Sunday, May 16, 2010

मेरी यूरोप यात्रा -8- पेरिस का पहला दिन्


पेरिस में हमारे साथ आये छात्र गाइड पीटर ने हमारे मतलब की सारी जानकारी एकत्र कर रखी थी. जब हमने एकमत से कहा कि अब दिन भर के बाद खा रहे हैं तोभारतीय खाना ही मिले तो बेहतर . उसने तुरंत वह ज़गह बता दी जहां हमारी पसन्द का खाना मिल सकता था.

उसने तुरंत हम सभी को व्यक्तिगत रूप से मेट्रो की दो दो टिकटें दीं और कहा कि एक जाने के लिये और दूसरी वापस आने के लिये.


पेरिस में मेट्रो की 1 घंटे की टिकट लगभग डेढ़ यूरो ( नब्बे भारतीय रुपये) की होती है. इस टिकट से यात्री कितने ही बार अलग अलग रूट पर यात्रा कर सकता है बशर्ते यात्रा एक ही घंटे में पूरी की गयी हो. पेरिस में मेट्रो का ज़ाल बिछा हुआ है. क्रिस क्रोस करती हुई तेरह भिन्न लाइनें हैं अनेक स्टेशनॉं पर दो तल व किन्ही पर तीन तल के मेट्रो स्टेशन हैं यह तेरह विभिन्न लाइनें हर दूसरे या तीसरे स्टेशन पर एक दूसरे से मिलती हैं और यात्री यहां ट्रेन बदलते हैं . पूरी पेरिस का सफर इन मेट्रो व बसों से के ऊपर निर्भर है.


चूंकि पीटर साथ में था अत: आवश्यकता नहीं थी, फिर भी पेरिस की मेट्रो का नक़्शा व गाइड लेकर देखा तो एक बार देखने से ही पूरी पेरिस का सफर समझ में आ गया. न केवल गाइड में बहुत ही सरल तरीके से जानकारी दी गयी है, बल्कि हरेक स्टेशन पर इतने सहज दिशा संकेतक हैं कि नया व्यक्ति भी तुरंत सब कुछ समझ सके. यह सब इस्लिये कि पर्यटक यदि फ्रेंच भाषा नहीं भी जानता तो कोई दिक्कत नहीं .

तीन बार मेट्रो बदल बदल कर हम पहुंचे Rue Jarry ( Rue का मतलब है street यानी गली ). रयू जार्री पहुंच कर लगा कि हम किसी एसियाई बस्ती में हैं. भारतीय, पाकिस्तानी व श्रीलंकाई लोग अपनी भाषा में ज़गह ज़गह बात करते दिखे. यहां इन्दिरा रेस्त्रां था, तो कृष्ण भवन भी. साड़ी की दुकान भी और हिन्दी सीडी ,डीवीडी की दुकान भी.इस गली में दो बडे जनरल स्टोर भी दिखे. टूथपेस्ट खरीदने एक में गया तो लगा कि स्टोरे ऎशिय्याई खरीदारों के लिये ही था. भारतीय नमकीन से लेकर घरेलू उपयोग की सामग्री तक ,फूलमाला ,चन्दन ,दुपट्टे....सभी कुछ भारत जैसा.



हममें से कुछ ने कृष्णा भवन में शाकाहरी दक्षिण भारतीय् खाना खाया तो अन्य ने इन्दिरा रेस्त्रां मे चिकेन के साथ बीयर का लुत्फ भी उठाया. वे लोग खुश थे क्यों कि बीयर के साथ चिकेन हमारे शकाहारी खाने की तुलना में सस्ता था.

तीन बार मेट्रो बदलते हुए लग्भग 11.30 बजे वपस होटल पहुंचे.होटल सिटाडाइन में बहुत ही आरामदायक कमरे थे , साथ में किचनेट भी ठीक परंतु हमारे पास चाय बनाने का कुछ सामान नहीं था. किंतु लोबी में 24 घंटे चाय.कौफी मुफ्त उपलब्ध थी. नेट पर पहले मेल चेक की , फिर सोने से पहले ‘मुफ्त’ कौफी का आनन्द लेने लौबी में गया.
पेरिस का पहला दिन लाज़बाब था.
( आगे.. पेरिस में बहुत कुछ है ..)

Tuesday, May 11, 2010

मेरी यूरोप यात्रा-7 पेरिस आखिर पेरिस है !



पेरिस पहुंचना ही एक रोमांचकारी अनुभव लगा. 1987 में पहली बार जब यूरोप आया था (तब स्पेन- मैड्रिड व वेलेंसिया, तथा स्वित्ज़र्लेंड -जिनेवा ही देख पाया था) तब इतना रोमांच कारी अनुभव मैड्रिड में भी हुआ था. लग्भग दो घंटे हम पेरिस को खुली बस की दूसरी मंज़िल से देखते रहे , सराहते रहे और सच कहूं तो ( इस पचपन की उम्र में भी ) एक बचकानी सी खुशी महसूस करते रहे.

पेरिस के अनेक दर्शनीय स्थलों पर एफिल टोवर का रुतबा इस कदर हावी है कि दो घंटे के दौरान कम से चार बार हम एफिल टोवर के चारों ओर से गुजरे. पेरिस यानी एफिल टोवर. बाकि सब दोयम .

बस् के ऊपर से पेरिस के बहुत से चित्र लिये और पेरिस को ‘महसूस ‘ किया. यह भी देखा कि पेरिस घूमने आने वालों मे साइकल से घूमने वाले बहुत हैं. बताया गया कि यहां एलेक्ट्रिक साइकल भी किराये पर मिलती हैं. दिन भर के लिये . साइकल पर घूमने वाले विशेष हेलमेट भी पहनते हैं ,वैसे यह शौक सिर्फ पेरिस या फ्रांस में ही नहीं पूरे यूरोप में है.
सडक किनारे वाले चाय,काफी ,बीयर बार यहां भी बहुत हैं,एक प्रकार से यह संस्कृति का ही एक अंग है.


‘चढ़ो-उतरो फिर चढ़ो-उतरो’ इस प्रकार की बस की सैर का पहला अनुभव मुझे 2004 में कोपेनहेगेन में हुआ था. इस प्रकार के विकल्प में पर्यटक वह सभी कुछ मनचाहे रूप में देख सकता है,बिना किसी बन्धन के. हांलाकि हमारे पास यह विकल्प था, परंतु हम लोग पूरे दो घण्टे बस पर ही सवार रहे और पेरिस को ऊपर –ऊपर से ही देखते रहे. सीमित समय में सभी कुछ ,जो दर्शनीय था, हम देखना चाहते थे.बस के समय की समाप्ति पर सेन नदी ( पेरिस भ्री सभी मुख्य यूरोपीय नगरों की भांति नदी के इर्द-गिर्द ही है) पर बोट-क्रूज़ का भी कार्यकृम था,अत: हम यहां-वहां उतर कर शाम के कार्यकृम में कटौती नहीं करना चाहते थे.

पेरिस के विभिन्न चर्च, ओपेरा, एफिल टोवर,तमाम म्यूजियम,मुख्य बाज़ार, सत्ता के केन्द्र व सदन , कभी सेन नदी के किनारे किनारे तो कभी मुख्य बाज़ार सभी का आनन्द लिय बस के ज़रिये.

जैसे ही बस –यात्रा समाप्ति पर उतरे ,हम बोट क्रूज़ के निर्धारित स्थान की ओर चल दिये.
वहां टिकट बुक करने पर पता चला अभी अगली बोट के लिये 20मिनट और हैं. अब हमने ( अजय और उसका कैमरा भी साथ दे रहे थे)लोगों को देखना शुरू किया.फोटो भी साथ साथ लेते जा रहे थे. फुटपाथी दुकानदार व हौकर्स पर नज़र गयी तो पाया कि अधिकांशतया वह सभी दो वर्गों के ही हैं . एक अफ्रीकी मूल व दूसरी गठेले बदन वाले एसियाई. लगा कि वे या पाकिस्तानी या भारतीय हो सकते हैं . एक सिख भी दिखा.हमने मोलभाव भी शुरू कर दिया था. शायद यह उन्हें पसन्द नहीं आया. ( यह एक –दो अफ्रीकी दुकानदार के चेहरे के हाव-भाव से जाना. बाद में बात-चीत से पता चला कि एशियाई हौकर्स हरियाणा ( भारत) के थे परंतु अधिकांश के पास कोई लाइसेंस नहीं था. जैसे ही कोई पुलिस वाला देखते वह भागने लगते.( हमारे यहां कहतें हैं –भागो भागो कमेटी आ गयी- जब भी वह म्युनिसिपल कमेटी के अथवा पुलिस के लोगों को देखते हैं-भागने लगते हैं)


खैर, समय होने पर हमने बोट-क्रूज़ का आनन्द लिया. लगभग 90मिनट के क्रूज़ के बाद महसूस किया कि पेट में चूहे कूद रहे थे. सुबह से बस चना-चबेना ही चल रहा था, कोई पूरा भोजन नहीं किया था. पीटर ने पूछा कि किस तरह का खाना हम पसन्द करेंगे तो हम सब का उत्तर था यदि भारतीय मिले तो अच्छा.

( आगे .. पेरिस में भारतीय खाना ??)
video

Monday, May 10, 2010

मेरी यूरोप यात्रा 6-- नमस्ते भी सुना ,सौरी भी. हार्ली डेविडसन की फोटो



मैने पिछली पोस्ट में मोटर साइकल हार्ली डेविडसन का ज़िक्र किया था और यह भी लिहा था कि हमने उसके फोटो भी खींचे. भाई विवेक रस्तोगी ने एक छोटे से कमेंट में इसकी मांग जैसी(?) की है. अत: पहले फोटो
दिन भर के सैर् सपाटे ने थका तो दिया था. सोचा था कि रात को हल्का भोजन या फिर दूध-फल से काम चला लेंगे. पहले दिन के लाये फल अभी खत्म नहीं हुए थे और दूध की बोतल भी लगभग भरी थी. कल सुबह पेरिस की यात्रा पर निकलंने का प्रोग्राम था. कमरा भी खाली करना था क्यों कि पेरिस से वापसी 20 अप्रैल रात की तय थी.

किंतु सामान वापस मिलंने की खुशी भी celebrate करना था, अत: वीरैया व अजय के साथ मार्केट जाने का फैसला हुआ. उन्होंने बोम्बे पेलेस नामक एक रेस्त्रां देख रखा था. तय हुआ कि वहीं चलना है. ग्रेनोबल शहर बहुत बड़ा नहीं है. 25 मिनट की पैदल यात्रा करके हम के बोम्बे पेलेस पहुंच गये. सुना था कि यहां की बिरयानी व लस्सी मशहूर है. मुंह में पानी लिये हम एक टेबल पर बैठ गये. वेटर आया तो उसने बताया कि यह हिस्सा पार्टी के लिये आरक्षित है और उसने हमॆं दूसरी टेबल बता दी. हमने मेन्यू देखना शुरु किया. तभी हिमाचली टोपी व सिल्क का पठानी सूट पहने एक सज्जन नमूंदार हुए और पूछा कि क्या हमने सीट बुक की हुई है? हम हैरान.कहा नहीं ,बुक तो नहीं की है.
“ I am sorry” ,उसने कहा था.

“ आज सारी सीट पहले से बुक हैं ,हम आपकी सेवा नहीं कर पायेंगे”
“ I am sorry” ,उसने कहा था.

बुरा तो लगा ,परंतु कर ही क्या सकते थे . कानों में शब्द गूंज रहे थे.
“ I am sorry” ,उसने कहा था.

बड़े बे-आबरू होकर उसके कूचे से निकल कर हम सोच ही रहे थे कि कहां जायें ,तभी बिल्कुल सामने की सडक पर - –लग्भग सामने-“श्रीलंका रेस्त्रां” नाम के साइन बोर्ड पर नज़र गयी.सोचा कि कोई तमिल भोजनालय होगा ट्राई करने में क्या हर्ज़ है. अन्दर जाते ही बडे आदर के साथ बैठाया गया. मालिक ( यहां ज्यादातर भारतीय रेस्त्रां चलाने वाले मध्यम दर्ज़े के ही हैं और स्वयम या उसके घर के सदस्य भी खुद काम में हिस्सा बटाते हैं) .मालिक ने अपना परिचय देकर पूछा कि हम् कहां के हैं?
मेन्यू पूरा भारतीय था. हमने नान, दाल मखनी , मिक्स्ड वेजीटबल मंगाया. बाद में एक प्लेट फ्राईड राइस भी लिया. स्वाद भी ठीक ही था, बहुत ज्यादा तारीफ लायक भी नहीं.
वापस लौट कर सामान पेक करना था. हमारी पेरिस की यह यात्रा भी ‘ग्रेनोबल एकोल डी मेनेजमेंट’ की ओर से प्रायोजित थी, और हमारे साथ एक वरिष्ठ छात्र, जिसे पेरिस की जानकारी थी, गाइड के तौर पर भेजा जा रहा था, जिसका नाम था पीटर . वह कभी भारत नहीं आया परंतु उसने भारत के बारे में बहुत कुछ पढ रखा था.पीटर, जो मूल रूप से वियेना का रहने वाला था, परंतु अधिकांश्तया इंगलेंड में रहता आया था. ने हमें बताया था कि वह क्रिकेट का शौकीन है ( शायद इंगलेंड में ही यह शौक पनपा होगा). आई पी एल के मैचों को वह यू-ट्यूब पर देखता था और मुम्बई-इंडियंस उसकी पसन्दीदा टीम थी. पीटर ने कहा था कि सिर्फ एक छोटा बेग जिसमे एकाध जोडी कपडॆ व आवश्यक सामान हो,काफी होगा. हमारा बाकी सामान एक अन्य कमरे में रख दिया जायेगा तथा पेरिस से वापस होने पर कमरा बदल भी सकता है.

मैं एक पाठ्य-पुस्तक पर काम कर रहा हूं और प्रकाशक का आग्रह था कि कुछ सामग्री भेजना ज़रूरी था. सोचा रात भारत जाग कर काम खत्म करते हैं ताकि मेल करने लायक सामग्री हो जाये. यह भी कि सोना तो ट्रेन में भी हो सकता है.

सुबह 4 बजे तक काम खत्म किया. प्रकाशक को मेल भेजी, सामान की दुबारा पैकिंग की, सोते सोते 5 बज गये. अलार्म 7 बजे का था,अन्यथा ट्रेन छूटने का डर जो था.


.

18.अप्रैल को सुबह 9.15 पर स्टूडेंट गाइड Peter से स्टेशन पर मिलना तय हुआ था. ई-टिकट पहले से बुक थीं,परंतु उन्हें ट्रेन चलने के पहले इंडोर्स करना ज़रूरी था. पीटर लाइन में था. समय अधिक लग रहा था. धुक धुक होने लगी कि ट्रेन के समय तक हो भी पायेगा या नहीं. जब ट्रेन छूटने में मात्र 5 मिनट बचे थे , पीटर हांफता हांफता परंतु मुस्कुराता हुआ आता दिखा. पहले हम प्लेटफार्म की तरफ भागे फिर निर्धारित डब्बे की ओर.
साढे तीन घंटे की यात्रा थी,सबने खूब चना चबेना इकट्ठा किया था. ट्रेन चलने पर पैकेट खुलने लगे. पीटर हमारे लिये टमाटर ( पता लगा वह औस्ट्रिया के थे), पेप्सि डाइट , वेफर्स, ले के आया था.











मुख्य स्टेशन पर लगभग 2 बजे उतर कर हमने मेट्रो ( अंडर-ग्राउंड) ट्रेन की राह पकडी, बीच में उतर कर फिर पटरी बदली और अंतत: पहुंचे –होटल सिटाडीन . अपने अपने कमरों मे चेक-इन के बाद 10 मिनट में हमॆं लोब्बी मे फिर मिलना था, ताकि 4 बजे के खुली बस के 2 घंटे के टूर पर निकल सकें. फिर भागम भाग .एफिल टावर के पास से ही बस चलती है. वहां उसी तरह हौकर ने घेर लिया,जिस तरह भारत में विदेशी पर्यटकों को घेर लेते हैं.
(आगे...कैसे किया पेरिस ने स्वागत ?)

Saturday, May 8, 2010

मेरी यूरोप यात्रा 5 - आंसी की सैर-अद्भुत् नज़ारे

भरपेट आलू ,चीज़ व घास फूस ( मेरे मांसाहारी मित्र यही शब्द प्रयोग करते हैं) खाने के बाद अब नौकायन की बारी थी. जल्दी जल्दी में गाइड से यह पूछना भूल गये कि किस बोट में हमें जाना है. खाना खाकर नदी के किनारे खरामा खरामा चलते हुए झील की तरफ बढे. झील के किनारे किनारे अनेक भोजनालय व बार हैं. इस मौसम में यूरोप वासी धूप का खूब आनन्द उठाते हैं और ओपेन एयर भोजनालय, कौफी घर या बार आदि पसन्द करते हैं.



























चूंकि यह एक पर्यटक स्थल हैयहां सब तरह के मज़मेबाज़ भी होते हैं. कहीं दो तीन गायक मिल्कर सडक किनारे गिटार या अन्य साज़ लेकर गा रहे होते हैं तो कहीं कलाकर फुटपाथ पर तस्वीरें बना रहे होते हैं. केरीकेचर (कार्टून0 बनाने वाले भी कई दिखे. कहीं कोई केनवास पर तस्वीर बना रहा था तो बोर्ड पर. सब बिक्री के लिये भी उपलब्ध थी.
झील के पास विशाल हरा भरा क्षेत्र भी था, फव्वारे भी थे, युवा युगल जोडे भी आनद के लिये सभी तरफ बिखरे थे. मेरे छात्र अजय ने अपने निकोन कैमरे से ऐसे कई चित्र लिये,उस कैमरे का ज़ूम तो गज़ब का है. सैकड़ो मीटर दूर की तस्वीर भी क्लोज- अप जैसी लगती है.

चूंकि बोट ( जिसको पेमेंट पहले ही हो चुका था) की जानकारी नहीं थी,अत: दर्ज़नों उपलब्ध विभिन्न आकार वाली ( मोटर बोट ,पेडल बोट, आदि) बोट में एक हमने 60 यूरो ( एक घंटा) में तय की.बोट स्वामी ने चलाना सिखाया और पानी में धकेल दी. एरिल ने मोटरबोट का स्टीयरिंग सम्भाला.
हमें लगा एक घंटा कुछ ज्यादा हो जायेगा तथा सोविनीयर आदि की खरीद के लिये समय नहीं बचेगा क्यों कि हमारी वापसी की ट्रेन 5.30 पर थी. यह सोच कर आधा घंटा घूम कर वापस आ गये.

बाज़ार घूमा, छुट्पुट खरीदारी करते हुए स्टेशन की तरफ जा रहे थे कि बाज़ार में एक हार्ले डेविडसन मोटर साइकिल दिख गयी. कृश्नेन्दु को इसका क्रेज़ जैसा था अत: उसीकी फोटो खींचने में लग गये. फिर बाइक के स्वामी /स्वामिनी आ गये. वे अमरीकी पुलिस के सिपाही थे.



जब मेरा सामान कल शाम तक नहीं मिला था तो मैने अपनी ट्रेवल एजेंसी को मेल भेजी थी और पूछा था कि क्या कोई बीमा का क्लेम बनता है ? जवाब आया कि ज़रूर, किंतु बीमा वाले आवश्यक वस्तुओं की खरीद की रसीद मांगेंगे. कपडों की तो किल्लत हो ही रही थी, अत: सोचा कि लगे क्लेम के लिये रसीद भी मिल जायेगी, कुछ कपड़े ( स्वेटर, कैप, अंतर्वस्त्र, धूप का चश्मा,आदि वहीं आंसी के बाज़ार से ही खरीद डाले. सोचा कि सामान तो देर-सवेर मिलेगा ही साथ ही 100 डालर का क्लेम भी मिल जायेगा.,

वापसी की त्रेन पकडकर वापस आये . जब पहुंचे तो मेरे कमरे में मेरा खोया सामान वापसी की रसीद , एयर्लाइंस का पत्र आदि सब मिल गया. खुशी हुई.




चित्र सं. 1 अद्भुत नज़ारा
चित्र सं. 2-बोट का आनन्द्
चित्र सं. 3- आंसी झील का किनारा और हम..
चित्र स.4 -अजय के कैमरे से
चित्र स. 5 आंसी में- बस यूं ही
चित्र सं. 6 पेंटिंग्स की एक लघु गैलरी
चित्र स. 7 चित्रकार ने बनाई पेंटिंग्स बाज़ार में
चित्र स. 8 गुड़िया को घुमाती गुड़िया -आंसी के बाज़ार में

(आगे---हमने ढूंढा बोम्बे पेलेस रेस्त्रां ..मगर...)

मेरी यूरोप यात्रा-4: ऐतिहासिक स्थल आंसी की सैर






















चित्र स.1 -ट्रेन का आनन्द -आंसी के रास्ते में

चित्र स. 2- ट्रेन की खिड़की से बाहर की एक झलक
चित्र स. 3- स्टेशन के बाहर शहर के मिज़ाज़ पर बयान
चित्र स. 4- पुराने शहर का एक नज़ारा
चित्र स. 5- निचले शहर का एक विहंगम दृश्य
चित्र स. 6- लीला रोज़ रेस्त्रां के अन्दर


सोते सोते देर हो गयी थी,अत: सुबह 7 बजे का अलार्म लगाया था. अपने छात्र वीरैया से भी कह रखा था कि सात बजे मुझे फोन करके जगा दे. अलार्म से जागा, किंतु फिर सो गया. आठ बजे कमरे पर दस्तक हुई तो मेरे छात्र थे दरवाजे पर.
आज सुबह 9 .35 की ट्रेन पकड़कर आनसी नामक दर्शनीय स्थल जाना था जो जिनेवा से 50-55 मिनट की दूरी पर ही है. ज़ाहिर है तैयार होने के लिये समय कम था. सामान भी नहीं आया था, अत:उन्ही कपडों से काम चलाना था. खैर,जैसे –तैसे तैयार हुआ, पूजा आदि के बाद ब्रेकफास्ट के लिये रेस्त्रां की ओर भागा. यहां पूरा कौंटीनेंटल नाश्ता उपलब्ध था. साबुत व कटे हुए फल, जुस, योगर्ट,भिन्न किस्मों की ब्रेड्स, कोर्न फ्लेक्स, मांसाहारियों के लिये उबले अंडे व हेम ...आदि., ब्रेकफास्ट के बाद भाग कर आंसी ( Annecy) के लिये ट्रेन पकडना था. स्टेशन बमुश्किल पांच-सात मिनट की पैदल दूरी पर था. निर्धारित समय ट्रेन से रवाना हुए. ग्रेनोबल से आंसी लग्भग ढाई घंटे का रास्ता था. मनोहारी दृश्यों से अटा पड़ा था हमारा सफर. बीच में तीन स्टेशन और पडे जहां ट्रेन 2-3 मिनट के लिये रुकी.
हमारे कम्पार्टॅमेंट में एक फ्रेंच फोटो ग्राफर .( अब रिटायर्ड) से भेंट हुई, जो भारत घूमा हुआ था,फिर भी अंग्रेज़ी भली प्रकार नहीं जानता था. सिर्फ फ्रेंच भाषा में ही बात कर रहा था. मेरी टीम ने मुझे ही यह कहकर आगे किया हुआ था कि मैं थोडी –बहुत फ्रेंच समझता हूं ( 1976 में अपने आई आई टी बम्बई के प्रवास में एक सेमेस्टर का कोर्स किया हुआ था और अब तक सभी कुछ भूल चुका हूं,सिवाय ‘बोंझू मस्यु’, ‘कोमां तले वू’, ‘सिल्वू प्ले ‘ ) सवाल - जवाब सभी हां ,ना, टूटे फूटे शब्दों में दोनो तरफ से हो रहे थे. खैर-इस प्रकार की बातचीत का अपना मज़ा है. सो लिया गया. ,
आंसी पहुंच कर हमें निर्धारित गाइड को ढूंढना था. मुख्य द्वार से बाहर आते ही उसने हमें पहचान ही लिया. हम छह ( मैं और मेरे संस्थान के Executive MBA के पांच छात्र.) एक भारतीय दल की तरह थे और निश्चित ही दूर से हमारी पहचान की जा सकती थी. (चूंकि कई बार पहले भी ज़िक्र आया है और आगे भी होगा, अत: इन पांचों के बारे में बताना उचित होगा- यह पांच हिन्दुस्तान एरोनौटिक्स –HAL के अधिकारी हैं जो IMI दिल्ली से 15 माह का कोर्स Executive MBA कर रहे हैं. यह हैं- Veeraiah, Ajay , Vijay Gopal ,Ezhilarasan, Krishnendu Paitandy)

ऑ दियार नाम गाइड, जो लगभग 55-60 वर्षीय महिला थी, ने आगे आकर अपना परिचय दिया और कहा कि आज दो घंटे उन्हें हमारे दल को आंसी घुमाने के लिये कहा गया है. पता चला कि उनका बेटा जयपुर ( राजस्थान विवि) में दो वर्षों से फ्रेंच टीचर है.

गाइड ने पहले हमें वहीं स्टेशन के बाहर एक फव्वारे के पास बिठाकर हमें इस ऐतिहासिक नगर की पूरी जानकारी दी और बताया कि यहां से–रोज़ 26000 फ्रेंच लोग आनसी से जिनेवा जाते हैं, क्यों कि वहां वेतन ज्यादा मिलता है. यहां से 1 घटा की दूरी है हालांकि देश दूसरा है.

फिर हम ने लग्भग दो घंटे आंसी की गलियों की धूल फांकी ( सिर्फ मुहावरा ही है, क्यों कि यहां धूल दिखी ही नहीं). सैर के दौरान ऐतिहासिक स्थान , किला, आदि देखा दुश्मनो से रक्षा के प्रबन्ध किस तरह किले में थे , घोडों के पानी पीने का स्थान , रनिवास, जेल, सिक्के ढालने का स्थान (मिंट ), आदि.. एतिहासिक चर्च , यहां बहने वाली नदी , सभी का आनन्द उठाया.
यह एक पर्यटक स्थल है और अनेक पर्यटक यहां प्रतिदिन आते हैं.यहां के एतिहासिक महत्व के अतिरिक्त स्बसे बडा आकर्षण है विशाल झील, जिसमें पर्यटक छोटी ,बड़ी सभी प्रकार की नौकाओं में नौकायन करते हैं .



हमारी गाइड हमें उस रेस्त्रां ( Le Lila’s Rose)पर लाकर छोड़ गयी और आगे के सफर ( नौकायन ) की जानकारे दे गयीं क्यों कि उनके दो घंटे पूरे हो चुके थे . हमारे अनुरोध पर कि हमारे साथ खाना खायें, गाइड ने मना कर दिया क्यों कि किसी और पर्यटक दल से समय तय था. Le Lila’s Rose नामक जगह पर जहां हमार लंच पहले से बुक था, शाकाहारी के नाम पर विभिन्न प्रकार से पकाये गये आलू ( एक विकल्प उबले-बिन छिले बड़े बड़े आलू भी था) , चीज़ ( प्रोसेस वाला,पनीर नहीं) ,तथा सलाद था. सोटे के आकार वाली बडी बडी ब्रेड ,मखन आदि में ही गुज़ारा करना था हमें ( मुझे मिलाकर कुल छह में से तीन ही शाकाहारी थे). सबसे स्वादिष्ट लगा ब्रेड को खोलते चीज़ में डुबा डुबा कर खाना. ( मेज़ पर छोटी किंतु प्रभावी बर्नर के ऊपर पतीली में चीज़ खौल रहा था, हम कांटे से ब्रेड के छोटे तुकडे डुबो कर खा रहे थे) . मांसाहारियों को मछली व सी-फूड पसन्द आया.


(आगे – नौका विहार , भारतीय रेस्त्रां मे गये तो उन्होने कहा सौरी...)

Wednesday, May 5, 2010

मेरी यूरोप यात्रा-3 पहले ही दिन दुखद समाचार


सुबह जब सात बजे सो कर उठा तो अपने घर की तरह अखबार व चाय तो मिलना नहीं था.सबसे पहले नेट पर बैठा अपने मेल चेक करने के लिये. पहली मेल संस्थान (IMI) के Registrar की थी. शीर्षक पढ़ कर ही चौंका. मेल में दुखद समाचार था कि संस्थान (IMI) के director Prof. Venkat Ratnam का निधन हो गया है. जानकर दुख हुआ.
मैं यहां आने से पहले दो तीन दिनों से प्रो.वेंकट से मुलाक़ात करने की कोशिश कर रहा था, परंतु 12, 13 व 14 अप्रैल को भेंट नहीं हुई तो मैने 14 अप्रैल को लग्भग 9 बजे उनसे फोन पर बात की थी. उनसे उनके स्वास्थ्य के बारे में पूछा तो उन्होने कहा कि अब बेहतर है. मैने उन्हें अपनी फ्रांस यात्रा के बारे में बात की . उन्हें यह भी बताया कि अफगानिस्तान सरकार से एक प्रशिक्षण कार्यक्रम की स्वीकृति मिली है तो वह बहुत प्रसन्न हुए. उन्होने पूछा कि मेरे वापस् आने तक यदि कोइ कार्य है तो वह सम्बन्धित् व्यक्ति से कह देंगे. मैने कहा आप चिंता न करें मैं वापस आकर कर लूंगा.

इस पर उन्होने मुझे यात्रा की शुभकामनायें दी.

प्रो. वेंकट से मेरी पहली भेंट आई एम टी गाज़ियाबाद में 2004 में हुई थी. वहां उनका पुत्र भी अध्ययन कर रहा था तथा उनके साथ उनकी पत्नी प्रो. चन्द्रा ने भी साथ ही ज्वाइन किया था. जब उन्हें आई एम आई का निदेशक नियुक्त किया गया तो आई एम टी के निदेशक ने एक आयोजन में कहा कि कृपया हमारे यहां से किसी फेकल्टी को वहां मत ले जाना, इस पर उन्होने कहा था ,"बिल्कुल नहीं, सिर्फ एक को छोड़्कर".

बाद में उन्होने ही मुझे IMT Ghaziabad छोड़कर IMI ज्वाइन करने को कहा था.




विधि का विधान कोई नहीं जानता. प्रो. वेंकट का हमारे बीच से इस तरह जाना निस्सन्देह एक अपूरणीय क्षति है. मैं परमपिता परमात्मा से प्रार्थना करता हूं कि उनकी आत्मा को परम शांति प्रदान करे. प्रो. चन्द्रा व उनके पुत्र को यह अपार दुख सहने की शक्ति प्रदान करे. मैं इस दुख में सहभागी हूं.

दोपहर से पहले एयर्पोर्ट से सामान आने की कोई उमीद नही थी,कहीं जाने का भी मन नहीं हो रहा था.नीचे रिसेप्शन तक गया और उस कन्या से बात की जो फ्रेंच व अंग्रेज़ी दोनों ही जानती /समझती थी.उससे लियों फोन करके सामान के बारे में पूछने का अनुरोध किया. उसने फोन के बाद बताया कि शायद सामान शाम तक् आ जाये ,नहीं तो कल सुबह 11 बजे. अगले सुबह आनसी (Annecy) का कार्यकृम बना हुआ था. चिंता यह थी कि यदि शाम तक सामान न मिला तो कल जायेंगे कैसे. जब यह चिंता रिसेप्शन पर बतायी तो मुझे वहां से washing machine के लिये दो टोकन मुफ्त मिल गये.
शाम होने पर जब सामान नहीं आया तो मार्केट गया,कुछ खरीदारी भी की. इंडियन बाज़ार नामक एक दुकान भी दिखी जिसे दिल्ली के गुल्शन रत्रा व उनके भाई बब्बल चला रहे हैं,उन्होने पूछने पर बताया कि वे लोग यहां 25 वर्षों से है. इस दुकान पर भारतीय रुचि की समस्त सामग्री ( मसाले, दाल, चावल, हिन्दी फिल्मों व गानों की सी डी, रेडी टू ईट (ready to heat & eat ) समोसे, परांठा आदि भी उपलब्ध थे.






.यह भी पता चला कि शाकाहारी भोजन मिलना सम्भव तो है परंतु भारतीय रेस्त्रां दूर था, मन भी नहीं था. मेरे दो छत्रों ने सुझाया कि वह भारत से अपने साथ MTR ब्रांड के खाद्य पेकेट लाये हैं.उनके साथ उनकी किचन में ही गरम कर राजमा चावल खाये गये.



चित्रों का विवरण: सबसे ऊपर चित्र स.1 अपने अपार्टमेंट् के बाहर मेरे तीन छात्र् ( एरिल्, वीरैया व कृश्नेन्दु)
चित्र स. 2एक पुराने चित्र में प्रो.वेंकट रत्नम ( बीच में नीली टाई लगाये) अन्य प्रोफेसर के साथ
चित्र स. 3 अपने अपार्टमेंट के बाहर फूटपाथ् पर मैं
चित्र स.4 ( ऊपर्) ग्रेनोबल एकोल डी मेनेजमेंट के बाहर मैं व मेरे छात्र


(आगे ... आंसी का सफर ...)

मेरी यूरोप यात्रा -2 फ्रांस की ज़मीन पर कदम ..



लियों तक पहुंचते पहुंचते हमारी उड़ान 1 घंटा देरी से पहुंची. मुझे 12.35 पर लियों पहुंच कर 1.30 की शटल पकड़ कर ग्रिनोबल जाना था. मेरी घड़ी में भारतीय समय ही था. जब मेरी घडी में शाम के 5 बजे थे ( यानी दिल्ली से उड़े हुए साढ़े 12 घंटे होचुके थे), फ्रांस की स्थानीय घड़ियां 1.30 अपरान्ह बता रही थी.
सामान लेने के लिये इंतज़ार करता रहा पर नहीं मिला. हारकर कार्यालय में बात करने गया. कई लोगों को ऐसी ही शिकायत थी, बारी आने पर जब शिकायत की तो बताया गया कि मेरा सामान इस्तानबुल एयर्पोर्ट पर ही रह गया है, लियों के लिये नहीं चढाया जा सका. मुझसे गेनोबल के होटल का पता लिखाया गया और कहा गया कि अगले दिन शाम तक सामान होटल में पहुंचा दिया जायेगा.

( मेरे अपार्ट्मेंट की तीसरी मंज़िल से, जहां मेरा कमरा था, एक नज़ारा)



एयरपोर्ट से बैरंग रवाना होने की नौबत थी,कुछ कर भी नहीं सकता था. दूसरों के साथ ऐसा हुआ है, कई बार सुना था,परंतु स्वयम मैं पहली बार यह मज़ा ( या सज़ा) भुगतने वाला था. ठंड थोडी और बढ गयी थी पर जेकेट से काम चल रहा था. गनीमत थी कि आवश्यक दवाइयां व शेविंग किट ,मह्त्वपूर्ण पेपर्स मेरे हाथ वाले बेग में ही थे. 2.30 की शटल के लिये भी मेरा टिकट आरक्षित था,जो मेज़बान की जिम्मेदारी थी, तथा निर्धारित काउंटर पर नाम बताते ही उप्लब्ध हो गया.
फ्रांस में ही नही बल्कि अधिकांश यूरोप में लोग समय के बहुत पाबन्द हैं . ग्रिनओबल के लिये प्लेटफोर्म 4 पर शटल सेवा उप्लब्ध थी. परंतु 2.20 तक वहां कुछ चहल पहल नहीं थी,अचानक 5 मिनट में ही भीड़ बढ़् गयी और ठीक 2.30 पर शटल बस चल भी दी.

सुबह चार बजे दिल्ली से चलने के कारण नींद पूरी नहीं हुई थी. शटल में नींद आ रही थी,परंतु खूबसूरत नज़ारे देखने का लोभ भी नहीं संवरण कर पा रहा था. बाहर के नज़ारे वाकई दिलकश थे. दोनों तरफ ऊंची ऊंची हरी भरी दूर तक फैली पहाडियां मन को लुभा रही थी. इन पहाडियों को देख कर अपना ही एक नया शेर याद आ गया ( पूरी गज़ल फिर कभी)


..खूबसूरत समां, खुशनुमा वादियां, ऐसे सपने भी आते नहीं आजकल




लगभग 5 बजे ( स्थानीय समय ) होटल पहुंच गया. होटल क्या बल्कि अपार्टमेंट या स्टूडियो अपार्टमेंट कहना उचित होगा.नाम भी था Residehome . रिसेप्शन पर उपस्थित कन्या ने बताया कि रूम सर्विस नहीं है किंतु कमरे में पूरी किचनेट मौज़ूद है जिसमें फ्रिज़,ओवेन,होट-प्लेट ,सारे आवशय्क बर्तन,कटलरी आदि मौज़ूद है.


( चित्र में अपने अपार्टमेंट के बाहर मैं व मेरे दो छात्र-ऎरिल व कृष्नेन्दु)

कमरे में व्यवस्थित होकर, मुझसे 5 दिन पहले से ही ग्रेनोबल ( Grenoble Ecole de ँmanagement जो कि Grenoble Graduate School of Business का एक हिस्सा है. पूरे यूरोप में इसकी छठी rank मानी जाती है ) पधारे अपने 5 छात्रों की तलाश की. अब तक की progress report ली. खान-पान की व्यवस्था आदि के बारे मे पूछा और अभी तक शहर के अनुभव की जानकारी ली.
दो छात्रों के साथ बाज़ार गया. अपनी किचेन के लिये कौफी, दूध , फल आदि की खरीद की. दिल्ली में परिवार से बात करने के लिये 7.5 यूरो ( एक यूरो लगभग 61 भारतीय रुपये) का एक कार्ड भी लिया. ( इन कार्ड को किसी भी फोन् बूथ पर इस्तेमाल करके विश्व भर में कहीं बात हो सकती है. ...

अपने मोबाइल फोन पर इंटरनेश्नल रोमिंग बचाने के चक्कर में अपना मोबाइल दिल्ली में छोड़ दिया था. कम्प्यूटर पर स्काइप डाउनलोड कर लिया था,जो मेरे बेटे के लेप्टोप में भी था.
कमरे पर आकर स्काइप पर लग्भग आधा घंटा दिल्ली बात हुई. टी वी ओन किया तो सारे चैनलों पर फ्रेंच भाषा के ही कार्यक्रम थे.

(आगे... पहले ही दिन दुखी खबर )

मेरी यूरोप यात्रा -1 : हवाई यात्रा- दिल्ली से इस्तानबुल

पन्द्रह दिन बिताने के बाद मैं स्वदेश लौट आया . जाने से पहले सोचा था कि रोज़ाना एक पोस्ट अपने ब्लोग पर करूंगा. इष्ट मित्रों को जानकारी मिलेगी तथा मैं अपने अनुभव भी साझा करता रहूंगा.

अति व्यस्तता के चलते यह सम्भव न हो सका. अत:भारत लौट कर अपने सारे अनुभव अब ब्लोग के माध्यम से मित्रों के सुपुर्द कर रहा हूं. आने वाले दिनों में कोशिश रहेगी कि प्रति दिन एक पोस्ट पूरी हो सके.


14 अप्रैल बुधवार .इन्दिरा गान्धी एयरपोर्ट पहुंच कर मात्र आधे घंटे मे चेकिंग –इन तथा माइग्रेशन की सारी औपचारिकतायें पूरी हो गयीं और समय को हलाल करना पडा. कभी इधर बैठा तो कभी उधर. हार कर कौफी पीने का मन बनाया तो बटुआ ,जिसमें कुछ फुट्कर भारतीय मुद्रा थी, न मिला तो वहीं 50 यूरो का नोट टूट गया . बोर्डिंग का समय भी आ गया परंतु एयरक्राफ्ट के भीतर जाकर फिर मन खिन्न सा हो गया क्योंकि टर्किश एयरलाइंस के इस विमान में वह सभी सुविधायें न थी, जिनकी मैं अपेक्षा कर रहा था मसलन निजी टीवी स्क्रीन वाली व अनेक संगीत चैनलों वाली सीट. पिछले वर्ष जब एमिरेट्स के विमान से अमरीका गया था, तब उसमें यह सभी सुविधायें थीं और आजकल तो अच्छी घरेलू विमान सेवायें भी यह सब सुविधा उपलब्ध कराती ही हैं.
सेवा के नाम पर भी कुछ प्रभावित नहीं हुआ. कम्बल मांगने पर कहा गया कि सीमित संख्या थी, अत: अब नहीं मिल सकता. नाश्ते ने भी कुछ खास लुत्फ नहीं दिया. आखिर कर मन लगाया फ्लाइट पत्रिका में दिये गये छह पेज़ के पहेली परिशिष्ट में. सुडोकू व अन्य पहेलियों में अच्छा वक़्त कट गया. बीच बीच में झपकी भी लेता रहा,अन्यथा दिल्ली से इस्तानबुल तक का सफर मुश्क़िल हो जाता.

इस्तानबुल पर फ्लाइट बदलनी थी.वहां से लियों (Lyon) की फ्लाइट पकड़ने के लिये लग्भग 55 मिनट थे.भागना सा ही पडा क्यों कि एक टर्मिनल से दूसरे तक काफी दूरी थी.हां, लम्बे चौडे इस्तानबुल एयर्पोर्ट की ,साफ सफाई, विशाल ड्यूटी-फ्री शोपिंग क्षेत्र ने अवश्य प्रभावित किया. इस्तानबुल पहुंचते पहुंचते तापमान में बदलाव आ गया था. अत: दिल्ली की गर्मी से निज़ात पाकर अच्छा लगा. चेकिंग-इन से पहले बेग में रखी जेकेट निकाल कर पहन ली. सामान की सुरक्षा जांच से एक बार फिर गुजरना पडा .( कम से कम जूते तो नहीं उतरवाये गये ).इस बार भी वही एयरलाइन तथा विमान भी कुछ छोटा था. किंतु इस बार मिले भोजन से कुछ तृप्ति सी हुई.
तुर्की व हिन्दुस्तानी भाषा में कुछ कुछ समानतायें सी दिखती हैं. हिन्दी में जो शब्द अरबी /उर्दू से आये हैं कुछ कुछ तुर्की में भी हैं . मसलन टर्किश एयरलाइंस को ही लें. अंग्रेज़ी के साथ साथ रोमन में लिखा था ‘ तुर्किस्तान हवा योल्लारी’ . तुर्की की हवा और हिन्दुस्तानी की हवा एक् ही हैं. चाय को तुर्की में चाये ( शाये) कहते हैं और कौफी को ‘कहवे’. यह कश्मीरी पेय ‘कहवा’ से ही मिलता जुलता है.
यात्रा में कहवे के साथ ‘हज़ल्नट’ खाने को दिये गये,जो मूंगफली के दानों जैसे हीस्वाद वाले किंतु आकार में बड़े चने जैसे थे. अच्छा लगा.

( आगे ज़ारी... फ्रांस की ज़मीन पर कदम ..)