Sunday, January 31, 2010

एक अहसास का नाम है मां

भाई समीरलाल (उड़न तश्तरी)ने मां को याद किया तो प्रतिक्रिया स्वरूप मुझे मेरी वह " मां" शीर्षक रचना याद आ गयी ,जो वर्षों पहले मेरे संग्रह " चीखता है मन " में प्रकाशित हुई थी. भाई समीरलाल जी को समर्पित रचना पेश है:

अपने आगोशोँ मे लेकर मीठी नीँद सुलाती माँ
गर्मी हो तो ठंडक देती, जाडोँ मेँ गर्माती माँ

हम जागेँ तो हमेँ देखकर अपनी नीँद भूल जाती
घंटोँ,पहरोँ जाग जाग कर लोरी हमेँ सुनाती माँ

अपने सुख दुख मेँ चुप रहती शिकन न माथे पर लाती
अपना आंचल गीला करके ,हमको रहे हंसाती माँ

क्या दुनिया, भगवान कौन है, शब्द और अक्षर है क्या
अपना ज्ञान हमेँ दे देती ,बोली हमे सिखाती माँ

पहले चलना घुट्ने घुट्ने और खड़े हो जाना फिर
बच्चे जब ऊंचाई छूते बच्चोँ पर इठलाती माँ

उसका तो सर्वस्व निछावर है,सब अपने बच्चों पर,
खुद रूखा सूखा खा लेती है, भर पेट खिलाती मां.


जब होती है दूर हृदय से प्यार बरसता रहता है
उसकी याद बहुत आती है, आंखे नम कर जाती मां

–अरविन्द चतुर्वेदी

Wednesday, January 27, 2010

तुलसी इस संसार में भांति भांति के ब्लॉग

पिछले दो दिन से अस्पताल के बिस्तर पर पड़ा पड़ा ब्लोगवाणी व चिट्ठाजगत पर ढूंढ ढूंढ कर ब्लोग पढ़ रहा हूं.15 -20 कमेंट भी मार चुका हूं ( इतनी टिप्पणियां तो महीने भर में भी नहीं हो पाती) इतने दिनों से समय भी नहीं मिल पा रहा था. डाक्टर ने कहा था आज अस्पताल से छुट्टी मिल जायेगी परंतु फिर निर्णय बदल दिया. एक तरह् से अच्छा हुआ. कल घर से लेपटोप मंगवा कर एक दिन के वाई फाई कनेक्शन के लिये दिये 200 रुपये वसूलने थे और सेहत पूरा साथ दे रही थी ,ऊपर से डाक्टर से अनुमति भी मिल गयी थी.

जो ब्लोग कभी पढे नहीं थे ,उन पर भी तांक झांक कर आया . अपनी पसन्द के उन ब्लोगों की पुरानी पुरानी पोस्ट का भी ढूंढ ढूंढ कर जायज़ा लिया. यहां वहां टिप्पणी मार कर खुद को खुश कर लिया. बीच बीच में ब्लोगवाणी व चिट्ठाजगत का चक्कर भी लगा आया .

हिन्दी ब्लोगिंग का एक नया रूप देखने को मिला. कुछ नये ब्लोग्गर अच्छा लिख रहे हैं. हां, वाद् विवाद् भी साथ साथ बढते जा रहे हैं.

विविधता बहुत बढ गयी है जो एक अच्छा लक्षण है.

हैप्पी ब्लोग्गिंग.

Tuesday, January 26, 2010

क्या पैमाना होता है पद्म पुरुस्कारों का

फिर आई 26 जनवरी और फिर हुआ रेवड़ियां बांटने का सिलसिला . किसी को चोट ना पहुंचे परंतु फिर भी साल -दर- साल उठने वाले इस प्रश्न का कोई संतोषजंक उत्तर कहीं से भी नहीं आता.

पद्म विभूषण, पद्म भूषण एवम पद्म श्री उपाधियां दिये जाने की न तो प्रक्रिया पारदर्शी बनाई जाती है और नही ही ऐसे नामों पर विचार किया जाता है जिन्हे वास्तव में राष्ट्र द्वारा सम्मानित किया जाना चाहिये.

1977 में जनता पार्टी सरकार ने इन पद्म पुरुस्कारों पर रोक लगाकर एक अच्छा कदम उठाया था, परंतु बाद की सरकारों ने न्यायिक प्रक्रिया द्वारा फिर बहाल करवा लिया.

आखिर किसका प्रयोजन सिद्ध होता है इन पुरुस्कारों से?
ज़ाहिर है कि इसमें निज़ी स्वार्थ ,भाई -भतीजावाद ,'तू -मेरी कह मै-तेरी' अव्यावहारिक नीतियां ही ज़िम्मेदार हैं .

जैसा कि मैने पहले कहा किसी एक य दो नाम लेने से कोई लाभ नहीं ,ये पब्लिक है सब जानती है.

इन पुरुस्कारों पर रोक लगाना ही उचित होगा.

Saturday, January 23, 2010

छोटे लोहिया नहीं रहे


जनेश्वर मिश्र नहीं रहे . जैसे ही यह समाचार टी वी पर दिखा एकदम से भोंचक्का रह गया. साठ के दशक से वह समाजवादी आन्दोलन के एक प्रमुख स्वर थे. उन्हे राम मनोहर लोहिया के सच्चे अनुयायी के रूप मे गिना जाता था .और इसीलिये उन्हे छोटे लोहिया का प्यारा सम्बोधन दिया गया था. कद काठी में भी लोहिया जैसे ही दिखने वाले जनेश्वर जी एक प्रभावी वक्ता थे. जनसभाओं में जब भी मंच पर आते अपने अनोखे तर्कों और तथ्यों से भरे भाषण से जनता को मंत्र मुग्ध करने की असीम क्षमता का भरपूर उपयोग करते और सुनने वाले प्रभावित हुए बिना नहीं रहते थे.

1969 की पहली कांग्रेस विरोधी लहर में उत्तर प्रदेश के जिन प्रमुख राजनेताओं को जनता ने राजनैतिक क्षितिज पर स्थापित किया उनमें जनेश्वर मिश्र प्रमुख थे. ( आज की समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष मुलायम सिंह तब नये नये विधायक ही बन पाये थे ,और वह भी जनेश्वर मिश्र को अपना गुरु मानते थे). पहले फूलपुर ( जहां से एक बार पंडित नेहरू जीत कर आये थे) और बाद में वी पी सिंह सरीखे व्यक्ति को इलाहाबाद से हराकर लोकसभा में पहुंचे. अनेक बार राज्य सभा में रहे.छोटे लोहिया उन गिने चुने विपक्षी नेताओं में थे, जो लगभग हर एक गैर कांग्रेसी सरकार ( भाजपा के अतिरिक्त)में मंत्री रहे.

जनेश्वर जी अजातशत्रु की तरह थे. उन्होने मित्र ही बनाये और राजनीति मे दुश्मन कोई नहीं बनाया. हालांकि बाद के वर्षों में समाजवादी आन्दोलन के बिखरने व भ्रष्ट होने से खिन्न ज़रूर थे . पार्टी में उनके कद व वरिष्ठता की वावज़ूद अपेक्षित महत्व नहीं मिला किंतु फिर भी अपने चेले मुलायमसिंह की पार्टी में बने रहे.

जनेश्वर जी ने केन्द्र सरकार में अनेक विभागों का दायित्व सम्भाला किंतु काजल की कोठरी से बिलकुल बेदाग ही निकले.

उनके जाने से समाजवाद का एक सच्चा प्रवक्ता हमारे बीच से चला गया जिसकी पूर्ति सम्भव नही है क्यों कि अब वह समाजवाद ही कहां रह गया है, जिसके लिये जनेश्वर मिश्र जैसे लोग संघर्ष करते रहे.

अनेक अवसरों पर मेरी उनसे भेंट हुई. 1992 मे 17 अप्रेल को जब चन्द्रशेखर जी का जन्मदिन भोन्डसी ( गुड़्गांव) में मनाया गया तब मैं भी मौज़ूद था. भोजन आदि के बाद कार्यकर्ता जाने लगे थे.चन्द्रशेखर जी ने साथ मेज़ पर बैठ्कर मेरे लिये व जनेश्वर जी के लिये पत्तल मंगवाई. उसी अवसर का चित्र ऊपर है, चित्र में जनेश्वर जी व चन्द्रशेखर जी के बीच में मैं भी.

मेरी विनम्र श्रद्धांजलि.

Friday, January 1, 2010

कैसे कैसे बधाई सन्देश्

एक ज़माना था ज़ब आम तौर पर बधाई सन्देश के लिये हाथ से बनाये हुए विशेष ग्रीटिंग (बधाई) कार्ड का प्रयोग होता था. कार्ड खरीदने बाज़ार जाने वाले लोग ऐसे कार्ड ढूंढने का प्रयास करते थे जिसमे सन्देश ( की इबारत) 'ज़रा हट के' हो और जो पाने वाले का तुरंत ध्यान आकर्षित करे.

अब बधाई कार्ड का स्थान अधिकांश्त: ई-मेल या एस एम एस ने ले लिया है.

जब से मोबाइल पर एस एम एस ( SMS ) का चलन चला है ,फोन कम्पनियों की कमाई का एक बड़ा हिस्सा विशेष अवसरों पर दिये जाने वाले इन सन्देशों से ही आता है. यही कारण है कि मोबाइल सेवा प्रदाता कम्पनियां अत्यंत ही रोचक सन्देशों को विशेषज्ञ लेखकों से लिखवाती हैं और प्रचारित करती हैं.

अनेक बार ऐसा भी होता है कि आप को कोई सन्देश प्राप्त होता है और वह इतना मन को भा जाता है कि आप किसी न किसी को वह सन्देश भेजने का लोभ संवरण नहीं कर पाते ( भाई कोई इंटेलैक्चुअल प्रोपर्टी राइट्स की तो बात नहीं है ना!!) ज़ाहिर है कि आप फिर भी मोबाइल सेवा प्रदाता कम्पनियों के खाते में इज़ाफा कर रहे होते हैं.

ऐसा नहीं है कि विशेष अवसरों पर रोचक ( या कुछ हट्के) किस्म के सन्देश सिर्फ मोबाइल सेवा प्रदाता कम्पनियां ही रचती हैं, बल्कि इन अवसरों पर बिकने वाले बधाई कार्ड बनाने वाली कम्पनियां भी इसी प्रयास में रहती हैं कि उनके कार्ड 'कुछ अलग' से लगें.

कुछ 'अलग सा सोचने वाले ' लोग भी अपने सन्देश स्वयं ही गढ़ते हैं. ऐसे व्यक्तियों को कभी कभी बुरा भी लगता है कि बहुत सोच विचार कर लिखा गया उनका सन्देश अन्य लोग ( पाने वाले) नक़ल करके आगे भेजने लगते हैं.
नव वर्ष के अवसर पर जो बधाई सन्देश मुझे प्राप्त् हुए उनमे कुछ ऐसे थे जिनका उल्लेख इस श्रेणी के सन्देशों में किया जा सकता है. मोहिन्दर कुमार जी से प्राप्त सन्देश कुछ यूं था --

पक्षियों की तरह हम भी वह सब पीछे छोड़ दें
जिसकी हमें आवश्यकता नहीं है ...
द्वेष, घृणा, उदासी, पीड़ा एंव पश्च्याताप
जीवन अमूल्य है ...
आईये २०१० में हम इसमें जोडें
मैत्री, प्रेम, प्रसन्नता, उल्लास एंव विश्वास
नव वर्ष की शुभकामनाओं के साथ

इस सन्देश को बाद में मैने अंग्रेज़ी अनुवाद के साथ (तथा कुछ संश्लेषित रूप मे ) प्रयोग भी किया.

शैलेश भारतवासी ने ओर्कुट पर सन्देश भेजा वह भी उल्लेखनीय है:----
हरी धरती
साफ़ पानी
महकती हवा
गुनगुनाती चांदनी
मुस्कुराती धूप
बेशोर बस्ती
खुशदिल और खुशनुमा चेहरे ;
आसमां वाले !
तू अगर दे दे
तो ये खुशियाँ बहुत हैं
इस नए साल में...............


मेरे ममेरे भाई मलय चतुर्वेदी ने एस एम एस भेजा जो मुझे बेह्द गुदगुदाने वाला लगा तथा पसन्द आया :---
(मूल अंग्रेज़ी/ रोमन में, यथा सम्भव् अनुवाद मेरा है)
2010 आ रहा है.आपको नव वर्ष, जन्म दिन,गणतंत्र दिवस , वेलेंटाइन दिवस, बसंत पंचमी, होली, 15 अगस्त, फ्रेंडशिप दिवस, मदर्स डे, फादर्स डे, शिक्षक दिवस, चिल्ड्रेंस डे, दादा डे,डादी डे, नाना -नानी डे, आदि सभी..365 दिन सुप्रभात, शुभ दिन, शुभ रात्रि, स्वीट ड्रीम्स ..
साला... रोज़ का ड्रामा ही खतम.
अब पूरे साल मत कहना कि एस एम एस नहीं किया...


यह तीन सन्देश तो मात्र नमूना हे हैं. और भी कई सन्देश हैं जिनका ज़िक्र फिर कभी...
आप सभी को भी ऐसे ही अनेक हंसाने वाले, गम्भीर, विचित्र,सचित्र ,अद्भुत ... सन्देश मिले होंगे.

सभी के साथ साझा करें ..

प्रतीक्षा रहेगी ...

काल चिंतन के कालजयी लेखक को श्रद्धांजलि


कादम्बिनी के पूर्व सम्पादक श्री राजेन्द्र अवस्थी नहीं रहे. अवस्थी जी सही अर्थों में एक साहित्यकार-पत्रकार थे. उन्होने जहां एक पत्रकार के रूप मे मापदण्ड स्थापित किये वहीं अपने साहित्य सृजन मे अद्भुत सफलता प्राप्त की.

कादम्बिनी के सम्पादकीय काल में काल चिंतन के माध्यम से पाठ्कों को विचारों की एक पूरी श्रंखला दे गये. कादम्बिनी पत्रिका के तंत्र मंत्र विशेषांकों को संग्रहणीय बनाने मे अवस्थी जी की सामग्री चयन व सम्पादकीय नीति का ही योगदान था.

एक गम्भीर विचारक और वक्ता के रूप में भी अवस्थी जी का विशेष सम्मान हासिल था. समाज, साहित्य, पत्रकारिता ,राजनीति आदि विषयों पर सम्भाषण हेतु गम्भीर विषयों पर सारगर्भित विचारों के लिये अवस्थी जी को अक्सर सभा, गोष्ठियों में आमंत्रित किया जाता था और वहां श्रोता बड़े ध्यान से उनकी बात सुनते थे.

मेरे दूसरे काव्य संन्ग्रह चीखता है मन के विमोचन के अवसर ( सन 2000 ,स्थान कांस्टीट्यूशन क्लब,नई दिल्ली) पर वह उपस्थित थे और उन्होने हिन्दी गज़ल एवम हिन्दी कवि सम्मेलनों की परम्परा पर अपने विचार व्यक्त किये. वह हिन्दी कवि सम्मेलनों में बढ़ती फूहडता व चुटकुले बाज़ी से नाखुश थे.

काल चिंतन के कालजयी लेखक को मेरी विनम्र श्रद्धांजलि.

(ऊपर चित्र में मेरे गज़ल संग्रह के विमोचन के अवसर पर श्री राजेन्द्र अवस्थी एवम श्री सत्य नारायण जटिया के साथ मैं भी उपस्थित)