम बदलकर The Energy Research Institute हो गया.

1977 से आजतक, डा. पचौरी की वेश भूषा, चाल ढाल में कोई परिवर्तन नहीं. अथक लगन. नितांत स्पष्ट ध्येय, लक्ष्य एकदम साफ. ऊर्जा सम्बन्धी लगभग सभी सरकारी फैसलों की पृष्ठभूमि में डा. पचौरी की सोच व लौबीयिंग. पर्यावरण से जुडे हर मुदे पर सबसे पहली राय डा. पचौरी की ही होती आयी है,पिछले तीस वर्षो में. मैने अपना पहला शोध पत्र " the substitution of energy and energy inputs in manufacturing industries" भी डा. पचौरी से प्रेरित होकर ही लिखा था 1978 में. हालांकि बाद में मैं commercial research की तरफ मुड गया और एक advertising agency में market research division में कार्य सम्हाल लिया.

डा. पचौरी ने अपनी लगन, मेहनत से विश्व एवं भारत मे नाम कमाया है. ईश्वर करें वह और सफलता अर्जित करते रहें तथा देश का नाम रोशन करें.

Tuesday, October 9, 2007

सौ करोड की रैली और कांशीराम्


कल 9 अक्टूबर बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशीराम की पुण्यतिथि के अवसर पर बसपा की ओर से एक विशाल रैली लख्ननऊ में आयोजित होने जा रही है. बहन मायावति ने इसे 'सावधान रहो, आगे बढ़ो' रैली का नाम दिया है. इस रैली पर सौ करोड रु. खर्च होने का अनुमान है. ऐसा भी बताया गया है कि इस अवसर पर कांशीराम के नाम पर लगभग 4000 करोड रु. की परियोजनाओं की घोषणा की जायेगी.
समाज की बेहतरी के लिये प्रस्तावित सभी परियोजनाओं का स्वागत है. किंतु मायावती की मंशा कांशीराम को भीम राव अम्बेडकर के बराबर खडा करने की अधिक लगती है. सावधान रहो-पर किससे ? अब सरकार आपकी सोशल इंजीनीयरिंग के चलते आ गयी. जिससे आपको सबसे अधिक खतरा था- तिलक तराजू और तलवार-वे भी आपके साथ आ गये ( कब तक, ये अलग बात है).
आगे बढो- मतलब यूपी के आगे. हां ये सपना तो ठीक है. परंतु इसके लिये सौ करोड रु. का खर्च ?

यदि यही सौ करोड रु. रैली पर खर्च न करके उन परिवारों के लिये खर्च किये जाते जो, राजनीति से तो कही नहीं ज़ुडे -परंतु जिनके घर कब चूल्हा जलेगा कब नही-उन्हे भी पता नहीं. इस रैली के बलबूते मायावती जी कितनी 'आगे बढेंगी' कहना अभी तो मुश्किल है, परंतु, यदि कुछ अत्यंत निर्धन परिवरों की पहचान करके ये सौ करोड उनमे बांटे जाते तो वे परिवार निश्चित्त ही आगे बढ जाते.शायद कांशीराम जी की आत्मा को भी ज्यादा शांति प्राप्त होती.

Sunday, October 7, 2007

क्या चिट्ठाकारी डायरी लेखन है ?

पिछले रविवार को हिन्द युग्म के शैलेश भाई से भेंट हुई. वे हिन्द युग्म की पुरस्कार योजना में पुरस्कृत कवियों को देने के लिये मेरे कविता संग्रह की प्रतियां लेने आये थे. ( यूं मज़ाक में इसे चिट्ठाकर मिलन भी कह सकते हैं). बात चीत हिन्द युग्म के प्रयासों को लेकर शुरू हुई. शैलेश भाई ने आगे की कुछ योजनाओं की भी बात की. मेरी राय में शैलेश में गज़ब का उत्साह भी है और अद्भुत जीवट भी. मेरा मानना है कि यदि इस तरह के प्रतिबद्ध लोग हिन्दी को मिलते रहें तो न केवल भाषा का बल्कि, अंतर्जाल पर भी हिन्दी का भविष्य उज्ज्वल है.

बातचीत के क्रम मे हिन्दी चिट्ठाकारों के बीच समय समय पर उठते विवादों , aggregators की भूमिका, नये एग्ग्रीगटर्स पर भी चर्चा हुई. विवादों पर मेरी राय थी कि इसमें दोनों ही पक्ष दोषी हैं . मैने शैलेश को बताया कि मेरी राय में चिट्ठाकारी कुछ कुछ डायरी लेखन की तरह ही है. बस फर्क़ ये है कि डायरी हम आम तौर पर दूसरों को दिखाने के लिये नही लिखते. ( क्या वाकई ?- यदि ऐसा होता तो डायरी लेखन में भी प्रतिष्ठित व्यक्ति झूठ की मिलावट नहीं करते. हालांकि यह अलग विवाद का विषय है). जब कि blogging is like leaving your personal diary for public exposure. जिस तरह डायरी में हम अपने निजी विचार व्यक्त करते है ,बिना किसी प्रतिबन्ध के, उसी प्रकार ब्लौग पर भी हम अप्ने विचार सार्वजनिक रूप से व्यक्त करते हैं.डायरी और चिट्ठे में पहला अंतर तो यह है कि यदि हम पाखंड का सहारा न लेकर ईमानदारी से अपनी मन की सोच को ब्लोग पर व्यक्त करते है, तो यह लगभग डायरी लेखन ही हुआ. दूसरा अंतर तात्कालिकता को लेकर है. डायरी लिखने के तुरंत बाद सार्वजनिक नही होती ( या की जाती), जबकि ब्लौग पर हम जो भी लिखते है, चाहते भी हैं कि यह तुरंत लोगों की नज़र में भी आ जाये ( यहीं पर एग्ग्रेगेटर्स् की भूमिका है) ऐसे ब्लौग्गर कम ही होंगे जो ब्लौग पर अपनी पोस्ट सिर्फ स्वांत: सुखाय ही लिखते हैं. ( शायद ऐसे ही ब्लौग्गर को किसी एग्ग्रीगटर पर पंजीकरण की आवश्यकता नहीं होती होगी).

शैलेश भाई को में अपनी बात समझा रहा था कि किसी ब्लौग्गर को किसी अन्य ब्लौग्गर की पोस्ट पर undully harsh टिप्पणी करने से बचना चाहिये. प्रतिक्रिया देना एक बात है, टांग खिंचाई ( व्यंग की भाषा मे, भी ठीक समझी जा सकती है), परंतु, अनावश्यक विवाद से बचना ही श्रेयस्कर है. कम से कम में तो ये ही मानता हूं.

मैं यह कदापि नहीं कह रहा कि हमें ब्लौग सिर्फ पढना चाहिये और टिप्पण से बचना चाहिये. ( नही, बल्कि मै तो यहां सारथी जी से पूर्ण सहमत हूं कि अधिक से अधिक टिप्पणी देना भी ब्लोग्गिंग मुख्य उद्देश्य है.) अनावश्यक , सिर्फ विवाद पैदा करने की दृष्टि से की गयी वे टिप्पणियां जिनमें भाषा की मर्यादा रेखा भी लांघ दी जाती है, को में अनुचित मानता हूं.
हालांकि शैलेश भारतवासी के साथ हुई बातचीत में कुछ विशॆष विवादों तथा चिट्ठों का जिक्र भी आया था, परंतु वह यहां जान बूझकर नहीं दिया गया.

मैं बहुत अनुभवी चिट्ठाकर तो हूं नही, अत: बेहतर हो यदि कुछ अनुभवी व जानकार चिट्ठाकर इस पर प्रकाश डालें.

कम से कम में तो इसे अंन्यथा नहीं लूंगा.

Tuesday, September 25, 2007

तुम हो पहरेदार चमन के -उदय प्रताप सिंह्







राजनीति और साहित्य दो अलग अलग धारायें है. बहुत कम लोग ही मुझे मिले हैं जिनका दोनों से ही सम्बन्ध है. प्रो. उदय प्रताप सिंह एक ऐसी ही शख्सियत हैं समाज्वादी पार्टी के सांसद है. लोकसभा व राज्यसभा दोनो में रहे हैं. पिछले 18-19 वर्षों से सक्रिय राजनीति में हैं.
प्रो. उदय प्रताप सिंह का कविता से पुराना सम्बन्ध है. अध्यापक रहे हैं.पिछले 40-50 वर्षों से लगातार लिखते आ रहे हैं.मेरी प्रोफेसर उदय प्रताप जी से जान-पहचान लग्भग 17 वर्षों से है. फिलहाल मैं राजनीति में सक्रिय नहीं हूं फिर भी साहित्यिक,सांसकृतिक कार्यक्रमों में मुलाक़ात हो ही जाती है.
पिछले 11 अगस्त को मेरी संस्था " अक्ष" की ओर से एक साहित्यिक आयोजन था,जिसमें पुस्तक के लोकार्पण के अतिरिक्त लघु कवि सम्मेलन भी था. उदय प्रताप् जी आमंत्रित थे.उन्होने देशभक्ति से ओत-प्रोत एक रचना पढी जिसमे उन्होने चन्द्र शेखर आज़ाद की जनम्स्थली बदरका को प्रणाम कहा.मेरे विशेष अनुरोध पर उन्होने एक रचना पढी, जिसका सम्बन्ध लोकतंत्र की पहरेदारी से है. लोकतंत्र में जनता का एक सजग् प्रहरी के रूप में जो दायित्व है,उसी को रेखांकित करती है ये कविता.
उदय प्रताप सिंह जी की अनुमति लेकर यहां यह कविता संक्षिप्त रूप में प्रस्तुत है:


ऐसे नहीं जागकर बैठो तुम हो पहरेदार चमन के ,
चिंता क्या है सोने दो यदि सोते हैं सरदार चमन के.
वैसे भी ये बड़े लोग हैं, अक्सर धूप चढ़े जगते हैं
व्यवहारों से कहीं अधिक तस्वीरों में अच्छे लगते हैं
इनका है इतिहास गवाही जैसे सोये वैसे जागे
इनके स्वार्थ सचिव चलते हैं नई सुबह के रथ के आगे
माना कल तक तुम सोये थे लेकिन ये तो जाग रहे थे
फिर भी कहां चले जाते थे ,जाने सब उपहार चमन के
ऐसे नहीं जागकर बैठो.......


जिनको आदत है सोने की उपवन की अनुकूल हवा में
उनका अस्थिशेष भी उड जाता है बनकर धूल हवा में
लेकिन जो संघर्षों का सुख सिरहाने रखकर सोते हैं
युग के अंगडाई लेने पर वे ही पैगम्बर होते हैं
जो अपने को बीज बनाकर मिट्टी में मिलना सीखे हैं
सदियों तक उनके सांचे में ढ्लते हैं व्यवहार चमन के
ऐसे नहीं जागकर बैठो......


यह आवश्यक नहीं कि कल भी होगी ऐसी बात चमन में
ऐन बहारों में ठहरी है कांटों की बारात चमन में
कल की आने वाली कलियां पिछले खाते जमा करेंगी
तब इन कागज़ के फूलों की गलती कैसे क्षमा करेंगी
उस पर मेरी क़लम गवाही बिना सत्य के कुछ ना कहेगी
केवल बातों के सिक्के से चलते थे व्यापार चमन के
ऐसे नहीं जागकर बैठो...

( समारोह की पूरी रपट अलग से एक पोस्ट में दी जायेगी)

चित्र 1 : सर्व श्री पंडित सुरेश नीरव( मुख्य कौपी सम्पादक,कादम्बिनि पत्रिका ),भरत चतुर्वेदी, उदय प्रताप सिंह , अरविन्द चतुर्वेदी
चित्र 2:उदय प्रताप जी द्वारा डा. वालिया ( वित्त मंत्री, दिल्ली सरकार) का स्वागत ,साथ हैं उ.प्र.सरकार के मंत्री यश्वंत सिंह
चित्र 3 : मंच पर श्री उदय प्रताप सिंहका स्वागत केशव गान्धी द्वारा
चित्र 4: मंच पर पंडित सुरेश नीरव( मुख्य कौपी सम्पादक,कादम्बिनि पत्रिका ),भरत चतुर्वेदी, उदय प्रताप सिंह , अरविन्द चतुर्वेदी

Monday, September 24, 2007

शादी से पहले कितने अफेयर थे आपके ?

कल रात INDIA TV पर 'आप की अदालत' देख रहा था. कार्यक्रम में हास्य कलाकार राजू श्रीवास्तव की पेशी के अंतिम दौर में आमंत्रित श्रोताओं के प्रश्न पूछने की बारी आई. एक 10 वर्ष का बच्चा खड़ा हुआ .प्रश्न था कि " शादी से पहले आप के कितने अफेयर रहे थे ?"

में सन्न रह गया. इसलिये कि प्रश्न पूछने वाले की उम्र मात्र 10 वर्ष थी.
दस वर्ष की उम्र और ऐसा प्रश्न ?
(कंटेंट बिल का विरोध करने वालो .देख लो )
कम से कम कार्यक्रम के एडिटर को तो सोचना चाहिये. कोई लाइव प्रोगराम तो था नही.
राजू श्रीवास्तव भी भोंचक्क. यह क्या प्रश्न आया ,और आया भी तो किससे ?
उत्तर दिया- " यह बच्चो का प्रश्न नही है.जरूर इसे किसी और ने पुछ्वाया है ". फिर भी बता दिया कि जिससे मेरा अफेयर था ,उसी से शादी भी हो गयी.

यह मैने इसलिये लिखा है कि इससे आज कल के बच्चों की मानसिकता पता चलती है.

अभी मैने कुछ दिन पहले एक पोस्ट लिखी थी कि "टी वी देखकर समय से पहले बड़े हो रहे हैं बच्चे".
इस पोस्ट पर टिप्पणी में समीर लाल, नीरज दीवान ,सुरेश चिपलुंकर ,देवी एवं नीशू ने भी इस विषय पर चिंता जताई थी. मैं समझता हूं कि वर्तमान युग मैं हमारे समाज की बडी समस्याओं में से एक है यह - कि कैसे सामना करें हम अपनी संस्कृति पर होने वाले आक्रमणों का ?

कभी कभी हम बहुत खुश होते हैं कि हमारे बच्चे बहुत होशियार हैं .यह पीढ़ी पिछली पीढी से चार कदम आगे है. किंतु हर जगह आगे ही रहे ,इसमें खतरे हैं. हमें समय रहते चेत् जाना चाहिये .यही हमारे बच्चों के लिये बेहतर है.

Sunday, September 23, 2007

मिनि ब्लौगर( अचानक) मीट: पब्लिक के बीच में

दिल्ली और अनेक स्थानों पर ब्लौगर मीट अक्सर चर्चा का विषय बनती रही है. इनमे से एक ( बड़ी मीट –दिल्ली –जुलाई 07) पर मैने भी एक (अ)रपट लिखी थी. मुझे नहीं पता कि ब्लौगर मीट में अधिकतम हिस्सेदारी का रिकार्ड क्या है.शायद जुलाई वाली मीट ने ही रिकौर्ड बनाय था. अब छोटी सी छोटी मीट का रिकार्ड पूछने की आवश्यकता नही. जाहिर है कि न्यूनतम संख्या दो ही होगी. ( य़दि किसी ब्लौगर मीट में दो से भी कम ब्लौगर आयें , इस का मतलब है कि ऐसी रपट करने वाला खुद फंतासी के अधार पर ही रपट बना रहा होगा ). जिस मीट का मॅं यहां जिक्र करने जा रहा हूं, वह सम्पन्न हुई 20 सितम्बर 07 को, दिल्ली के द्वारका क्षेत्र में, और इस मीट में सिर्फ दो ही ब्लौगर शामिल हुए. ( अभी मात्र एक माह पूर्व हमारे एक ब्लौगर साथी ने दो ब्लौगरों की एक काल्पनिक मुलाक़ात् पर एक धांसू व्यब्ग्य से भरपूर् पोस्ट भी लिखी थी.,)फिर भी मैं यह रिपोर्ट लिख रहा हूं. द्वारका ,नई दिल्ली के महाराष्ट्र मित्र मंडल द्वारा प्रत्येक वर्ष गणेशोत्सव मनाया जाता रहा है.इस वर्ष भी 16 सितम्बर से 23 सित्रम्बर तक यह उत्सव मनाया गया. इस उत्सव के अंतर्गत 20 सितम्बर को एक कवि सम्मेलन आयोजित किया गया था तथा इस कार्यक्रम की सन्योजक थीं डा. कीर्ति काले. अब प्रश्न है कि इससे ब्लौगरों को क्या ? हां मैं उसी मीट पर आ रहा हूं . हुआ यूं कि कीर्ति जी ने हिन्दी अकदमी के सहयोग से आयोजित इस कवि सम्मेलन के लिये कवियों को आमंत्रित किया था, जिसमे एक हिन्दी ब्लौगर सुनीता (चोटिया) शन्नू कवि के रूप में शामिल थी. वहीं दूसरी ओर स्वतंत्र रूप से मुझे ( अरविन्द चतुर्वेदी) भी कविता पाठ हेतु आमंत्रित कर रखा था. निर्धारित समय पर जब सब कवि उपस्थित हुए तो इसमें दो हिन्दी ब्लौगर भी आमने-सामने हुए. पहले मंच के बाहर, फिर मंच पर , और फिर रात लग्भग 12 बजे भोजन पर यह मीट सम्पन्न हुई. हां ब्लौगरी पर चर्चा नही हुई पर कविता पर जरूर् हुई. यह मिनि मीट ‘अचानक’ इसलिये कही गयी क्यों कि दोनो ही ब्लौगरों को पहले से पता नही था कि मीट होने वाली है. क़वि सम्मेलन में मैने हास्य रचनायें प्रस्तुत की तथा सुनीता जी ने ‘कन्यादान’ विषय पर एक भावुक रचना प्रस्तुत की. मीट के अवसर पर दोनो ब्लौगरों के ( अ-ब्लौगर) जीवन साथी भी उपस्थित रहे. लो हो गयी मीट की एक और रपट.

करुणानिधि या घृणा निधि


तमिल लिपि में क तथा ग के लिये एक ही अक्षर इस्तेमाल किया जाता है.उसी तरह ख तथा घ के लिये भी एक ही अक्षर है. जब उच्चारण करते है तो क, ख ग, अथवा घ में विशेष फर्क़ नहीं होता. इस के आधार पर ‘करुणा’ तथा ‘घृणा’ तमिल भाषा बोलने व लिखने वाले के लिये शब्दिक रूप में एक दूसरे से बहुत दूर नहीं कहे जा सकते.
तमिल नाड के मुख्यमंत्री एम घृणा निधि ने पिछले सप्ताह भग्वान राम के प्रति जो उद्गार व्यक्त किये है, वे यथा नाम तथा गुण ही सिद्ध करते हैं. यानि कि वह करुणा के निधि न होकर घृणा के ही निधि ( खज़ाना) हैं.
गलत स्त्रोत बताकर तथा ‘बाल्मिकि रामायण” से गलत उद्धरण देकर आखिरकार यह शख्स क्या सिद्ध करना चाहता है ? राम का सम्पूर्ण चरित इस अधम व्यक्ति के लिये एक कल्पना मात्र हैं ,जिसका कोई प्रमाण नही है. यहां तक ही होता गनीमत थी. यह श्ख्स कहता है कि राम सुरापान करते थे, सीता अपने आप रावण के साथ गयी क्यों कि वह उसे चाहती थी.
जो राम को मानना चाहे माने, न मानना चाहे ना माने. हमें इसॅसॆ कोई गुरेज़ नहीं. किंतु हैरानी है कि लोकतंत्रिक पद्धति से चुने गये इस व्यक्ति को अन्य ( उसके लिये-उत्तर भारत के लोग, राम भक्त, आस्थावान्, प्रार्थना रत अथवा रावण- वध करने वाले ) किसी की आस्था, विश्वास पर चोट करने का हक़ किसने दिया.
क्या मुख्य मंत्री किसी भी कनून से ऊपर है? इस घृणा की निधि द्वार दिये गये बयान Criminal Procedure Code (Cr PC की धारा 156(3) व Indian Penal Code की धारा 295 ए ( किसी अन्य की धार्मिक भावनाओं को जान-बूझ कर आहत करना) तथा धार व 298 ( धामिक भावनायें को चोटृ पहुंचाने सम्बन्धी बयान देना)का उल्लंघन है.
इस व्यक्ति व इसकी पार्टी का एक ही उद्देश्य है कि- उत्तर भारतीयॉ से घृणा, राम के नाम से घृणा, और हा इस घृणाको आगे फैलाने का प्रयास.
राम सेतु के मुद्दे पर जिस प्रकार करुणानिधि, टी आर बालू, तथा द्रमुक सरकार के अन्य मंत्री आर्कट वीरासामी ने जिस प्रकार के बयान दिये हैं, उससे तो ये लगता है कि कांग्रेस ने रामसेतु की सुपारी DMK को दे दी है.

गालियों का दुरुस्त जबाब

मैं तो समझता था कि ईर्ष्या ,डाह अथवा जलन एक भारतीय गुण ही है. परंतु भारत के आगे निकलकर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न व्यवसायों से जुडे लोगों के विचार सुनकर या पढ़कर आश्चर्य होता है.कुछ दिन पूर्व मैने अपनी एक पोस्ट पर टिप्पणी में लिखा था कि सचिन तेन्दुलकर की सफलता से गोरी चमड़ी (मेरा आशय क्रिकेट खेलने वाले देशों से ही है) के लोग थोडा जलते हैं. आज INDIA TV नामक CHANNEL पर एक 'विशेष' कार्यक्रम में आस्ट्रेलियाई खिलाडियों द्वारा भारतीय क्रिकेट टीम के उपहास एवं वरिष्ठ खिलाडियों - विशेषकर Sachin Tendulakar व Saurav Ganguli को चुन चुन कर दी गयी गालियां सुनकर बडा ताज्जुब हुआ. अफसोस भी क्यों कि क्रिकेट को एक Gentelman's game माना जाता रहा है. जब BCCI के अधिकारियों तक बात पहुंची तो उसकी तरफ से राजीव शुक्ल ने बचाव में एक बयान जारी कर दिया. BCCI की ओर से जारी बयान तो मात्र एक औपचारिकता ही है.
किंतु आस्ट्रेल्याई मौखिक गुंडा गर्दी का सबसे माक़ूल जबाब भारतीय 20-20 टीम ने दिया. कंगारू यह कहते नहीं थक रहे थे कि भारतीय टीम को धूल चटा देंगे, मसल कर रख देंगे ( they will make a mincemeat of indian team),आदि आदि. इस का जबाब खेल के मैदान में ही दिया जाना सबसे उचित था .
धोनी व भारतीय टीम ने ऐसी टीम को चारों खाने चित्त किया जो इस पूरे टूर्नामेंट की सबसे फेवरिट टीम बतायी जा रही थी तथा जिसका सट्टा बज़ार में भी सबसे कम भाव था. ज़िस भारतीय टीम को वे मसलने का सपना पाले थे , उसने उनके सही मानों में छक्के छुडाकर फाइनल् में प्रवेश किया.

भारतीय टीम इस अद्भुत विजय हेतु बधाई की पात्र तो है ही, इस बात के लिये विशॆष् बधाई की हक़्दार है कि आस्ट्रेलियाई घमंड को चूर किया ( वैसे कुछ दिन पूर्व ही ज़िम्बाब्वे की टीम उन्हें हराके चेतावनी दे गयी थी). परंतु रस्सी के जल जाने पर भी जो एंठन बची थी ,आज उसे निकाल कर भारतीय टीम ने कमाल का काम किया है.

हां फाइनल में जो होगा ( पाकिस्तान के साथ) देख लेंगे, परंतु शेर बनने वाले को बिल्ली बनाकर भेजना जरूरी था.

फिर कहना चाहता हूं- चक दे INDIA.

Friday, September 21, 2007

ओफिस (कार्यालय )में कैसे सोएं ?




कुछ लोग अपने कार्यालय में काम करने ही जाते है. कुछ लोग मात्र टाइमपास के लिये. कुछ कार्यालय को जनसम्पर्क करने हेतु एक बेहतर विकल्प के रूप में लेते हैं.कुछ लोग सब कुछ चाहते हैं मगर थोडा थोड़ा.

परंतु सचाई यह है कि , यदि अवसर प्राप्त हो तो, अधिकांश व्यक्ति ( दोनो पुरुष कर्मचारी व महिला कर्मचारी ) कुछ देर के लिये ही सही, काम के बीच में कुछ पल आनंद ,शांति के लिये निकालने से गुरेज़ नही करेंगे . .
मेरे एक मित्र है डा. करन भाटिया, रुड़की में हाइड्रोलोजी संस्थान में वैज्ञानिक हैं. आई आई टी बम्बई में ( 1977) में होस्टल में हम साथ साथ थे. अब मुलाकातें बहुत कम होती हैं ( पिछले 15 वर्ष में शायद दो ही बार मिले हैं). ई-मेल से सम्पर्क बना रहता है.
पिछले सप्ताह मुझे भाटिया जी ने प्यारे से कार्टूंस भेजे. वही सबके साथ share कर रहा हूं.

Tuesday, September 18, 2007

जन्मतिथि एवम पुण्य तिथि पर काका हाथरसी को श्रद्धांजलि


आज हास्य रस के पुरोधा कवि श्री काका हाथरसी का जन्म दिन भी है और पुण्य तिथि भी. आज के दिन सन 1906 में काका का जन्म हुआ और सन 1995 में आज के ही दिन काका परलोक सिधार गये थे . कम लोगों को उनका असली नाम पता है- वह प्रभु दयाल गर्ग के नाम से जाने जाते थे ,परंतु काका नाम अधिक मशहूर हुआ. हास्य उनके जीवन का अभिन्न अंग था,उनकी जीवन शैली थी. वह हास्य को भरपूर जीते थे.

उनके इस सिद्धांत को रेखांकित करती कविता है-

डाक्टर वैद्य बता रहे ,कुदरत का कानून
जितना हंसता आदमी, उतना बढ़ता खून
उतना बढ़ता खून, हास्य मेँ की कंजूसी
सुन्दर सूरत मूरत पर छाई मनहूसी
कंह काका कवि,हास्य व्यंग्य जो पीते डट के,
रहती सदा बहार ,बुढापा पास न फटके.



काका की जनप्रिय पुस्तकों में -काका के कारतूस, काका की फुलझडियां, का का की कचहरी ,काक्दूत, काका के प्रहसन महामूर्ख सम्मेलन, चकल्ल्स,काका की चौपाल , आदि दर्जनों पुस्तकें है जिनके दर्जनों संस्करण बिक चुके हैं.

काका ने विशुद्ध हास्य लिखा, गुद्गुदाने वाले व्यंग्य को कविता में पिरोया.
उनकी 'विद्यार्थी' की परिभाषा इस प्रकार है


पूज्य पिता की नाक में डाले रहो नकेल
रेग्युलर होते रहो तीन साल तक फेल
तीन साल तक फेल. भाग्य चमकाता ज़ीरो
बहुत शीघ्र बन जाओगे कालेज के हीरो
कह काका कविराय ,वही सच्चा विद्यार्थी
जो निकाल कर दिखला दे विद्या की अर्थी.

काका की कलम से कोई विषय अछूता नही रहा. रिश्वत पर उन्होने ये लिखा--

रिश्वत रानी धन्य तू तेरे अगणित नाम
हक्-पानी उपहार औ बख्शीश ,घूस इनाम
बख्शीश ,घूस इनाम ,भेंट, नज़राना, पगडी
तेरे कारण खाऊ मल की इनकम तगडी
कह काका कविराय ,दौर दौरा दिन दूना
जहां नहीं तू देवी,वह महकमा है सूना.

मेरी हार्दिक श्रद्धांजलि.

Monday, September 17, 2007

टी वी देखकर समय से पहले बड़े हो रहे हैं बच्चे


एक टीवी कार्यक्रम मे ग्यारह वर्षीया बच्ची ने मोहक नृत्य प्रस्तुत किया . विशेषज्ञ पैनल सदस्य ने आलोचना के बाद कहा कि अब एक धुन बजेगी, धुन वाला फिल्मी गाना पहचान कर उस पर नृत्य करके दिखाना होगा. फिर यादों की बारात फिल्म का एक लोक्प्रिय गाना बजाया गया. बच्ची उसे नहीं पहचान पाई. एंकर महिला ने संगीतज्ञों से कहा "कोई ऐसा गाना बजायॆ, जिससे बच्चे रिलेट कर सकें तथा आसानी से पहचान कर सकें". फ़िर गाने की धुन बजी ' भीगे होंठ तेरे प्यासा मन मेरा, लगे अभ्र सा मुझे तन तेरा, कभी मेरे साथ एक रात गुजार,...'. झट से बच्चे ने गाना पहचान लिया.

ये है आजकल की नई पीढी.

उसी कार्यक्रम में बच्चों के मुख से गाये जाने वाले और गाने कैसे होंगे, सहज ही अन्दाज़ा लगाया जा सकता है.
कुछ समय पहले मैने 'अमूल मैचो अंडर वीयर' के विज्ञापन पर एक पोस्ट लिखकर उसे अश्लील की संज्ञा दी थी.मेरे एक प्रोफेसर मित्र ने उस समय यही कहा था,जो इस पोस्ट का शीर्षक है-टी वी देखकर समय से पहले बड़े हो रहे हैं बच्चे .
अभी पूर्व भारत के एक नगर में पुलिस ने कुछ सार्वजनिक पार्कॉं में छापे मार कर अश्लील हरकतें करते हुए कुछ नाबालिग बच्चों को पकडा था.

ये है आजकल की नई पीढी.

स्कूलों में आये दिन होने वाली सांस्कृतिक कार्यक्रमों में ' चोली के पीछे ...से लेकर,कांटा लगा ..जैसे लोकप्रिय गानों पर नृत्य करते आठवर्ष से लेकर बारह वर्ष की आयु वाले बच्चे मिल जायेंगे. इन्हे ये गाने गाने की प्रेरणा भी अपने शिक्षकों से ही मिली होगी ये भी सच है.
हिन्दी के अनेक चैनलों पर इस प्रकार के कार्यक्रम हैं .बूगी वूगी, छोटे उस्ताद, होन्हार, आदि कार्यक्रम मूलत: बच्चों में छिपे टेलेंट को बाहर लाने के लिये भले हों, किंतु क्या इन्हे अनियंत्रित करके हम बच्चों के असमय जवान नहीं बना रहे ?
दोष किसका है? टेलीविजन का ? या हम सबका ?

Thursday, September 13, 2007

वो इत्र लगाकर ,इस तरह अकड़ता क्यूं है ?

ख्वाब कांटों की तरह आंख में गड़ता क्यूं है ?
तमाम चेहरों से चिपकी हुई जड़ता क्यूं है ?


हमें मालूम है खुशबू कहां से लाया है .
वो इत्र लगाकर ,इस तरह अकड़ता क्यूं है ?

कि जिसके पढ़ने से नफरत में डूब जाता है,
तू ऐसे मज़हबों की पुस्तकें पढ़ता क्यूं है ?

बिखर क्यूं जाता है, हर बार इकट्ठा होकर ,
तुम्हारा कुनबा बार बार उजड़ता क्यूं है ?

ये सच और झूठ का झगड़ा नहीं मिटने वाला,
तू ख्वाम्खां के सवालात में पड़ता क्यूं है ?

हरेक शख्स पे उंगली उठाई है तुमने ,
किसी ने तुझ पे उठाई तो बिगड़ता क्यूं है ?

साथ खुशियों में निभाया है मेरा आज तलक ,
आज जब गम का ये साया है, बिछड़ता क्यूं है ?

Wednesday, September 12, 2007

सचिन तेन्दुलकर्: दुर्भाग्य का शिकार या किसी साजिश का ?


शुक्र है कि क्रिकेट मैच अब वीडियो कैमरों के साये में ही होते है. कहीं कोई भी चूक हुई तो तुरंत फुरंत पकड में आ जाती है. यही बात मैचों की अम्पायरिंग पर भी लागू होती है.

अम्पायर जब गलती कर देता है, तो कम से कम उसे स्वयम पता होता है कि गल्ती हुई है,भले ही अन्य लोगों ने वो गलती नोटिस भी न की हो.
खिलाडी को भी पता होता है क़ि कितनी बार आउट होते हुए भी अम्पायर की गलती से उसे जीवनदान मिल जाता है. कई महान खिलाडी हुए हैं जो ऐसे अवसरों पर स्वयं ‘वाक’ (walk) कर जाते हैं.अब जमाना बदल गया है.
Moral values बदल गयी है.Cricket अब कहीं ज्यादा competetive हो गया है.अब ‘वाक’ करने वाले कम ही होते हैं. इसके ठीक उलट कभी कभी अम्पायर से दूसरी किस्म की गलती भी हो जाती है. यानि खिलाडी आउट न होते हुए भी अम्पायर द्वारा आउट दे दिया जाना.कोई भी स्तरीय अम्पायर जान बूझ कर तो ऐसा करने से रहा.किंतु जब बार बार किसी टीम को लगे कि उसकी विरोधी टीम के खिलाडियों को आउट नहीं दिया जा रहा अथवा टीम विशेष ( या खिलाडी विशेष) को निशाना बनाकर फैसले दिये जा रहे हैं तो क्रिकेट का मजा चला जाता है.
टीम विशेष के साथ अम्पायरों के पक्षपाती व्यवहार के एक नहीं अनेक उदाहरण हैं और क्रिकेट खेलने वाली सभी टीमें कभी न कभी इसका शिकार हुई हैं.

ताजा सन्दर्भ सचिन तेन्दुलकर का है,विशेष्कर अभी हाल में सम्पन्न England दौरे का. पूरी श्रंखला में पांच अवसर ऐसे रहे जहां सचिन इस ‘दुर्भाग्यपूर्ण’ स्थिति का शिकार बने.
1.लोर्डस के मैदान पर पहले टैस्ट की पहली इनिंग में स्टीव बकनर द्वारा पगबाधा(LBW) दिया जाना जब leg से बाहर जाती inswinger पैर पर लगी.

2.उसी मैच की दूसरी इनिंग में फिर स्टीव बकनर द्वारा के off stump बाहर जाती गेंद पर फिर lbw दिया जाना जब के वह forward भी खेल रहे थे.

3.टेंटब्रिज में दूसरे टेस्ट की पहली इनिंग में 91 के निजी स्कोर पर फिर lbw ,जब कि गेंद साफ तौर पर बाहर जा रही थी. इस बार अम्पायर थे साइमन टुफ्फेल .

4. 99 के अपने स्कोर पर अम्पायर इयान गुल्ड द्वारा विकेट के पीछे कैच आउट तब जब कि गेंद सचिन के कोहनी के guard से लग कर गयी थी .

5. एक बार फिर,इस बार अलीम डार द्वारा कैच आउट जब कि बल्ले और गेंद के बीच बहुहुहुहुत सारा फासला था, और साफ तौर पर कैच नहीं था.
इसे दुर्भाग्य कह कर टालना नादानी है.किंतु प्रश्न है कि अम्पायरों को सचिन से क्या दुश्मनी या खुन्नस हो सकती है,कि अनेक देश के अम्पायर बार बार ऐसी भूल करें, वो भी तब जब उनके पास टीवी replay का भी विकल्प मौजूद था.
फिर क्या सचिन के विरुद्ध कोई साजिश है ? मैं तो निश्चित तौर पर इसे एक साजिश समझता हूं,परंतु किसके द्वारा और क्यूं रची जा रही है ये साजिश, फिलहाल् समझ से परे है .

Tuesday, September 11, 2007

नए पाठक भी,नए ब्लौगर भी

मान लीजिये आप ऐसे लोगों के बीच हैं जिन्होने कभी गाय नहीं देखी. आप उन लोगों को गाय दिखायें ,गाय के गुण समझायें,दूध,दही के फायदे बतायें, और फिर उनके कहने पर गाय को दुह कर दिखायें . अब उन सबको पता होगा कि गाय के क्या फायदे हैं.

जी हां, लग्भग ऐसा ही हुआ .आज सुबह.
जैसा कि सरकारी रीति-रिवाज है आज कल 'हिन्दी पखवाडा' मनाया जा रहा है.सभी सरकारी विभागों में आजकल हिन्दी कार्यशालायें चल रही हैं. इनके लिये विशेष बजट होता है.इन कार्यशालाओं में अतिथि वक्ता बुलाये जाते हैं और हिन्दी भाषा पर बात चीत होती है.
एक ऐसा ही संस्थान है एम एम टी सी ( Minerals & Metals Trading Corporation). प्रत्येक वर्ष की भांति,इस वर्ष भी दो-दिवसीय कार्य शाला आयोजित थी. पिछले अनेक वर्षों से मैं वक्ता के रूप में वहां जाता रहा हूं. इस वर्ष भी आमंत्रित था. इस बार मैने विषय रखा था -इंटर्नेट पर हिन्दी.MMTC के scope complex,नई दिल्ली स्थित सभागार में आज ही मेरा वक्तव्य होना था.

और मैने इसे हिन्दी ब्लौग्गिंग की कार्यशाला बना दी. कार्यशाला में जो कर्मचारी उपस्थित थे, उनमें से मात्र कुछ ने ब्लौग के बारे में सुन रखा था. 'हिन्दी ब्लौग' से प्राय: अपरिचित थे.Projector की मदद से विशाल screen पर सारा कुछ देखा जा सकता था.

मैने. हिन्दी के औज़ार से शुरू किया. फिर याहू टूल बार तक पहुंचा.मेरे laptop में याहू टूल बार स्थापित है. मैने हिन्दी टूल, हिन्दी खोज (MMTC को ही खोज कर दिखाया . एक सज्जन का नाम टाइप करके खोजा, वो गद्गद हो गये. पत्रिकाओं में निरंतर, सृजनगाथा, वेब्दुनिया की साइट दिखाई.वेब दुनिया पर पहले 'साहित्य',उसमें 'कविता' उसमें भी अटल बिहारी वाज्पेयी की 'गीत नया गाता हूं' खोज कर दिखाए और कहा कि अब आप इस पर टिप्पणी भी कर सकते हो.सीधा वेब्साइट प्रदर्षित करता हुआ फिर एग्ग्रीग्रेटर तक पहुंचा. नारद ,चिट्ठाजगत्, हिन्दिब्लौग्स और ब्लौगवाणी तक सब दिखाया, जितनी तकनीकी जानकारी थी ,वह सब शेयर किया.

फिर एक दम् नया ब्लौग (ताजा ताजा) बनाकर दिखाया कि ब्लोग कैसे बनाते है. ( नये ब्लौग का नाम है बृज गोकुलम्,अभी इसपर एक टेस्ट पोस्ट ही डाली थी, यह दिखाने के लिये कि कैसे पोस्ट बनाते हैं.)
फिर ब्लौग पर दिखने वाले अन्य साजो-सामान ( लिंक, टिप्पणी, आदि आदि) दिखा कर व बनाकर समझाई. अपने नये ब्लौग ( बृज गोकुलम) पर अपनी ही टिप्पणी करके दिखाई.

फ़िर मेरे प्रिय चिट्ठों पर आया. शुरुआत हिन्द युग्म से
और इस ब्लौग पर ढेर सारे लिंक्स् का प्रदर्शन किया. वहां से सारथी जी के चिट्ठे पर जाकर वही सब समझाया.
इस बीच हिन्दी ब्लौग्गिंग के बारे जितना जानता था ,सब कुछ समझा दिया.

ये सब हो रहा था, सब के सामने और वो सुनने वाले देखने वाले सब भौचक्के होकर देख रहे थे. लगभग 1.30 बजे भोजनवकाश के कारण मुझे यह लाइव डिमोंस्ट्रशन समाप्त करना पडा.
भोजन के दौरान भी लोगों ने कई प्रश्न पूछे. लिंक्स मे दिखे कुछ नामों ( अलोक पुराणिक ,पंगेबाज, पर भी चर्चा हुई, मैने जितेन्द्र चौधरी मैथिली जी व सिरिल गुप्त का विशेष उल्लेख किया एवम उनकी जानकारी में वृद्धि की)

सभी ने इस नई जानकारी का स्वागत किया और प्रशंसा भी की. मुझे विश्वास है कि इनमें से कई आज ही हिन्दी ब्लौग्स से कुछ ग्रहण करेंगे. हमें नये पाठक भी मिलेंगे और नये चिट्ठाकार भी.ऐसी आशा है.

Monday, September 10, 2007

कितनी सस्ती जान ?

अपने अपने मन में आस्था, श्रद्धा, विश्वास भरे हुए , उल्लसित व प्रफुल्लित होकर पारम्परिक धार्मिक मेलों में जाने वाले झुंडों को हम अक्सर देखते आये हैं. हम में से अनेकों ने इस प्रकार के मेलों मे स्वयम भी हिस्सा लिया होगा . ऐसे मेलों में परिजनों, नाते-रिश्ते दारों. मित्रों, पडोसियों आदि के साथ लुत्फ भी उठाया होगा . आनन्द के साथ साथ पुण्य भी अर्जित करके संतोष प्राप्त किया होगा.
राजस्थान के जैसलमेर जिले में प्रति वर्ष सूफी संत् रामदेवरा का मेला लगता है.इस मेले में हिन्दू –मुस्लिम सभी भाग लेते हैं. त्वचा की बीमारी आदि के इलाज़ के लिये दूर दूर से ग्रामीण पहुंचते हैं.. इसी मेले में जा रहे थे वो 200 लोग अपने परिजनों, नाते-रिश्ते दारों. मित्रों, पडोसियों आदि के साथ. मन में आस्था, श्रद्धा, व विश्वास भरे हुए उन लोगों ने सपनों में भी नहीं सोचा होगा कि उनके साथ कोई हादसा हो जायेगा क्योंकि आनन्द के साथ साथ पुण्य कमाना मेले में जाने का मुख्य उद्देश्य था. प्रकृति को शायद यह मंजूर नहीं था. राजसमन्द ज़िले में चारभुजा नामक स्थान पर एक बडी दुर्घटना में इस दल के लग्भग 90 श्रद्धालु काल-के गाल में समा गये.
प्रकृति का प्रकोप कहें या मानव की भूल ? क्या पाप था उनका ? क्या वे किसी गलत उद्देश्य पर जा रहे थे ?
इन प्रश्नों के उत्तर ढूंढने पर भी नहीं मिलते.
सडक हादसो में हमारे देश में सैकडो जानें रोज़ चली जाती हैं. अधिकांश्तया जो शिकार होते हैं वे निर्दोष होते हैं. जान से इस प्रकार हाथ धोने वालों में पैदल या साइकिल पर चलने वाले ज्यादा होते है. ग्रामीण ,अशिक्षित, गरीब, कुल मिलाकर वह वर्ग जिसे अंग्रेज़ी में have-nots कहा जाता है. इनके पीछे आंसू बहाने वाले तो बहुत होते है, हां, उनके आंसू पोंछने वाला कोई नहीं होता. सडक हादसों के साथ साथ इसमें आतंकवाद के शिकार भी जोड लें. राजनैतिक ,अराजकता ,दंगे-फसाद आदि में मरने वाले भी शामिल करें तो यह तादाद कई गुना बढ जाती है. चाहे बिहार, छतीसगढ आदि में नक्सल्वादी( अतिवादी) हमलों के शिकार हों, अलीगढ,भागलपुर , कोयम्बटूर या गोधरा में साम्प्रदायिक दंगों के शिकार . या फिर राजसमन्द जैसे सडक हादसे में मारे गये कतई निर्दोष व्यक्ति.प्राकृतिक आपदाओं मे गयी जानें तो जैसे ‘ऊपर’ से लिखा कर ही लाते हैं ये नादान लोग. ये बेकसूर लोग अपनी जान की कुर्बानी व्यर्थ में ही दे रहे है. किसी को कोई फर्क़ नही पडता सिवाय उनके ,जो इन पर आर्थिक रूप से निर्भर रहे हों या उनको, जिनका मृत जनों के साथ पारिवारिक व आत्मीय रिश्ता रहा हो.

प्रशासन ऐसी घट्नाओं पर ‘चिंत्ता व दुख प्रकट’ करता है. यदि वे कोई वोट बेंक रहे हों ( सामूहिक रूप से) तो कोई स्थानीय नेता (या नेता के विशेष निर्देश पर् कोई अधिकारी) ऐसे स्थान पर जा कर ‘कुछ” आर्थिक मदद की घोषणा करता है.मीडिया के लिये “एक और खबर” भर होतें हैं ये लोग. य़ा फिर एक दिन की सुर्खिया बनने का सस्ता सामान भर.
मरना इनकी नियति है. बेखटके मस्त जिन्दगी जीते जीते अचानक खत्म हो जाना, कभी किसी के लिये राजनैतिक रोटियां सेकने का कच्चा माल बन जाना. तो कभी किसी और बेकसूर (?) को सजा दिला जाना. ( जैसा कि राज्समन्द वाले हादसे मे हुआ है-या होने जा रहा है,: एक लघु स्तर के कर्मचारी को इस आरोप में निलमबित किया गया है कि उसने ट्रक में बैठे 200 लोग देखकर चालान क्यों नहीं किया))

वाकई जान सस्ती है.खास कर ऐसे लोगों की जान- जो किसी से शिकायत नही कर सकते. जो आम बोल चाल की भाषा में ‘महत्वहीन’ हैं. जिन्हे मात्र कुछ हज़ार रुपयों का मुआबजा देकर सीन से गायब कर दिया जा सकता है.
राजसमन्द मे मारे गये लोगों को मेरी श्रद्धांजलि.

Monday, August 27, 2007

आतंकवाद से क्यों मात खा रहे हैं हम ?



बडे फक़्र के साथ आज़ादी की साठवीं वर्षगांठ हम मना रहे हैं. एक उन्नत ,विकसित राष्ट्र के जो सपने आज़ादी के लिये संघर्ष करने वाली हमारी पिछली पीढी ने देखे थे, उनमे से अनेक पूरे हुये हैं और हम पूरे गर्व के साथ इन उपलब्धियों का उल्लेख करते है. अर्थ, विज्ञान ,स्वास्थ्य ,शिक्षा जैसे अनेक क्षेत्रों में महत्वपूर्ण - विश्व स्तर की उपलब्धियों के बावज़ूद हम सुरक्षा के मुद्दे पर इतने कमज़ोर ,शक्तिहीन व प्रभावहीन क्यों हैं?

आज अंग्रेज़ी दैनिक Times of India की lead story पढकर भौंचक रह गया. मात्र पिछले तीन वर्षों मे भारत में आतंकवाद की भेंट चढने वालों मे भारत का विश्व में दूसरा स्थान है. इस अवधि में भारत के 3600 से अधिक लोगों की जानें गयी हैं .( हमसे अधिक जन-हानि उथाने वाले दिशों में सिर्फ ईराक़ हमसे आगे है). यानि प्रतिदिन के औसत पर ह्म लगभग तीन कुर्बानियां देते आ रहे है. यहां तक कि अफगानिस्तान, कोलम्बिया,रूस,सूडान जैसे देश भी हमसे कहीं पीछे हैं.

पिछले लग्भग 25 वर्षों से किसी न किसी रूप में हम आतंकवाद से जूझ रहे हैं . पहले पंजाब जलता रहा जिसे हमारे पडोसी देश की भरपूर शह मिलती रही. देश की जनता ने अत्यंत संयम से काम लिया. जम्मू व काश्मिर में तो आग अभी तक सुलगती आ रही है. शायद ही कोई दिन पूरी तरह शांति से गुजरता हो. उत्तर-पूर्व के अनेक राज्य आतंकवाद से जूझते आ रहे है तथा वहां की शांतिप्रिय जनता अब तो प्राय: इसकी अभ्यस्त सी हो गयी है. इन प्रभावित राज्यों के अतिरिक्त देश के अनेक प्रमुख नगरों की भोली भाली निरीह जनता ,जिसे soft target कहा जाता है ऐसी घटनाओं का दर्द झेलती आ रही है. दिल्ली, बंगलौर, हैदराबाद, मुम्बई आदि नगरों में अनेक मासूम अपनी जान की कुर्बानी दे चुके हैं.

क्या कारण है कि भारत यह सब सहता आ रहा है?
हमारी व्यवस्था इतनी कमज़ोर क्यों है?
हमारा खुफिया तंत्र सालों से सो क्यों रहा है. भारत क्यों नहीं इजराइल जैसे देशों के साथ ऐसे समझौते करके विशेष प्रशिक्षण की व्यवस्था करता ताकि हम आतंकवादियों का खुला मुक़ाबला कर सकें?
सरकारें आती हैं, चली जाती हैं. स्वरक्षा, सुरक्षा पर लगातार बढते बजट के बावजूद भारत का पूरा तंत्र इतना कमज़ोर क्यों है?

आतंक्वादियों के मंसूबे पूरे होते जाते हैं परंतु हमारा तंत्र क्यों सदैव नपुंसक ही बना हुआ है?
कब तक आखिर , आखिर कब तक ?
समय आ गया है कि हम जागें और् उठ खडे हों इस दानव के खिलाफ.कोई भी कुर्बानी छोटी है हमारी सुरक्ष के सामने.

भाई संजय बेंगाणी की टिप्पणी बडी माक़ूल है, उसका वहा तो जवाब तो मैने लिख दिया, परंतु सोचा कि पूरे लेख का लब्बो-लुबाब तो यही होना चाहिये था. वह यों है:




रास्ता कठिन या दुष्कर नहीं होता, विशेष कर तब जब हम अपने अस्तित्व के लिये लड रहे हों .

हमारे अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्ध किस काम के यदि हम अपने लिये सुरक्षा के लिये आवश्यक technology जुटा ना सकें.
तय करना होगा कि भारत ऐसे समझोते करे जहां हमारी अपनी सुरक्षा खतरे में पडे तो दस बीस देश हमारे साथ खडे हों.

.....और सौ की सीधी एक बात . खत्म कर दो ना नासूर को जो हमारे देश पर पडोस से नज़रें गडाये खडा है. ..और अपनी ताक़त के दम पर , झुकाओ ना उन दूसरी ताक़तों को जिनका डर है हमॆं.

...दुनिया झुकती है. झुकाने वाला चाहिये ...

चक दे इंडिया !!!!!!!!





कल ही शाहरुख खान की 'चक दे इंडिया' देखी.फिल्म के बारे में पहले पढ रखा था. लगता था कि चलो और कुछ नहीं तो टाइम पास ही सही. किंतु जैसे जैसे फिल्म आगे बढती गयी, involvement भी बढता गया.
जब फिल्म में इंडिया की टीम womens hockey का world-cup खेल रही थी तो इतना अधिक interest आने लगा जैसे कि कोइ लाइव match चल रहा हो.
आज इस फिल्म पर ndtv द्वारा किया गया feature देखा , जिसमें anchoring एक ब्लौगर साथी रवीश कुमार कर रहे थे. पूर्व हौकी खिलाडी ज़फर इक़बाल ने कहा कि फिल्म देखते देखते कई बार वो कुछ इमोश्नल हो गये और उनके आंसू निकल पडे, तो लगा कि मैं अकेला नहीं हूं जो इस फिल्म को देख्कर भावनाओं में बहने लगा था.

फिल्म में भारतीय टीम की जो महिला खिलाडी हैं,उनका चयन, चरित्र चित्रण तो कबिले तारीफ है ही, एक एक छोटी सी घटना भी कुछ न कुछ सन्देश दे कर जाती है
कुल मिलाकर यह फिल्म न केवल खेल के प्रति उत्साह जगाती है , बल्कि इसका मुख्य प्रभाव है देश के प्रति चेतना, टीम भावना का महत्व व संघर्ष की प्रेरणा.

खुद भी देखें और सबको दिखायें.

Wednesday, August 15, 2007

तुम हो पहरेदार चमन के




राजनीति और साहित्य दो अलग अलग धारायें है. बहुत कम लोग ही मुझे मिले हैं जिनका दोनों से ही सम्बन्ध है. प्रो. उदय प्रताप सिंह एक ऐसी ही शख्सियत हैं समाज्वादी पार्टी के सांसद है. लोकसभा व राज्यसभा दोनो में रहे हैं. पिछले 18-19 वर्षों से सक्रिय राजनीति में हैं.
प्रो. उदय प्रताप सिंह का कविता से पुराना सम्बन्ध है. अध्यापक रहे हैं.पिछले 40-50 वर्षों से लगातार लिखते आ रहे हैं.मेरी प्रोफेसर उदय प्रताप जी से जान-पहचान लग्भग 17 वर्षों से है. फिलहाल मैं राजनीति में सक्रिय नहीं हूं फिर भी साहित्यिक,सांसकृतिक कार्यक्रमों में मुलाक़ात हो ही जाती है.
पिछले 11 अगस्त को मेरी संस्था " अक्ष" की ओर से एक साहित्यिक आयोजन था,जिसमें पुस्तक के लोकार्पण के अतिरिक्त लघु कवि सम्मेलन भी था. उदय प्रताप् जी आमंत्रित थे.उन्होने देशभक्ति से ओत-प्रोत एक रचना पढी जिसमे उन्होने चन्द्र शेखर आज़ाद की जनम्स्थली बदरका को प्रणाम कहा.मेरे विशेष अनुरोध पर उन्होने एक रचना पढी, जिसका सम्बन्ध लोकतंत्र की पहरेदारी से है. लोकतंत्र में जनता का एक सजग् प्रहरी के रूप में जो दायित्व है,उसी को रेखांकित करती है ये कविता.
उदय प्रताप सिंह जी की अनुमति लेकर यहां यह कविता संक्षिप्त रूप में प्रस्तुत है:


ऐसे नहीं जागकर बैठो तुम हो पहरेदार चमन के ,
चिंता क्या है सोने दो यदि सोते हैं सरदार चमन के.
वैसे भी ये बड़े लोग हैं, अक्सर धूप चढ़े जगते हैं
व्यवहारों से कहीं अधिक तस्वीरों में अच्छे लगते हैं
इनका है इतिहास गवाही जैसे सोये वैसे जागे
इनके स्वार्थ सचिव चलते हैं नई सुबह के रथ के आगे
माना कल तक तुम सोये थे लेकिन ये तो जाग रहे थे
फिर भी कहां चले जाते थे ,जाने सब उपहार चमन के
ऐसे नहीं जागकर बैठो.......


जिनको आदत है सोने की उपवन की अनुकूल हवा में
उनका अस्थिशेष भी उड जाता है बनकर धूल हवा में
लेकिन जो संघर्षों का सुख सिरहाने रखकर सोते हैं
युग के अंगडाई लेने पर वे ही पैगम्बर होते हैं
जो अपने को बीज बनाकर मिट्टी में मिलना सीखे हैं
सदियों तक उनके सांचे में धलते हैं व्यवहार चमन के
ऐसे नहीं जागकर बैठो......


यह आवश्यक नहीं कि कल भी होगी ऐसी बात चमन में
ऐन बहारों में ठहरी है कांटों की बारात चमन में
कल की आने वाली कलियां पिछले खाते जमा करेंगी
तब इन कागज़ के फूलों की गलती कैसे क्षमा करेंगी
उस पर मेरी क़लम गवाही बिना सत्य के कुछ ना कहेगी
केवल बातों के सिक्के से चलते थे व्यापार चमन के
ऐसे नहीं जागकर बैठो...

( समारोह की पूरी रपट लग से एक पोस्ट में दी जायेगी)

चित्र 1 :मंच पर श्री उदय प्रताप सिंह कवि अरविन्द पथिक को प्रशस्ति पत्र भेंट करते हुए
चित्र 2:अरविन्द चतुर्वेदी का कविता पाठ्
चित्र 3 : मंच पर श्री उदय प्रताप सिंह,प.सुरेश नीरव,उ.प्र.सरकार के मंत्री यश्वंत सिंह,दिल्ली सरकार के मंत्री डा. ए.के.वालिया

Monday, August 6, 2007

अपने हाथों का खिलौना न बनाना मुझको

अपने हाथों का खिलौना न बनाना मुझको ,
हो सके तो किसी मूरत सा सजाना मुझको.


मैं जो मिट्टी हूं तो एक बीज़ मिला दे मुझमें,
में हूं पत्थर तो अहिल्या सा बनाना मुझको.


बून्द हूं तो किसी दरिया में समा जाने दो ,
मैं जो दरिया हूं तो सागर में मिलाना मुझको.


हूं जो नफरत तो मुझे ,क़त्ल करके दफनाना,
मैं मोहब्बत हूं तो सीने से लगाना मुझको.


मैं जो आकाश दिखूं,ओढना चादर की तरह ,
दिखूं धरती तो, बिछौने सा बिछाना मुझको.


जो हूं कांटा तो मुझे दिल में छुपा कर रखना,
फूल हूं तो किसी मन्दिर में चढाना मुझको.



मैं हूं दोहा, तो किसी पाठ् सा पढ जाना मुझे,
मैं गज़ल हूं तो ज़रा झूम के गाना मुझको.

Monday, July 30, 2007

नाचने दो मंत्री को भी...

हिमाचल प्रदेश के एक मंत्री को त्यागपत्र देना पडा क्योंकि टीवी के एक चैनल ने स्टिंग औपरेशन् द्वारा अपने चैनल पर दिखा दिया था कि अपने जन्मदिन की पार्टी में मंत्री जी नाच रहे थे.
मंत्री जी ( जी एस बाली) ने क्या बिगाडा था किसी का ? अरे भाई जन्म दिन भी उनका. पार्टी भी दी उन्होने ( या उनके मित्रों ने ). नचैया भी सारे वे खुद लेके आये, खाना भी उन्ही का. ( और ..पीना भी ). नाचे भी वह खुद.

क्या लेना था मीडिया को? खाम्ख़ां टांग अडाने की आदत से बाज नही न आते कुछ लोग.

क्यों क्या मंत्री आदमी नही होता?
क्या मंत्री के जज़बात नही होते ?
क्या मंत्री खुश नही दिख सकता ? ये मीडिया वाले भी न .. अपने आप को क्या समझते है ? क्या इनके जन्म दिन नही होते ? क्या ये लोग पार्टियां नही देते? क्या ये खाते-पीते नही है ? क्या ये नाचते नही है ?
तो फिर दूसरे को नाचते देख तुम्हारे पेट में क्यों दर्द होता है ?

बोलो बोलो,है कोई जबाब तुम्हारे पास ?
हां,अगला बहक जाय, दारू -शारू पीके दंगा -शंगा करे, तो पक्कडो. जरूर पकडो. मगर खाली-पीली ? क्या बात हुई ?

हां नशे में कुछ गलत शलत हर्कत कर जाये किसी के साथ, तो पकडो.जरूर पकडो. मगर खाली-पीली ?

हां , किसी पब्लिक प्लेस में कुछ करता हुआ पाये जाये, तो फिर मांगो ना इस्तीफा ? अपनी निज़ी पार्टी में .कोई गल नई, बश्शाओ . खूब खेलो. खुलकर खेलो ना फरुखाबादी .

मुख्यमंत्री जी, आपने भी गलत परिपाटी दाल दी ना. इस्तीफा मांग कर.
अब होगा क्या ? क्या इससे पार्टियां रुक जायेंगी ? या जन्म दिन नही होंगे ? अब क्या रोज़ इस्तीफा लोगे ? किस किसका लोगे ? मंत्री कम पड जायेंगे ? जितने एम एल ए हैं ना तुम्हारी पार्टी में ,सब को मंत्री बनाओगे क्या ?

Sunday, July 29, 2007

मैं नही पीता


मैं नहीं पीता

किंतु

मेरे दोस्त बताते हैं कि

शराब गम गलत करती है.

भला

गम भी कोई गलत करने की चीज़ है ?


सोचता हू मैं.


और

सोचते ही सोचते ,

इकट्ठा कर लेता हूं,

गम का सामान.


कुछ यादें,

कुछ अनुभवों की कडुवाहट,

कुछ टूटे सम्बन्धों का कसैलापन,

कुछ नये रिश्तों के सभावित मसौदे,


कुछ सहज स्वीकृत धोखे,

कुछ पूर्व मित्रों के जताये एहसानात,

कुछ गुनगुने विश्वासघात.


ज़ाडों की कुछ ठंडी रातें, चन्द रेगिस्तानी दिन

कुछ लिजलिजे आदर्श.



तह करके,

सजाके रख लेता हू अपने पास,

ऐसे,

जैसे रखता है कोई पिता,

अपने दूर परदेश गई ब्याहता बिटिया के

बचपन के खिलोने.

वाह!

गम भी कोई गलत करने की चीज़ है ?

Thursday, July 26, 2007

तो ये है महिला सशक्तीकरण ?


बडा शोर सुनते थे पहलू में दिल का

जो चीरा तो कतरा-ए-खूं भी न निकला.



ज़ब प्रतिभा पाटिल को महामहिम राष्ट्रपति पद हेतु प्रत्याशी बनाया गया था, तो कांग्रेस पार्टी ने मीडिया के सभी चौराहों पर खूब ढोल पीटे थे कि ये है महिला सशक्तीकरण की दिशा में पहला कदम.जिसने भी प्रतिभा पाटिल का विरोध किया उस पर "महिला विरोधी" होने का लेबल चस्पां कर दिया गया.

चहेते सम्पादकों से अनेक सम्पादकीय लिखवाये गये , मीडियाकर्मियों को शुभेक्षाओं से नवाज़ा गया जिसने प्रतिभा पाटिल के समर्थन में कसीदे पढे.कई तो ऐसे कसीदे लिख पढ कर पद्मश्री,पद्मभूषण आदि की तैय्यारी में अभी से बैठे हैं.तो कुछ राज्यसभा की आस लगाये है.

अभी कल की ही बात है जब श्रीमती प्रतिभा पाटिल ने महामहिम राष्ट्रपति पद की शपथ लेते समय महिला सशक्तीकरण को ही अपने सम्भाषण का मुख्य मुद्दा बनाया था , लगने लगा था कि बस अब हो गया भरतीय नारी का कल्याण और मिल गयी उसे सदियों की दासता से मुक्ति एक ही झटके में. चढने ही वाली है भारतीय् नारी उत्तंग शिखर पर.

अगले ही दिन दिखा सत्ता का असली रंग.सत्ता का चरित्र क्या होता है ,पता लग गया. मुलम्मा उतर गया.
नारे और वादे क्या होते है और क्या होती है उनकी उपयोगिता, सामने आ गया.
दिल्ली राज्य के पुलिस कमिश्नर की नियुक्ति में जब 1972 बैच की IPS officer Dr. Kiran Bedi वरिष्ठता क्रम मं सबसे आगे दिखीं तो सत्ता को पसीने आ गये.शुरु हो गया क्रम उन बहानों को ढूंढने का जिनके चलते किरन बेदी को किनारे लगाया जा सके.

पहले दिल्ली के कुछ वकीलों से एक बयान दिलवाया गया कि यदि किरन बेदी को यह पद दिया गया तो वे विरोध करेंगे क्यों कि लगभग 20 वर्ष पहले किरन बेदी के नेट्रत्व में किसी जुलूस पर पुलिस ने लाठी चार्ज किया था. फिर बहाना बनाया गया कि Dr. Kiran Bedi हाल फिल्हाल के वर्षों में active police-role में नही रही हैं. यानि कि हर तरह से योग्यता के प्रश्न को भुलाने का बहाना.

सता योग्यता नही देखती, सत्ता seniority नही देखती. सत्ता देखती है ठ्कुर सुहाती. You should be politically correct to find favour with powers that be.यदि आपका अपना कोई वज़ूद है,यदि आप के पास स्वतंत्र विचार है,यदि आप में बिना किसी नेता की चप्पू बने अपना नाम स्वयम स्थापित करने की योग्यता है, तो निश्चित ही आप सत्ता के गलियारों के चहेते/ चहेती नही बन सकते. यह चरित्र है सत्ता का.


किरन बेदी का उदाहरण यह सभी सिद्ध करता है.

अब यह जग जाहिर है कि महिला सशक्तीकरण मात्र एक नारा है, नितांत खोखला नारा,जिसे जब चाहे अपनी सुविधानुसार इस्तेमाल किया जा सकता है.
प्रश्न यह है कि कब तक निरीह जनता भुलावे भरे नारों ,छलावे भरे सपनों को देख कर गुमराह होती रहेगी ?

( Kiran Bedi's photo: Utsav Arora ( http://www.pbase.com))

Wednesday, July 25, 2007

एक फ्लौप सर्वेक्षण के नतीज़े

चिट्ठाकारी से सम्बन्धित एक सर्वेक्षण की प्रश्नावली ( questionnaire) मैने इस चिट्ठे पर 18 जुलाई को post किया था, जिसमें इस विषय पर कुछ रोचक प्रश्न शामिल थे. आशा थी,कि अधिकांश पढने वाले भाग लेंगे.
मित्र अरुण अरोरा जी ने इस सर्वेक्षण की घोषणा को एक लिंक भी अपनी साइट पर दिया ताकि अन्य लोग भी भाग ले सकें,परंतु कुल मिलाकर 34 लोगों ने इस सर्वेक्षण में हिस्सा लिया. हालांकि इस सर्वेक्षण की सीमाएं भी थीं तथा अनेक प्रश्नों का स्वरूप आदर्श नहीं था( जैसा कि सारथी जी ने सूचित भी किया था).

sample size कम होने , तथा सर्वेक्षण में प्रयुक्त प्रश्नावली (questionnaire) की सीमाओं के बावजूद नतीज़े प्रस्तुत कर रहा हू. इसमे ज्यादा स्पष्टीकरण की आवश्यकता भी नहीं है अत: सारे परिणाम ज्यों की त्यों प्रस्तुत हैं.


The statistics associated with results are shown below. This display can not be altered.
कौन से विषयों में आपकी रुचि है ?

1. ब्लौगिंग तक्नीक आदि 6 (18%)
2. काव्य -कथा साहित्य 7 (21%)
3. हास्य-व्यंग्य 11 (32%)
4. घरेलू उपयोगी विषय् 0 (0%)
5. खेल-कूद,स्वास्थ्य 0 (0%)
6. आर्थिक,धन,निवेश,बचत आदि 0 (0%)
7. सिनेमा, टी.वी ,मनोरंजन् 2 (6%)
8. राजनीति,कूट्नीति, चुनाव आदि 8 (24%)
9. सैर सपाटा, भ्रमण, 0 (0%)
Total Votes: 34


आप अमूमन कितने चिट्ठे /ब्लौग् प्रति सप्ताह देखते हैं?

1. पन्द्रह से कम् 3 (9%)
2. पन्द्रह से तीस् 5 (16%)
3. तीस से पचास 10 (31%)
4. पचास से भी अधिक् 14 (44%)
Total Votes: 32


क्या आप ब्लौग एग्रीग्रटेर की सेवाय्रें प्रयोग करते है ?

1. हां सिर्फ एक :नारद् 2 (6%)
2. हां सिर्फ एक: ब्लौग्वाणी 17 (49%)
3. हां सिर्फ एक: चिट्ठाजगत 0 (0%)
4. हां सिर्फ एक: हिन्दीब्लौग्स् 0 (0%)
5. हां,एक से अधिक् 10 (29%)
6. हां ,लगभग सभी 5 (14%)
7. नियमित नही, सिर्फ कभी कभी 0 (0%)
8. कभी नही 1 (3%)
Total Votes: 35


ब्लौग लिखना/ पढना आपके लिये क्या है?

1. ज्ञान वर्धन 10 (30%)
2. टाइम पास 2 (6%)
3. मनोरंजन् 5 (15%)
4. जन सम्पर्क /मित्र मंडल 2 (6%)
5. उपर्युक्त सभी 9 (27%)
6. इनमें से कोई भी नहीं 5 (15%)
Total Votes: 33


क्या आप हिन्दी के अतिरिक्त अन्य भाषाओं में चिट्ठे लिखते /पढते है ?

1. सिर्फ हिन्दी में 16 (50%)
2. हिन्दी व अंग्रेज़ी में 15 (47%)
3. हिन्दी व अन्य भारतीय भाषाओं में 1 (3%)
Total Votes: 32


हिन्दी चिट्ठों की विषय वस्तु के बारे में आपकी राय ?

1. बहुत ही रोचक विषय 7 (23%)
2. कुछ कुछ रोचक् 21 (68%)
3. कम रोचक 1 (3%)
4. बहुत ही कम रोचक् 2 (6%)
Total Votes: 31


हिन्दी चिट्ठों की लेखन शैली/ भाषा पर आपकी राय ?

1. आशा से भी अधिक अच्छी 3 (9%)
2. आशा के अनुरूप् 15 (47%)
3. अपेक्षा से कम् 7 (22%)
4. बहुत अधिक सुधार की गुंजाइश 7 (22%)
Total Votes: 32


हिन्दी चिटृठों के कुल पाठक वर्ग की संख्या का अनुमान ?

1. लग्भग 1000 20 (63%)
2. 1000 से 2000 1 (3%)
3. 2000 से 5000 5 (16%)
4. 5000 से 10000 2 (6%)
5. 10000 से 20000 1 (3%)
6. 20000 से 50000 1 (3%)
7. 50000 से अधिक किंतु एक लाख से कम् 1 (3%)
8. एक लाख से अधिक् 1 (3%)
Total Votes: 32




अगला सर्वेक्षण शीघ्र ही आयेगा,कृपया नये survey हेतु कुछ विषय( topics) का सुझाव दें. स्वागत .

Tuesday, July 24, 2007

जब सभी ने होंठ पर विद्रोह के स्वर रख लिये

जब सभी ने होंठ पर विद्रोह के स्वर रख लिये,
एह्तियातन हमने अपने होंठ सी कर रख लिये.


दिल में मेला सा लगा था ,इसलिये बेचैन था,
चन्द सन्नाटे चुरा कर दिल के अन्दर रख लिये.


सब समारोहों में जाने के लिये तैयार थे,
राम मुंह पर था, बगल में सबने खंजर रख लिये.


पूजना सब चाहते थे ,अपने अपने इष्ट को,
सबने आलों में सजाकर अपने ईश्वर रख लिये.


जब भी धोखों की नदी में डूबने का मन हुआ,
हमने अपने दिल के अन्दर चन्द पत्थर रख लिये.


युं कहा करते थे मेरे दोस्त ,कुछ अपनी सुना,
मेज़ पर , बापू के, मैने तीन बन्दर रख लिये

Friday, July 20, 2007

चिट्ठाकारी का सर्वेक्षण् :एक अनुरोध्

मैने 'चिट्ठाकारी का सर्वेक्षण्' शीर्षक से अपनी पिछली पोस्ट में आप सभी पाठकों व चिट्ठाकारों से सर्वेक्षण में भाग लेने का अनुरोध किया था.तब से अब तक 150 हिट्स होने के बावजूद् मात्र 24 लोगों ने सर्वेक्षण में हिस्स लिया है.यह संख्या भी कल शाम आठ बजे तक थी .उसके बाद कोई नया मत नही आया है.इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि यह पोस्ट अब एग्ग्रीग्रेटर के प्रथम पृष्ठ पर नज़र नहीं आ रही होगी.

मेरा सभी से पुन: अनुरोध है इसे अपने पोस्ट पर link करें ताकि अधिक से अधिक लोग इसे देखें और सर्वेक्षण् में भाग लें . Questionnaire बहुत आसान है. कुल 24 मतॉं के आधार पर कोई भी फैसला कठिन होगा.


मेरी मूल (original )पोस्ट्: ऎक बार फिर :


हिन्दी में चिट्ठाकार भी बढते जा रहे हैं और हिन्दी चिट्ठों के पाठक भी.ऐसे में यह जानकारी रुचि का विषय हो सकती है कि इन चिट्ठों के लेखक व पाठक क्या सोचते हैं.
किन किन विषयों मे उनकी रुचि है ,क्या वे पढना चाहते हैं आदि आदि.
मैने सोचा कि क्यों न इस विषय पर एक सर्वेक्षण आयोजित किया जाये.
इस दृष्टि से एक प्रश्नावली तैयार की है जिसमें सिर्फ आठ प्रश्न हैं.
आप सभी चिट्ठाकारों से अनुरोध है कि अधिक से अधिक संख्या में इस सर्वेक्षण में भाग लें तथा अन्य मित्रों / पाठकों को भी इस सर्वेक्षण में भाग लेने हेतु प्रेरित करें.

नियमित सर्वेक्षण्:

इस चिट्ठे पर प्रत्येक पक्ष ( पखवाडे) एक नये विषय पर सर्वेक्षण आयोजित किया जायेगा. सर्वेक्षण् के विषयों पर आप सभी की राय भी ली जायेगी.वे सभी विषय जो हमें कही ना कहीं झकझोरते हैं, जिन पर समाज में राय बंटी हुई होती है, उन्हे इस प्रकार के सर्वेक्षणों हेतु चुना जायेगा,तथा विश्लेषण के बाद नतीजों को आप सब के समक्ष रखा जायेगा,ऐसी योजना है.
यह सब आप लोगों की भागीदारी पर ही निर्भर होगा,अत: आप सभी को इस पहले सर्वेक्षण् से ही शुरुआत करनी होगी.

दाहिनी ओर मेरी फोटो के पास बने लोगो पर जा कर क्लिक करें ,एक questionnaire आपके सामने खुल जायेगा. प्रश्नों का उत्तर दें और बस. (survey) सर्वेक्षण् के परिणाम की प्रतीक्षा करें.
यह सर्वेक्षण् पूरे सप्ताह भर के लिये खुला है. यानी आप आज से 25 जुलाई तक कभी भी वोट कर सकते हैं.
25 जुलाई के बाद एक नया विषय आप सभी के समक्ष होगा. फ़िर ये क्रम निरंतर जारी रहेगा.

Wednesday, July 18, 2007

14 जुलाई की ब्लौगर मीट:एक और अ-रपट्

इत्ती सारी रपटें तो पैले ई पौंच गयी.सबन नें पढ भी लयी. हज़म ऊ कर लयी. फिर भी का जर्रूरत आन पडी अ-रपट लिक्खन की ?
तो भैया जी ,बात ऐसी ही कि जो पेट में पडत है ,बाय .
बाहर तो आनें ई चिईयें.
जो अन्दर की बात बाहर नायं निकरी तो है जय्ये बदहज़मी.
ताई मारें हमने सोची कि ..गुरु है जाओ शुरू...

बात शुरू कत्त है कौन कौन लये था 'हिडेन अजेंडा'.

एक ने कह दई कि सबतों बढिया ब्लौग लिखन् वारे है : सारथी उर्फ जे सी शाश्त्री फिलिप.बडी मेहनत कत्त हैं परंतु लिखतई जाय रहे है. थकत नही है.दूसरे ने बोली सच्ची बात बहिनी. बिल्कुल सच्ची.
अब जब दो बहिनें काऊ की तारीफ कर दें तो तीसरे भैया का सुन सकत है? भैया ने सुनी और फर्मान जारी कर दओ कि वे तो ईसाइयत को प्रचार करवे वाले है. चौथे भैया बोले 'ना भई ,जे सही (नही है. और फिर गर सही है तो भी क्या, हम क्या किसी से उसका धरम प्पूछ कर बात करेंगे .बात आई गई है गयी. जी तो अच्छो भयो कि ज्यादा लोग सुन नाई पाये, नई तो शायद है जाती वही पर ...)

एक ने' जीतु भाई नही आये 'की टिप्पणी की तो दूसरा बोलन लगे. अच्छा हुआ ,नही तो पूरा फोकस उन्ही पे होता, हमें कौन पूछता?

एक ने लडू बांटे ,खुशी की बात थी. दूसरे ने तीसरे से कहा, भैया जी मत खाना, मेरे ड्ब्बे क्र लड्डू में 'फफून्द' लगी है.
देखो कही ,तुम्हारे डब्बे में भी तो ....

हम साम्प्रदायिकता की कितनी भी आलोचना करें. 'लीग' को कितना भी कोसें. हम में से हरेक के अन्दर एक 'लीगी' छुपा हुआ है. ऎक बहेन जी बडी शान से से कह रही थी आज मेरी चार छत्तीस्गढियोंसे मुलकात हुई.( असली पहचान छुपाने के लिये ,प्रदेश का नाम बदल दिया गया है)फ़िर एक भैया बोले कि मेरी बेटी का नाम वो है ,जो आपके प्रदेश में एक फूल होता है.

में तो पहली बार किसी ऐसी मीट में गया था. कई अन्य भी कई और अन्यों से अपरिचित थे. एक बहिनी का परिचय तमाम अन्य से यों हुआ : सफेद शिर्ट मे'फलाने ' है, उनके बगल में 'ढिकाने'. और जो उनके पीछे दिख नही पा रहे वे है 'एक्स', बगल में जिनका जूता ज्यादा चमक रहा है वे हैं 'वायी', . एक नये आगंतुक बोले, " मे हूं'ज़ेड' मेरे ब्लौग का नाम....." .
तब तक बहिनी सब नामों को भूल भी चुकी थी, बोली," चलो कोई बात नही , चार को पहचानती हू और चार का नाम जानती हू,इतना काफी है".

एक सुजान ब्लौगर जब हिन्दी के स्पीच रिकग्नीशन् ( आवाज पहचानने वाला )सोफ्ट्वेयर के बारे में बताने लगे तो दूसरे टांग घुस्साऊ मास्टेर साहेब से चुप ना रहा गया. उन्होने कुछ विपरीत टिप्पणी की. पहले वाले समझ गये और नपी तुली हिन्दी में आखिर डांट पिलायी तब जाकर मास्टेर साहेब चुपा गये.

......
अंत में जब सब जाने वाले थे तब प्रवेश हुआ ... अब जाने भी दो यारो ( जब अभी तक की रपट में किसी का नाम नही आया ,तो अब आखिर में क्यों ?

कुल मिला कर बढिया रहा मामला.

चिट्ठाकारी का सर्वेक्षण्

हिन्दी में चिट्ठाकार भी बढते जा रहे हैं और हिन्दी चिट्ठों के पाठक भी.ऐसे में यह जानकारी रुचि का विषय हो सकती है कि इन चिट्ठों के लेखक व पाठक क्या सोचते हैं.
किन किन विषयों मे उनकी रुचि है ,क्या वे पढना चाहते हैं आदि आदि.
चूंकि में सांख्यिकी व बाज़ार अनुसन्धान विषय पढता पढाता हूं ,मैने सोचा कि क्यों न इस विषय पर एक सर्वेक्षण आयोजित किया जाये.
एक मुफ्त उपलब्ध औज़ार की मदद से एक प्रश्नावली तैयार की है जिसमें सिर्फ आठ प्रश्न हैं.
आप सभी चिट्ठाकारों से अनुरोध है कि अधिक से अधिक संख्या में इस सर्वेक्षण में भाग लें तथा अन्य मित्रों / पाठकों को भी इस सर्वेक्षण में भाग लेने हेतु प्रेरित करें.

नियमित सर्वेक्षण्

इस चिट्ठे पर प्रत्येक पक्ष ( पखवाडे) एक नये विषय पर सर्वेक्षण आयोजित किया जायेगा. सर्वेक्षण् के विषयों पर आप सभी की राय भी ली जायेगी.वे सभी विषय जो हमें कही ना कहीं झकझोरते हैं, जिन पर समाज में राय बंटी हुई होती है, उन्हे इस प्रकार के सर्वेक्षणों हेतु चुना जायेगा,तथा विश्लेषण के बाद नतीजों को आप सब के समक्ष रखा जायेगा,ऐसी योजना है.
यह सब आप लोगों की भागीदारी पर ही निर्भर होगा,अत: आप सभी को इस पहले सर्वेक्षण् से ही शुरुआत करनी होगी.

दाहिनी ओर मेरी फोटो के पास बने लोगो पर जा कर क्लिक करें ,एक questionnaire आपके सामने खुल जायेगा. प्रश्नों का उत्तर दें और बस. (survey) सर्वेक्षण् के परिणाम की प्रतीक्षा करें.
यह सर्वेक्षण् पूरे सप्ताह भर के लिये खुला है. यानी आप आज से 25 जुलाई तक कभी भी वोट कर सकते हैं.
25 जुलाई के बाद एक नया विषय आप सभी के समक्ष होगा. फ़िर ये क्रम निरंतर जारी रहेगा.

Wednesday, July 11, 2007

चन्द्र शेखर : एक राजनैतिक संत


चन्द्र शेखर : एक राजनैतिक संत
अनेक दिनों से जानकारी मिल रही थी कि अध्यक्ष जी (चन्द्रशेखर जी के चाहने वाले उन्हे इसी नाम से सम्बोधित करते थे) कुछ ज्यादा ही अस्वस्थ हैं.बार बार सोचता था के अगले रविवार भोन्डसी ( गुडगांव स्थित भारत यात्रा केन्द्र ) आश्रम जरूर जाऊंगा. अध्यक्ष जी के बारे में नियमित जानकारी के दो ही सूत्र थे -डा. सुब्रमण्यम स्वामी या सजपा की सचिव वसंता नन्द्कुमार. मेरा मोबाइल फोन खो जाने से वसंता का नम्बर मिलना मुश्किल हो रहा था, और डा.स्वामी ,सदैव की भांति इस वर्ष भी पढाने हार्वर्ड वि.वि. चले गये थे.

वही हुआ जिसका डर था. परसों रात टीवी से खबर हुई कि अध्यक्ष जी की हालत गंभीर है. और सुबह पता चला कि ... नही रहे.

इतवार का दिन था अत: ड्राइवर को नही आना था. पहले सोचा कि अकेला चला जाऊं पर यह सोचकर कि वी आई पी गणों के आने से साउथ एवेन्यू में भीड होगी, ड्राइवर को बुलवा लिया. तीन साउथ एवेन्यू पहुंचते ही सबसे पहले सुधीन्द्र भदौरिया दिखे. मैने उन्हे याद दिलाया कि 1986 में यहां सबसे पहले वही लेकर आये थे.य़ुवा लोक दल का मैं राष्ट्रीय सचिव था. सुधीन्द्र भदौरिया उस समय युवा जनता के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे. फिर तो रोज़ का नियम बन गया. 7, जनतर मंतर से निकल कर हम सब युवा साथी सुधीन्द्र भदौरिया के साथ अध्यक्ष जी के पास पहुंच जाते. श्याम रज़क, सुमन,त्रिलोक त्यागी, दुश्यंत गिरि,भक्तचरण दास,बालू, ( और अन्य वे भी जो अब तक कई बार एम पी,एम एल ऎ,मंत्री बन चुके है..).
कभी कभी डा. सुब्रमण्यम स्वामी के साथ भी जाना हो जाता था. फिर डा. सुब्रमण्यम स्वामी ने मुहिम चलायी कि लोकदल व जनता पार्टी का विलय होना चाहिये, अजीत सिंघ को जनता पार्टी का अध्यक्ष बना कर चन्द्र शेखर जी को प्रधान मंत्री बनाना है. कुछ लोगों ने ,जो चन्द्र शेखर जी के काफी करीब थे ,उन्होने विरोध करना शुरू किया और यह भी कानाफूसी की कि डा स्वामी उन्हे राजनैतिक रूप से खत्म कर देंगे यदि ऐसा हो गया तो. किंतु चन्द्र शेखर जी ने किसी की नही सुनी और एक सच्चे राजनैतिक संत की तरह अपने पद की कुरबानी के लिये तैयार हो गये.

फिर वीपी सिंह सामने आ गये. जनता दल की भूमिका बनने लगी थी. हम सब जानते थे कि चन्द्र शेखर जी मन से वी पी सिंह की अध्यक्षता हेतु तैयार नही होंगे. किंतु विपक्षी एकता एवम राष्ट्र के व्यापक हित में फिर एक बार वह मान गये और वी पी सिंह ने जनता दल की अध्यक्षता सम्हाल ली.
जब 1989 के आम चुनावों में जनता दल के संसदीय नेता पद का चुनाव आया तो जाहिर है पार्टी में अलग अलग राय के लोग थे. बैठक के एक दिन पहले सहमति बन गयी थी कि चौ.देवी लाल को नेता पद सौंपा जायेगा. किंतु संसद भवन के सेंट्रल हौल में सम्पन्न बैठक में जिस प्रकार चौ.देवी लाल को नेता चुने जाने के बाद नाटकीय रूप से पगड़ी वी पी सिंह के सर पर रख दी गयी वह अपने आप में एक ओछी राजनीतिक घटना थी जिसकी मिसाल मिलना मुश्किल है. ऐसी स्थिति में चन्द्रशेखर जैसा राजनैतिक संत ही इस गरल को पचा सकता था और वही उन्होने किया.

जैसा कि हम लोगों को अन्देशा था, वी पी सिंह की सरकार शुरू से ही डावांडोल रही. चन्द्रशेखर ने सरकार से दूरी ही बना रखी थी. अध्य़क्ष जी के नेतृत्व के लिये सदैव तैयार कुछ नेताओं ने जनता पार्टी का रूप बना कर रखा ही था और जनता दल में हम लोग शामिल नही हुए थे. कही न कही एक उम्मीद थी कि अध्यक्ष जी जनता दल से अलग हो ही जायेंगे. जद से बाहर रहने वाले इस समूह में प्रमुख थे देवेगौडा, डा. स्वामी, सैयद शहाबुद्दिन,इन्दुभाई पटेल,सरोजिनी महिषी,जयंत मल्होत्रा आदि. आखिर हम लोगों की उम्मीद रंग लायी,और रथ यात्रा के प्रश्न पर वीपी सिंह की सरकार गिर गयी. पूरा अराजकता का माहौल था देश भर में. आरक्षण के प्रश्न पर दंगे हो रहे थे.छात्र आत्महत्याएं कर रहे थे.आड्वाणी की रथयात्रा ने माहौल को और भी गर्मा दिया था. ऐसी अराजक स्थिति में राजीव गान्धी सरकार बनाने के लिये तैयार नही थे. इस चुनौती को एक बार फिर स्वीकार किया ‘अजात्शत्रु’ चन्द्रशेखर ने और तुरंत ही पूरे अराजक महौल को ठंडा करने में सफलता प्राप्त की. उनकी सरकार की सफलता ने नये आयाम स्थापित किये. अराजक असम की सरकार , लिट्टे समर्थक द्रमुक की तमिल्नाडु सरकारों को बिना हिचक राष्ट्रहित में बर्खाश्त कर दिया. इजराइल से दोस्ती आगे बढाई, अमेरिकी विमानों को बिन हिचक ईन्धन देना स्वीकार किया, साथ ही फिलिस्तीनी नेता अराफात से भी सम्बन्ध रखे, और इस्राइल से भी. मनमोहन सिंह अवकाश प्राप्त करके घर बैठे थे, उन्हे सलाह्कार बनाकर आर्थिक सुधारों की नींव रखने का जिम्मा दिया, जिसे बाद में राव सरकार ने और आगे बढाया.
किंतु जब बिना किसी मुद्दे के राजीव गान्धी ने आंखे तरेरनी शुरू की तो अध्यक्ष जी से सहन नही हुआ. उन्होने काफी लचीलापन दिखाया था किंतु फिर भी बात नही बनी. आखिर 6 मार्च को उन्होने त्यागपत्र दे दिया. मॆं उस समय लोकसभा की अधिकारी दीर्घा से उनका भाव पूर्ण भाषण सुन रहा था. मेरे अनेक मित्र ऊपर पत्रकार दीर्घा में थे जिन्होने बताया कि इतना सन्नाटा संसद की किसी भी बैठक में नही देखा गया जितना उस दिन था. सब सन्न थे. मानो सांप सूंघ गया हो. मुझे याद है कि उस रात सम्झौते के बहुत प्रयास हुए जो लग्भग पूरी रात चले. किंतु चन्द्रशेखर यहां गच्चा खा गये. वे उन लोगों की बातों में आ गये जिन्हे वे अपना बहुत करीबी मानते थे . समय गवाह है कि सत्ता से अलग होते ही चन्द्रशेखर का साथ सबसे पहले छोडने वालों मे यही लोग थे , जिन्होने त्यागपत्र देने के लिये उकसाया था. अध्यक्ष जी को गुमराह करने वालों मे जो भी थे, वे बहुत दिनों तक उनके साथ नही रहे और सत्ता के बाहर होते ही साथ छोड गये. चन्द्र शेखर इतने उदार मना थे कि उन्होने साथ छोड गये लोगों का भी बुरा नही माना. हां हाजरी लगाने ये लोग फिर भी यदा कदा तीन साउथ एवेन्यू जाते रहते थे. आखिर वे एक सच्चे राजनैतिक संत थे और अपने राज नैतिक प्रतिद्वन्दियों को भी पूरा सम्मान देते थे.

रविवार को जब तीन साउथ एवेन्यू गया तो सबको वहां देखा, जिनकी राजनीति अध्यक्ष जी की छत्रछाया में विकसित,पल्लवित,पुष्पित हुई. एक पूरा विकसित सुवासित चमन वहां गुल्ज़ार हो रहा था किंतु इस चमन का असली माली ,भोंडसी का संत बहुत दूर से यह नज़ारा देख रहा था.
मेरी विनम्र श्रद्धांजलि

Saturday, July 7, 2007

बारिश के मौसम में धूप की गज़ल


पेड़ से छन कर आई धूप


हरी घास पर छाई धूप .



बादल का गर्जन सुनकर,


बारिश को ललचाई धूप.



एक पुराने गाने सी


लगती सुनी सुनाई धूप



जाड़ों में अच्छी लगती है


गरम गरम अलसाई धूप.



अपनी छवि को देख नदी में,


खुद से ही शर्माई धूप .



नदी किनारे रेत पे गिरकर ,


लेती है अंगड़ाई धूप.



खूब फुदकती टुकड़ा टुकड़ा


बादल ने सरकाई धूप.



इन्द्रधनुष के संतूरों पर


सबने खूब बजाई धूप.



नंगे पर्वत, सोती नदिया


देख देख बौराई धूप.



खेत में बिखरे दाने दीखे,


फूली नहीं समाई धूप.




बारिश के मौसम में अक्सर


पड़ती नहीं दिखाई धूप.









Friday, July 6, 2007

कठपुतली या रबर् स्टाम्प ?


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी


पूजना सब चाहते थे अपने अपने इष्ट को,
सबने आलों में सजाकर अपने ईश्वर रख लिये.

राष्ट्रपति के चुनाव में अब सभी ने अपने अपने पत्ते खोल दिये हैं और यू पी ए ,यु एन पी ए अथवा एन डी ए ,सभी का रुख सामने है.
यदि देश की राजनैतिक हवा में कोइ तूफान नही आया तो पहली बार एक महिला का राष्ट्रपति होना तय है.

आजकल टेलेविजन पर जब भी कान्ग्रेसी प्रत्याशी का जिक्र होता है, एक ही विजुअल दिखाया जाता है जिसमें प्रतिभा जी का हाथ पकड कर सोनिया जी अपने घर के अन्दर ले जा रही हैं.
कितना सिम्बोलिक है यह विजुअल?
कहने वाले कहते रहे कि पहले सात रेसकोर्स पर एक पुतला सरीखा ( हांलांकि बहुत काबिल भी !!!) व्यक्ति बिठाया और अब रैसीना पहाडी पर भी एक कठपुतली के माध्यम से कब्ज़ा कर लिया ,भले ही लोग उसे 'दागी' कहते रहें,की फर्क़ पैन्दा है ?

जहां तक कठपुतली या रबड स्टाम्प की बात है, तो मेरा स्पष्ट मानना है कि कोइ भी कितना भी योग्य, कितना भी स्वतंत्र या किसी भी अन्य योग्यता वाला व्यक्ति इस पद पर लाया जाता ( या पहले भी लया गया) ,काम तो उसने भी सम्विधान के दायरे में ही तो करना था. और सम्विधान हमारा ऐसा है कि राष्ट्रपति को 'मर्ज़ी ना मर्ज़ी बेगार करनी ही पडेगी'वाली बात है.
क्योंकि सम्विधान में जो राष्ट्रपति के अधिकार व कर्तव्य गिनाये गये है ,क्या आपने उन पर गौर फर्माया है ? यदि नही तो देखिये :

सबसे पहले धारा 74 को ही लीजिये. जब तक यह धारा सम्विधान में इसी रूप में रहेगी तब तक राष्ट्रपति एक कठपुतली मात्र ही बन कर रहेगा. उसके अपने अधिकार तो सारे इस धारा ने छीन रखे है.

धारा 72, 75,78,85,86,103,111,143 तथा 201 में राष्ट्रपति के पास जितने भी अधिकार है, सारे के सारे फैसले जो राष्ट्रपति ले सकता है, उनमें से एक भी राष्ट्रपति फैसला स्वयम का न होकर मंत्रिमंडल की "सलाह" पर ही हो सकता है.
पिछले अनेक वर्षों के उदाहरण हमारे सामने है, जहां यदि राष्ट्रपति ने मंत्रिमंडल का कोई फैसला वापस भी किया है, तो दुबारा सिफ्आरिश आने पर मज़्बूर होकर स्वीकार भी करना पडा है.

सम्विधान की इन धाराओं के चलते राष्ट्रपति तो एक प्रकार का बन्धुआ मज़्दूर जैसा ही दिखता है.
फिर क्या फर्क़ पडता है यदि प्रतिभा जीतें या भैरों सिंह जी. जो भी जीतेगा उसे सोने के पिंजरे में बन्द तोते की भूमिका ही निभानी है.

Thursday, July 5, 2007

गरीबी की रेखा: अमीरी की रेखा









इधर कुछ खबरें ऐसी आयीं हैं जो हमको ,आपको,सबको सोचने पर मज़बूर करने वाली हैं. मुझे ज्यादा फर्क़ नही पडा जब खबर आयी कि कार्लोस ने बिल गेट्स को पीछे छोडते हुये अमीरी की सूची में पहला स्थान बना लिया.परंतु में हिल सा गया जब मैने पढा कि एक दलित नेता ने अपनी सम्पत्ति की घोषणा की और कहा (या कहने का दुस्साहस किया) कि मेरे पास 52 करोड रुपये की सम्पत्ति है. मै सोचने पर फिर मज़बूर हुआ जब खबर आयी कि अज़ीम प्रेम ज़ी के पास 15 हज़ार करोड की पूंजी है, या मुकेश अम्बानी अपने महल के निर्माण पर 250 करोड रुपये खर्च करने वाले है. इन सब खबरों को यदि अलग अलग देखा जाये तो शायद विशेष फर्क़ नही पड़्ता .परंतु जब इन खबरों के साथ आप को ज्ञात हो कि भारत की 30 प्रतिशत जनता की रोज़ाना कमाई एक अमरीकी डालर ( अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गरीबी का यही पैमाना है)से भी कम है ,यानी कि लगभग 40 रुपये रोज़ से भी कम, तो फिर एक बार आप सोचने पर मज़बूर होते हैं या नही, यह दर्शाता है कि आपअपने आसपास के परिवेश से कितने जुडे है और आपकी सम्वेदनशीलता कितनी है.

एक क्षण को यदि हम मान भी लें कि आखिर इसमे हम कर ही क्या सकते है. किसी भी समाज में बराबरी तो सम्भव है ही नही ( जी हां, कम्युनिष्ट देशों में भी नही, और इसके बहुत से प्रमाण मौजूद हैं) और हर व्यक्ति अपनी अपनी किस्मत लेकर ही पैदा होता है. गरीब यदि अपनी किस्मत से ही गरीब है तो अधिक कुछ नही तो इतना तो कर ही सकते है कि कभी कभार अपनी आइसक्रीम एक दिन छोड़्कर उसकी कुछ मदद कर दी जाये.

किंतु इससे भी बडा प्रश्न है कि क्या उपभोग की भी कोई सीमा होनी चाहिये ? हाल ही में ज्ञात हुआ कि ब्राज़ील के सओ-पोलो नगर में जितने भी अरबपति हैं वे 50 -50 फुट ऊंची चहार्दीवारी बनाकर अपने मकानों के अन्दर क़ैद होकर रहने पर मज़्बूर हैं क्योंकि आसपडोस में निकल भी आये तो लुटेरे उन्हे लूट लेंगे एसा खतरा है. ऐसी बदबूदार अमीरी ( अंग्रेज़ी के स्टिंकिंग रिच का अनुवाद) वाले लोगों के लिये क्या कोई अमीरी की रेखा होनी चाहिये?

हम यह आकलन करते है कि एक व्यक्ति को कम से कम कितनी आय होनी चाहिये कि वह दो वक़्त पेट भर कर खाना खा सके. इसे हम गरीबी की रेखा मानते है. संयुक्त राष्ट्र संघ व उसकी अन्य एजेंसियां इस सीमा को एक डौलर प्रतिदिन मानती हैं . भारत में यह सीमा प्रतिदिन कार्य के लिये आवश्यक ऊर्जा ( कैलोरी में) पर आधारित की गयी है. इसी प्रकार हम आकलन कर सकते हैं कि एक व्यक्ति को एक दिन में अधिकतम कितनी ऊर्जा चाहिये तथा वह ऊर्जा महंगे से महंगे किन श्रोतों से प्राप्त हो सकती है.विलासिता के महत्तम साधन जुटाने के लिये प्रति-व्यक्ति प्रतिदिन कितने धन की आवश्यकता होगी, इसका आकलन कोई विशेष कठिन तो नही होना चाहिये.

यदि एसा किया जाये तो अमीरी की रेखा कहा निश्चित हो, इस पर सोच विचार की आवश्यकता है. मैँ इस काम पर लगा हूं और शीघ्र ही विस्तार से इस विषय पर चर्चा करूंगा. कृपया अपने मत से अवगत करायें.