Virginia Commonwealth University (VCU) आने के सिलसिले मे वहां की एक भारतीय मूल की एक छात्रा सुहासिनी पाशीकांती से ई-मेल का आदान प्रादान हुआ था. वह जान पहचान काम आयी. अगले दिन जब मेरे लेपटोप की प्लग-अडोप्टर समस्या दूर नहीं होती लगी ( उन्होने तदर्थ रूप में मुझे एक दूसरा लेपटोप दे दिया था )तो मैने सुहासिनी से सम्पर्क किया और आधे दिन के बाद सुहासिनी ने मुझे एक ऐसा अडोप्टर ला कर दे दिया जो न सिर्फ USA में बल्कि UK आदि अन्य देशों में भी उपयोग किया जा सकता है. ( धन्यवाद, सुहासिनी).
जिस रिसर्च वर्कशोप ( research workshop) के लिये मैं यहां आया हूं, वहां मुझे भारतीय मूल के एक और प्रोफेसर मिल गये. डा. अर्जुन भारद्वाज मूल रूप से इलाहाबाद के हैं और पिछले दस वर्षों से कनाडा की एक university में सहायक प्रोफेसर हैं. इलाहाबाद, कानपुर से लेकर उत्तर प्रदेश की राजनीति ,मायावती तक अनेक विषयों पर बातचीत हुई.वापस होटल भी साथ साथ आये और तय हुआ कि 6 बजे लोबी में मिलेंगे और फिर dinner के लिये जायेंगे. लोबी में जब आया तो भारद्वाज जी होटल स्टाफ से किसी भारतीय रेस्ट्रां के बारे में पूछ रहे थे. मैने पिछले दिन एक guide में एक मशहूर भारतीय रेस्ट्रां FarouksHouse of India के बारे में पढ़ा था,उसकी वेबसाइट भी देखी थी, जिसपर वहां उपलब्ध व्यंजनॉ के दाम भी लिखे हुए थे. इतना याद था कि यह् रेस्ट्रां carry street पर है , जो पास में ही है . मैं और अर्जुन भारद्वाज जी FarouksHouse of India नामक रेस्ट्रां की तलाश में चल दिये. कैरी स्ट्रीट पर चलते चलते गये पर रेस्ट्रां नहीं मिला. ( मैने उनको 1987 की ऐसी ही घटना बयान की जब जिनेवा में हम कल्पना नामक रेस्ट्रां ढूंढते ढूंढते थक गये थे और नहीं मिला था). अनेक लोगों से पूछा ,कईयों ने बताया कि नाम तो सुना है, कहां है ,नहीं मालूम. दर असल कैरी स्ट्रीट बहुत लम्बा मार्ग है जिसके east और west दो हिस्से है, हम अभी तक ईस्ट में घूम रहे थे. जब पूरा रास्ता पार हो गया और पुराना शहर आ गया तो अर्जुन ने कहा कि आम तौर पर अमरीका में शहरों के पुराने हिस्से कुछ असुरक्षित होते हैं विशेषकर बाहरी व्यक्तियों के लिये ,यह सोचकर हम वापस पलटे, वेस्ट कैरी स्ट्रीट मे रेस्ट्रां ढूंढने के लिये. रास्ते में एक महिला से पूछने पर पता चला कि फारुक्स नामक रेस्ट्रां carry town में है , जो काफी दूर है. फिर भी भारतीय भोजन के दीवानों की तरह हम तलाश करते रहे. जब लगा कि अब हद होती जा रही है, और हमें ( कम से कम आज के दिन) भारतीय भोजन की ज़िद छोड़ देनी चाहिये, तभी एक जगह नेओन साइन से ‘Indian cuisine’ लिखा हुआ देखा ,तो तय किया कि चलो यहीं खाना ख्हते हैं. पास गये तो दिखा कि एक छोटा सा भोजनालय ,जिसका नाम था Ruchee Express. अन्दर गये तो मालिक से भी मुलाक़ात हुई. उनका नाम शंकर था और वह मेंगलौर ( कर्नाटक) के मूल निवासी थे.
फिर हमने खाना मंगाया- दाल मखानी, भिंडी, तन्दूरी रोटी व चावल. हम दोनों को ही खाना स्वादिष्ट लगा. वहीं एक और (भारतीय) ग्राह्क ने कहा ‘नमस्ते’.परिचय पूछा तो उसने अपना नाम रौनक बताया, जो नागपुर से इंजीनीयरिंग करने के बाद VCU में bio-medical engineering का छात्र है. रौनक ने बताया कि VCU में भारतीय मूल के छात्रों की संख्या लगभग एक हज़ार है.अधिकांश छात्र summer vacation के कारण भारत गये हुए हैं.
भले ही हम जिस की तलाश में थे नहीं मिला, परंतु जो मिला उससे संतोष तो बहुत मिला.
Monday, May 18, 2009
Sunday, May 17, 2009
अमरीका में उल्टा-पुल्टा
रविवार के दिन मुझे रिचमण्ड के लिये जे एफ के से 8.20 की फ्लाइट पकड़नी थी. सुरक्षा नियमों के अनुसार दो घंटे पहले पहुंचना था. परिवार वाले को बिना डिस्टर्ब किये दिनेश ने मेरे कमरे मे आकर मुझे पांच बजे जगा दिया, हमें मलूम था कि हम लेट हैं इस्लिये कोफी बनाकर बडे मग में भर ली और बिस्किट का पैकेट लेकर चल दिये. लगभग 120कि.मी का सफर था और दिनेश को पेट्रोल ( यहां गैस –कहते हैं) भराना था. रास्ते में न्यू हवेन पर दिनेश ने सिर्फ दस डालर का पेट्रोल भरा ,जो 2.39 डालर प्रतिगैलन था. दिनेश ने बताया कि यहां भिन्न भिन्न कम्पनियों के उत्पाद के दामों में फर्क है. नक़द व क्रेडिट कार्ड की खरीद पर भी दरों में फर्क़ है. नक़द 5 सेंट सस्ता पड़ता है.
आगे जाकर एक अन्य गैस स्टेशन पर फिर दिनेश ने गाडी फुल कराई. दोनो स्थानों के दामों में 14 सेंट्सप्रति गैलन का का फर्क़ था.अधिकांश गैस स्टेशन स्वचालित हैं. ( यूरोप के देशों में भी मैं पहले ऐसा ही देख चुका था).ग्राहक आकर गाड़ी लगाता है.कार्ड स्वाइप करता है और तेल भर जाने पर कार्ड पर रजिस्टर हो जाता है. अमरीका में अनेक गैस स्टेशन भारतीय मूल के लोगों द्वारा भी संचालित हैं जहां काम करने वाले भी भारतीय ही हैं.
7.15 पर एयर्पोर्ट पहुंच गया. कम्प्यूटर-किओस्क लगे हुए थे.अपने आप चेक –इन करना था. समय कम था अत:चेक-इन के बाद सुरक्षा जांच केलिये चला. यहां भी, बेल्ट ,जूते उतरवा कर x ray machine से निकालना पडा.
छोटा विमान था शायद 60 सीट वाला. फ्लाइट में नाश्ते की उम्मीद थी किंतु मिला सिर्फ भुनी मूंगफली के दानों का एक पैकेट और कौफी.
रिचमण्ड एयर्पोर्ट पहुंच कर टैक्सी और और बस बीस पचीस मिनट में होटल पहुंच गया.
अमरीका में काफी कुछ भारत से उल्टापुल्टा है. गाडी लेफ्ट हैंड द्राइव वाली हैं,सडकों पर दायी ओर चलता ट्रेफिक, बिजली के स्विच ऊपर करने पर औन होते हैं,नीचे औफ.
मुश्किल तो तब आयी जब ई-मेल चेक करने के लिये अपना लैप्टोप खोला.
लैपटोप का चार्ज बिलकुल समाप्त था और कोर्ड लगाने के लिये निकाली तो सन्न रह गया. भारत के तीन पिन वाले प्लग के लिये तो यहां के सोकेट बिल्कुल उल्टे हैं. अब क्या करें? होटल के स्टाफ से बात की, उन्होने इंजीनीयर को फोन लगाया पर बात नहीं बनी. हां, उसने Radio sacks नामक एक दुकान का पता बता दिया जो 5 कि.मी दूर थी और आने जाने का भाड़ा लगभग 25 डालर था. मैने होटल के कम्प्यूटर से मेज़बान संस्था- Virginia Commonwealth University ( VCU) ईमेल भेजकर सम्स्या बताई. शाम को मिलने आये एक छात्र सहायक ने सांत्वना दी कि वह अगले दिन एक ऐसा अडोप्टर ला देगा जिससे काम चल जाये.
----कैसे हुई समस्या दूर? खाने के लिये बहाया पसीना...(ज़ारी)
आगे जाकर एक अन्य गैस स्टेशन पर फिर दिनेश ने गाडी फुल कराई. दोनो स्थानों के दामों में 14 सेंट्सप्रति गैलन का का फर्क़ था.अधिकांश गैस स्टेशन स्वचालित हैं. ( यूरोप के देशों में भी मैं पहले ऐसा ही देख चुका था).ग्राहक आकर गाड़ी लगाता है.कार्ड स्वाइप करता है और तेल भर जाने पर कार्ड पर रजिस्टर हो जाता है. अमरीका में अनेक गैस स्टेशन भारतीय मूल के लोगों द्वारा भी संचालित हैं जहां काम करने वाले भी भारतीय ही हैं.
7.15 पर एयर्पोर्ट पहुंच गया. कम्प्यूटर-किओस्क लगे हुए थे.अपने आप चेक –इन करना था. समय कम था अत:चेक-इन के बाद सुरक्षा जांच केलिये चला. यहां भी, बेल्ट ,जूते उतरवा कर x ray machine से निकालना पडा.
छोटा विमान था शायद 60 सीट वाला. फ्लाइट में नाश्ते की उम्मीद थी किंतु मिला सिर्फ भुनी मूंगफली के दानों का एक पैकेट और कौफी.
रिचमण्ड एयर्पोर्ट पहुंच कर टैक्सी और और बस बीस पचीस मिनट में होटल पहुंच गया.
अमरीका में काफी कुछ भारत से उल्टापुल्टा है. गाडी लेफ्ट हैंड द्राइव वाली हैं,सडकों पर दायी ओर चलता ट्रेफिक, बिजली के स्विच ऊपर करने पर औन होते हैं,नीचे औफ.
मुश्किल तो तब आयी जब ई-मेल चेक करने के लिये अपना लैप्टोप खोला.
लैपटोप का चार्ज बिलकुल समाप्त था और कोर्ड लगाने के लिये निकाली तो सन्न रह गया. भारत के तीन पिन वाले प्लग के लिये तो यहां के सोकेट बिल्कुल उल्टे हैं. अब क्या करें? होटल के स्टाफ से बात की, उन्होने इंजीनीयर को फोन लगाया पर बात नहीं बनी. हां, उसने Radio sacks नामक एक दुकान का पता बता दिया जो 5 कि.मी दूर थी और आने जाने का भाड़ा लगभग 25 डालर था. मैने होटल के कम्प्यूटर से मेज़बान संस्था- Virginia Commonwealth University ( VCU) ईमेल भेजकर सम्स्या बताई. शाम को मिलने आये एक छात्र सहायक ने सांत्वना दी कि वह अगले दिन एक ऐसा अडोप्टर ला देगा जिससे काम चल जाये.
----कैसे हुई समस्या दूर? खाने के लिये बहाया पसीना...(ज़ारी)
Saturday, May 16, 2009
अमरीका में “भारतीयम”-तीन: सांई बाबा का सत्संग और अमरीकी भक्त








जाना तो मुझे रिचमंड था, परंतु जे एफ के एयर्पोर्ट से उल्टे उत्तरपूर्व की तरफ दिनेश आहूजा जी के घर ( जो ईस्ट लाइम, कनेक्टिकट में है) जा रहे थे .दिनेश का आग्रह था कि उस दिन बुद्धपूर्णिमा है,और उन्होने अपने घर सांई-सत्संग के साथ साथ(meditation ) मेडिटेशन-ध्यान पर चर्चा करने हेतु विशेषज्ञ को आमंत्रित किया है अत: मैं पहले एक दिन उनके यहां रुकूं और फिर रिचमंड जाऊं.
हाई-वे पर ट्रेफिक-जाम जैसी स्थिति तो मैने सोचा भी नहीं था, पंरतु मैने देखा कि जगह जगह अचानक ट्रेफिक धीमा हो रहा था. न्यू हेवन के पास दिनेश ने गाड़ी हाई-वे से उतार कर नगर के अन्दर से निकाली और तीन कि.मी का चक्कर लगा कर फिर हाई-वे पर आ गये.रास्ते में दिनेश को सूचना मिली कि काम में हाथ बटाने हेतु दो मित्र-परिवार उनके घर पहुंच चुके हैं. डेढ़्- बजे अपरान्ह हम घर पहुंचे. दिनेश ने मित्र परिवारों से मिलाया. श्रीनिवास कामीरेड्डी व उपेन्द्र जी सपत्नीक आकर काम में जुट गये थे. मुझे बताया गया कि आज लगभग 75 व्यक्ति सत्संग में भाग लेंगे ,उसके उपरांत भोजन है. दोपहर में भयंकर नींद आ रही थी. थकान के अलावा मुख्य कारण था कि दिल्ली से निकले हुए 24 घंटे से अधिक हो गये थे, किंतु अभी तो पूरा दिन बाकी था. मेहमानों के आने के पहले मुझे तैयार होने को कहकर सभी काम में व्यस्त हो गये.
तीन बजते बजते मेहमानों का आना शुरू हो गया. सत्संग सबसे नीचे तल पर बने बड़े कमरे में था. सांई बाबा का भव्य दरबार सजा था ( चित्र देखें). सतसंग मे भाग लेने वालों के लिये 60-70 पृष्ठों का एक फोल्डर दिया जा रहा था, जिसमें सभी भजन आदि रोमन / देवनागरी /तेलुगु व गुजराती लिपियों में लिखे हुए थे.
भजन /कीर्तन ढप, झान्झ ,मजीरों के साथ शुरू हो चुका था. देर से आने वाले निश्चित स्थान से फोल्डर उठाते और भजन में शामिल हो जाते. बीच बीच में उपेन्द्र जी अपने वीडिओ कैमरे से और श्रीनी अपने स्टिल कैमरे से चित्र लेते रहते .लगभग पांच बजे दिनेश ने meditation की महत्ता और अपने अनुभवों पर प्रकाश डाला. फिर श्रीमती पाविनी ने मेडिटेशन की पूरी प्रक्रिया आदि को प्रश्न-उत्तर के माध्यम से समझाया और सभी ने 25 मिनट के लिये सुझावानुसार ध्यान लगाया. यहां बताना आवश्यक है कि श्रीमती पाविनी विशाखापट्नम की रहने वाली हैं और 2003 से मेडिटेशन में लगीं है. उनका दावा है कि उस अवस्था में उन्होने अनेक महान आत्माओं का साक्षात्कार किया है.इन अनुभवों पर उनकी पुस्तक का भारत ( हैदराबाद) में शीघ्र ही विमोचन होने वाला है.
अपने अपने अनुभव सबने साझा किये. फिर विशाल आरती के साथ सत्संग समाप्त हुआ. इसमे मूल अमरीकी डा. ब्रूस व उनकी पत्नी, साई भक्त एन्न, कनेक्टिकट के बड़े अस्पताल के वरिश्ठ चिकित्सक डा. मार्क व पत्नी, ( लगभग दस अमरीकियों को मिलाकर)60 व्यक्ति सतसंग में शामिल हुए. इन (मूल रूप से)भारतीय अमरीकी पर्रिवारों के बच्चे भी आये हुए थे. कई परिवार तो दो-ढाई घंटे लगाकर पहुंचे थे. इनमें साई भक्त मूल अमरीकी परिवारके अतिरिक्त आन्ध्र के तेलुगुभाषी से लेकर पंजाबी ,गुजराती ....सभी शामिल थे . सच्ची अर्थों में ...अमरीका में भारतीयम ..
फिर सबने सुस्वादु भारतीय भोजन का आनद लिया. कोई दही लेकर आया था तो कोई आलू-गोभी की तरकारी. कोई अपने घर से पुदीने की चटनी बना कर लाया था. मैं तो भारत से मिर्च का अचार ले गया था. एक बडे परिवार की तरह से यह समागम लगा जिसमे सबकी भागीदारी भी थी और सब आनंद भी ले रहे थे. रात्रि लग्भग दस बजे विसर्जन हुआ.
फ़िर से जे ऎफ के एयरपोर्ट ..और वहां से ...रिचमंड की उड़ान ...( जारी).
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Friday, May 15, 2009
अमरीका में ‘भारतीयम’ –दो
एमिरेट्स की उड़ान के दौरान मैने पाया कि जो यात्री सो नहीं रहे थे वह अपनी अपनी वीडिऑ स्क्रीन पर फिल्में ही देख् रहे थे . अधिकांश भारतीय मूल के यात्री तो हिन्दी ( या तेलुगु ) फिल्में देखने में व्यस्त थे. मेरी सीट के अगल बगल वाले भी .मैं काफी देर तक तो रेडिओ पर आशा भोंसले के गीत सुनता रहा, फिर मुकेश पर आ गया, फिर मैने जब गेम्स का चैनल ढूंढा ,तो मुझे सुडोकू मिल गया. बस फिर क्या था, बीच बीच में झपकी, फिर सुडोकू, यानी खेल खेल में मैने लम्बी यात्रा पूरी की. बीच बीच में दाहिनी तरफ वाले गुजराती भाई से ( वह भी पहली बार अमरीका जा रहा था), और बांई ओर दिल्ली की मूल निवासिनी व अमरीका मे मेडिकल छात्रा, से बात चीत भी होती रही. सफर भली प्रकार कट गया.
यान से उतर कर बस में लगभग 5 कि.मी. का सफर और तब आया टर्मिनल ,जहां इमिग्रेशन तथा कस्टम की कार्यवाही पूरी करनी थी. उसके भी पहले सुरक्षा जांच के नाम पर बेल्ट और जूते भी उतरवाये गये और एक्सरे मशीन से गुजारने पडे. उस दिन न्यूयोर्क का मौसम खराब था और इस कारण हमारी फ्लाइट 1 घंटा देर से पहुंची थी. इमिग्रेशन के लिये 50 काउंटर थे ,किंतु उसमें लगभग आधे – अमरीकी नागरिक, ग्रीन-कार्ड धारक, राजनयिक आदि श्रेणियों के लिये थे और शेष ‘विजिटर्स’ के लिये.
धीरे धीरे लाइन ने खिसकना शुरू किया और एक घंटे आते आते यह कार्य भी सम्पन्न हुआ. कन्वेयर बेल्ट पर सामान के लिये मैने ट्रोली उठाई तो मुझे बताया गया कि पांच डालर लगेंगे. आन्ध्र के एक परिवार को ( पांच सदस्यों के परिवार के पास आठ बडे बडे सूटकेस थे, जिन पर विशाखापटनम का पता भी लिखा हुआ था) को तीन ट्रोली के पन्द्रह डालर खर्च करने पडे ( यानी करीब 750 रुपये).
ज़ब कस्टम का फार्म भर रहा था तो उल्झन में पड गया. एक प्रश्न था कि “क्या आप अपने साथ पौधा,वनस्पति,ताजा फल , खाद्य सामग्री या कीडे-मकोडे तो नही लाये हैं?” (food & insects-एक ही category में देखकर मैं हैरान था.) यदि ‘’हां’ पर निशान लगाते है तो इसका मतलब हुआ कि मेरे साथ Insects –कीडे भी हैं. और ना पर, तोयह झूठ् होता क्यों कि मेरे पास मिठाई, नमकीन आदि बहुत कुछ था. खैर मैने ,हां पर निशान लगाया, सोचकर कि देखा जायेगा. सामान लेकर निकला तो अंतिम स्थान पर कस्टम अधिकारी ने फोर्म देखकर पूछा कि खाने के सामान मे क्या है ?मैने बताया कि ‘indian cookies’. उसने मुझे दूसरी तरफ रखी एक्सरे मशीन की तरफ भेज दिया, और वहां से निकल कर लगा ,मानो किला फतह कर लिया और ऐयरपोर्ट से बाहर आया.
मेरे मेज़बान दिनेश आहुजा जो ईस्ट-लाइम से मुझे लेने के लिये पांच बजे घर से निकले थे और अब ग्यारह बज रहे थे. अभी दो घंटे का सफर तय करना था.तय हुआ कि हाईवे पर रुक कर हल्का नाश्ता कौफी ले लेंगे. दिनेश ने अपनी SUV मे GPS लगाया हुआ था, जो मिनट मिनट पर बताता जा रहा था कि कब कहां मुडना है,कहां गाडी बांई लेन मे रखनी है और कहां दांयी में.
हम हाई वे से नीचे उतर कर वहां बनी दुकानों पर गये, एक चाइनेज़ स्नेक्स पर जलपान लिया और कौफी के मग हाथ में लेकर वापस गाडी में आ गये,अपने गंतव्य की तरफ.
........( आगे जारी....अमरीका में सांईभक्तों का सत्संग )
यान से उतर कर बस में लगभग 5 कि.मी. का सफर और तब आया टर्मिनल ,जहां इमिग्रेशन तथा कस्टम की कार्यवाही पूरी करनी थी. उसके भी पहले सुरक्षा जांच के नाम पर बेल्ट और जूते भी उतरवाये गये और एक्सरे मशीन से गुजारने पडे. उस दिन न्यूयोर्क का मौसम खराब था और इस कारण हमारी फ्लाइट 1 घंटा देर से पहुंची थी. इमिग्रेशन के लिये 50 काउंटर थे ,किंतु उसमें लगभग आधे – अमरीकी नागरिक, ग्रीन-कार्ड धारक, राजनयिक आदि श्रेणियों के लिये थे और शेष ‘विजिटर्स’ के लिये.
धीरे धीरे लाइन ने खिसकना शुरू किया और एक घंटे आते आते यह कार्य भी सम्पन्न हुआ. कन्वेयर बेल्ट पर सामान के लिये मैने ट्रोली उठाई तो मुझे बताया गया कि पांच डालर लगेंगे. आन्ध्र के एक परिवार को ( पांच सदस्यों के परिवार के पास आठ बडे बडे सूटकेस थे, जिन पर विशाखापटनम का पता भी लिखा हुआ था) को तीन ट्रोली के पन्द्रह डालर खर्च करने पडे ( यानी करीब 750 रुपये).
ज़ब कस्टम का फार्म भर रहा था तो उल्झन में पड गया. एक प्रश्न था कि “क्या आप अपने साथ पौधा,वनस्पति,ताजा फल , खाद्य सामग्री या कीडे-मकोडे तो नही लाये हैं?” (food & insects-एक ही category में देखकर मैं हैरान था.) यदि ‘’हां’ पर निशान लगाते है तो इसका मतलब हुआ कि मेरे साथ Insects –कीडे भी हैं. और ना पर, तोयह झूठ् होता क्यों कि मेरे पास मिठाई, नमकीन आदि बहुत कुछ था. खैर मैने ,हां पर निशान लगाया, सोचकर कि देखा जायेगा. सामान लेकर निकला तो अंतिम स्थान पर कस्टम अधिकारी ने फोर्म देखकर पूछा कि खाने के सामान मे क्या है ?मैने बताया कि ‘indian cookies’. उसने मुझे दूसरी तरफ रखी एक्सरे मशीन की तरफ भेज दिया, और वहां से निकल कर लगा ,मानो किला फतह कर लिया और ऐयरपोर्ट से बाहर आया.
मेरे मेज़बान दिनेश आहुजा जो ईस्ट-लाइम से मुझे लेने के लिये पांच बजे घर से निकले थे और अब ग्यारह बज रहे थे. अभी दो घंटे का सफर तय करना था.तय हुआ कि हाईवे पर रुक कर हल्का नाश्ता कौफी ले लेंगे. दिनेश ने अपनी SUV मे GPS लगाया हुआ था, जो मिनट मिनट पर बताता जा रहा था कि कब कहां मुडना है,कहां गाडी बांई लेन मे रखनी है और कहां दांयी में.
हम हाई वे से नीचे उतर कर वहां बनी दुकानों पर गये, एक चाइनेज़ स्नेक्स पर जलपान लिया और कौफी के मग हाथ में लेकर वापस गाडी में आ गये,अपने गंतव्य की तरफ.
........( आगे जारी....अमरीका में सांईभक्तों का सत्संग )
Wednesday, May 13, 2009
अमरीका में " भारतीयम"
अमरीका की भूमि से यह मेरा पहला ब्लोग है. पिछले चार् दिनों से मैं यहां वर्जीनिया राज्य की राजधानी 'रिचमंड' नामक नगर में हूं.
8 मई को जब दिल्ली से चला था ,तब से ही पहली ब्लोग पोस्ट का शीर्षक सोचा हुआ था. आज सुबह सात बजे पहली पोस्ट लिख ली थी पर न जाने क्यों save नहीं कर पाया, और अब दोपहर को दुबारा लिख रहा हूं.
दुबाई के लिये जब दिल्ली से Emirates की फ्लाइट पकड़ी थी तो यान में लगभग तीन चौथाई भारतीय ही थे. समझ में भी आया क्योंकि दुबाई, शार्जाह आदि मे भारतीय कामगारों की भरमार है . परंतु दुबाई से जब JFK Airport ( न्यू यौर्क) के लिये जाने वाली उडान के लिये चेक इन किया तो भी भारतीय मूल के यात्रियों के संख्या हैरान करने जैसी लगी.इस फ्लाइट में भी आधे से अधिक भरतीय मूल के ही थे . मुझे बाद में जानकारी से पता चला कि अब भारतीय मूल के व्यक्ति एयर इंडिया के बजाय Emirates को अधिक पसन्द करते हैं. ( एक तो एयर इंडिया की उडानें लन्दन होके आती है , जहां transit के दौरान checking में घंटों लग जाते हैं, दूसरा एमिरेट्स की सेवा व खान-पान बहुत ही अच्छा है). खान-पान की बात मैने भी महसूस की-निश्चित रूप से उम्दा खाना ( मेरे जैसे vegetarian के लिये तो और भी उम्दा).
तीन वर्षों बाद किसी अंतरराष्ट्रीय उडान पर था अत: बोइंग 777 की सुविधायें भी चौंकाने वाली लगी.भारतीय भाषाओं ( हिन्दी के अतिरिक्त-तमिल,तेलुगु, बंगला भी) का संगीत , फिल्में भी उप्लब्ध थीं.
टोयलेट जाने पर एक मज़ेदार बात मैने नोट की . फ्लश करने के लिये सन्देश हिन्दी,उर्दू, बंगला,तेलुगु,अंग्रेज़ी ( व एक अन्य-शायद फ्रेंच) भाषा में था. भाव तो सभी सन्देशों का एक ही था, मगर भाषा अलग अलग थी.
हिन्दीमे लिखा था 'क़्रपया शौचालय की सफाई के लिये यह बटन दबायें', उर्दू में लिखा था' बराये-मेहरबानी टोयलेट इस्तेमाल करने के बाद यह बटन दबाइये' और बंगला में लिखा था-' फ्लश कोरार जोन्ये एखने दाबान्'
अभी दिन के लगभग डेढ़ बजने को हैं भूख लग रही है. अगली किश्त शाम को ....
8 मई को जब दिल्ली से चला था ,तब से ही पहली ब्लोग पोस्ट का शीर्षक सोचा हुआ था. आज सुबह सात बजे पहली पोस्ट लिख ली थी पर न जाने क्यों save नहीं कर पाया, और अब दोपहर को दुबारा लिख रहा हूं.
दुबाई के लिये जब दिल्ली से Emirates की फ्लाइट पकड़ी थी तो यान में लगभग तीन चौथाई भारतीय ही थे. समझ में भी आया क्योंकि दुबाई, शार्जाह आदि मे भारतीय कामगारों की भरमार है . परंतु दुबाई से जब JFK Airport ( न्यू यौर्क) के लिये जाने वाली उडान के लिये चेक इन किया तो भी भारतीय मूल के यात्रियों के संख्या हैरान करने जैसी लगी.इस फ्लाइट में भी आधे से अधिक भरतीय मूल के ही थे . मुझे बाद में जानकारी से पता चला कि अब भारतीय मूल के व्यक्ति एयर इंडिया के बजाय Emirates को अधिक पसन्द करते हैं. ( एक तो एयर इंडिया की उडानें लन्दन होके आती है , जहां transit के दौरान checking में घंटों लग जाते हैं, दूसरा एमिरेट्स की सेवा व खान-पान बहुत ही अच्छा है). खान-पान की बात मैने भी महसूस की-निश्चित रूप से उम्दा खाना ( मेरे जैसे vegetarian के लिये तो और भी उम्दा).
तीन वर्षों बाद किसी अंतरराष्ट्रीय उडान पर था अत: बोइंग 777 की सुविधायें भी चौंकाने वाली लगी.भारतीय भाषाओं ( हिन्दी के अतिरिक्त-तमिल,तेलुगु, बंगला भी) का संगीत , फिल्में भी उप्लब्ध थीं.
टोयलेट जाने पर एक मज़ेदार बात मैने नोट की . फ्लश करने के लिये सन्देश हिन्दी,उर्दू, बंगला,तेलुगु,अंग्रेज़ी ( व एक अन्य-शायद फ्रेंच) भाषा में था. भाव तो सभी सन्देशों का एक ही था, मगर भाषा अलग अलग थी.
हिन्दीमे लिखा था 'क़्रपया शौचालय की सफाई के लिये यह बटन दबायें', उर्दू में लिखा था' बराये-मेहरबानी टोयलेट इस्तेमाल करने के बाद यह बटन दबाइये' और बंगला में लिखा था-' फ्लश कोरार जोन्ये एखने दाबान्'
अभी दिन के लगभग डेढ़ बजने को हैं भूख लग रही है. अगली किश्त शाम को ....
Sunday, April 19, 2009
मज़बूरी का नाम ....गान्धी
जिन गांधी बाबा के चलते इस कहावत का चलन हुआ ,अगर कब्र में होते तो करवटें ज़रूर बदल रहे होते. गांधी बाबा को या उस ज़माने के लोगों को तो गुमान भी नहीं होगा कि उनका (जाति ) नाम इस कदर चर्चा का शिकार होगा और वो भी नक़ली गांधी नाम वालों की वज़ह से.
अब किस का नाम लें. फीरोज़ को तो स्वयम गांधी बाबा अपन नाम उधार दे गये थे. कुछ दिन तक चला लेकिन तब इसे 'भुनाने' की बात नही चली थी और इसके दुरुपयोग जैसा कोई आरोप नहीं लगा.
इन्दिरा जी को तो स्वाभाविक रूप से यह नाम मिला था. वैसे भी उनके नाम के साथ् 'नेहरू' जैसा भारी भरकम नाम लगा हुआ था, अत: यहां भी किसी ने नहीं कहा कि बाबा के नाम का कोई दुरुपयोग हुआ है.
परन्तु समय बीतने के साथ साथ जिन जिन शख्सियतों के साथ यह नाम जुड़ा,वह विवाद के घेरे में आते गये और प्रश्न उठता रहा कि क्या यही गांधी बाबा की विरासत के सही हक़दार हैं?
अनेक दिनों से कुछ फिर से लिखने की उचंग चढ़ रही थी. परंतु पुराना संकल्प था कि अपने ब्लोग पर कोई राजनैतिक विवादित मुद्दे को नहीं छुऊंगा. इसी के चलते लगभग सौ दिन तक खुद को ब्लोग से दूर रखा. मन उद्वेलित होता रहा, उंगलियां की -बोर्ड पर थिरकने की ज़िद करती रहीं परंतु ..मज़बूरी ..
अंत में सोचा ..चलने दो बालकिशन...( हैदराबादी भाई यह कहावत भी समझ् गये होंगे. जो न समझे हों उन्हे बताता चलूं कि येह एक स्थानीय ज़ुमला है जिसे हैदराबाद में खूब इस्तेमाल किया जाता है.ठीक वैसे ही जैसे कानपुर में 'झाडे रहो कलट्टर गंज..').
अब किस गांधी का जिक्र करूं ? यहां तो अब 'गांधीगीरी' भी फैशन बनकर फल-फूल रहा है. बन्दूक उठाने वाले भी गांधी का नाम लेकर 'लोकतंत्र के सबसे बड़े मेले' में अपना मज़मा लगाये बैठे है.
लगभग बीस वर्षों तक राजनीति को इतने करीब से देखा है कि टिप्पणी लिखना शुरू करूं तो सिलसिला खत्म ही न हो.
और फिर आज के खतरे ...कहीं चुनाव आयोग ही इसे आचार संहिता का दुरुपयोग ना मान ले.
फिर भी ठान लियाहै तो बस लिखना फिर से आरंभ ..अब इस यज्ञ में आहुति ज़रूरी है..क्योंकि मज़बूरी का नाम ...गांधी है.
अब किस का नाम लें. फीरोज़ को तो स्वयम गांधी बाबा अपन नाम उधार दे गये थे. कुछ दिन तक चला लेकिन तब इसे 'भुनाने' की बात नही चली थी और इसके दुरुपयोग जैसा कोई आरोप नहीं लगा.
इन्दिरा जी को तो स्वाभाविक रूप से यह नाम मिला था. वैसे भी उनके नाम के साथ् 'नेहरू' जैसा भारी भरकम नाम लगा हुआ था, अत: यहां भी किसी ने नहीं कहा कि बाबा के नाम का कोई दुरुपयोग हुआ है.
परन्तु समय बीतने के साथ साथ जिन जिन शख्सियतों के साथ यह नाम जुड़ा,वह विवाद के घेरे में आते गये और प्रश्न उठता रहा कि क्या यही गांधी बाबा की विरासत के सही हक़दार हैं?
अनेक दिनों से कुछ फिर से लिखने की उचंग चढ़ रही थी. परंतु पुराना संकल्प था कि अपने ब्लोग पर कोई राजनैतिक विवादित मुद्दे को नहीं छुऊंगा. इसी के चलते लगभग सौ दिन तक खुद को ब्लोग से दूर रखा. मन उद्वेलित होता रहा, उंगलियां की -बोर्ड पर थिरकने की ज़िद करती रहीं परंतु ..मज़बूरी ..
अंत में सोचा ..चलने दो बालकिशन...( हैदराबादी भाई यह कहावत भी समझ् गये होंगे. जो न समझे हों उन्हे बताता चलूं कि येह एक स्थानीय ज़ुमला है जिसे हैदराबाद में खूब इस्तेमाल किया जाता है.ठीक वैसे ही जैसे कानपुर में 'झाडे रहो कलट्टर गंज..').
अब किस गांधी का जिक्र करूं ? यहां तो अब 'गांधीगीरी' भी फैशन बनकर फल-फूल रहा है. बन्दूक उठाने वाले भी गांधी का नाम लेकर 'लोकतंत्र के सबसे बड़े मेले' में अपना मज़मा लगाये बैठे है.
लगभग बीस वर्षों तक राजनीति को इतने करीब से देखा है कि टिप्पणी लिखना शुरू करूं तो सिलसिला खत्म ही न हो.
और फिर आज के खतरे ...कहीं चुनाव आयोग ही इसे आचार संहिता का दुरुपयोग ना मान ले.
फिर भी ठान लियाहै तो बस लिखना फिर से आरंभ ..अब इस यज्ञ में आहुति ज़रूरी है..क्योंकि मज़बूरी का नाम ...गांधी है.
Sunday, January 25, 2009
माउथ फ्रेशनर का चुम्बन से क्या रिश्ता है ?
क्या आपको याद है कि आपने अपना पहला चुम्बन ( KISS) कब और कहां लिया था? क्या आप उस समय मानसिक रूप से चुम्बन के लिये तैयार थे और इस तैयारी में आपको कितना वक़्त लगा था? कहीं आपका पहला चुम्बन अचानक तो नहीं था? अप्रत्याशित ?
जो भी हो क्या आप उस पहले-पहल अनुभव को कुछ exciting बना कर एक मसालेदार स्टोरी के रूप में पेश कर सकते हैं ?
नहीं ,मैं किसी सस्ती सेक्सी पत्रिका की बात नहीं कर रहा. अपने चुम्बन की कहानी बनाकर गोवा की मुफ्त यात्रा का पुरुस्कार जीतने की प्रतियोगिता आयोजित की गयी है एक ब्रांड के माउथ फ्रेशनर की ओर से. इस किस –कांड के लिये पूरी की पूरी वेब्साइट प्रायोजित की गयी है. www.kiss.....in इस वेबसाइट पर प्रतियोगिता में भाग लिया जा सकता है. माउथ फ्रेशनर के इस ब्रांड की प्रचारित खूबी मात्र इतनी है कि इसे खाकर आप अपने आप को चुम्बन लेने-देने केलिये तैयार रहते हैं. विज्ञापन यह सन्देश देने का प्रयास करता है कि कहीं भी कभी भी आपको चूमने –चाटने के लिये तैयार रहना चाहिये और यह सम्भव है फलां फलां ब्रांड की माउथ फ्रेशनर से.
क्या कहने इस मार्केटिंग के और क्या बात है विज्ञापन की . किंतु बात यहां मात्र विज्ञापन की ही नहीं है. इस विज्ञापन के पीछे जो मानसिकता व संस्कृति है, मैं उसे रेखांकित करना चाहता हूं.
पहले पहल इस विज्ञापन को मैने एम टी वी ( MTV) चैनल पर देखा.हैरानी हुई. किंतु यह हैरानी और अधिक बढ़ गयी जब मैने उक्त website देखी. अनेक फिल्मी अभिनेत्रियों के चित्र यहां दिखाये गये हैं ,और इन चित्रों के नीचे एक संख्या लिखी हुई है जो इन अभिनेत्रियों को प्राप्त मतों की संख्या है- जो इन्हे Most kissable (अति चुम्बनीय) बनाते हैं.
फिर आती हैं चुम्बन की कहानियां. भिन्न भिन्न प्रतिभागियों ने अपने पहले चुम्बन की कहानी भी लिखी है ( धैर्य की कमी के कारण मैं इन्हे पढ़ न सका)
इस पूरी ‘खोज’ की पृष्ठभूमि यूं है कि Advertising Management विषय की class में मैने छात्रों को assignments दिये थे और उनसे विज्ञापन के नये उदाहरण(approaches/strategies) ढूंढ़ कर लाने को कहा था.
कुछ अन्य विज्ञापनों की चीर-फाड़ फिर कभी.
( कहीं जाने-अनजाने मैं मुझसे इस वेबसाइट का प्रचार न हो जाये, इसलिये पूरा नाम नहीं दे रहा, साथ ही माउथ फ्रेशनर का नाम का उल्लेख भी नहीं किया गया है)
जो भी हो क्या आप उस पहले-पहल अनुभव को कुछ exciting बना कर एक मसालेदार स्टोरी के रूप में पेश कर सकते हैं ?
नहीं ,मैं किसी सस्ती सेक्सी पत्रिका की बात नहीं कर रहा. अपने चुम्बन की कहानी बनाकर गोवा की मुफ्त यात्रा का पुरुस्कार जीतने की प्रतियोगिता आयोजित की गयी है एक ब्रांड के माउथ फ्रेशनर की ओर से. इस किस –कांड के लिये पूरी की पूरी वेब्साइट प्रायोजित की गयी है. www.kiss.....in इस वेबसाइट पर प्रतियोगिता में भाग लिया जा सकता है. माउथ फ्रेशनर के इस ब्रांड की प्रचारित खूबी मात्र इतनी है कि इसे खाकर आप अपने आप को चुम्बन लेने-देने केलिये तैयार रहते हैं. विज्ञापन यह सन्देश देने का प्रयास करता है कि कहीं भी कभी भी आपको चूमने –चाटने के लिये तैयार रहना चाहिये और यह सम्भव है फलां फलां ब्रांड की माउथ फ्रेशनर से.
क्या कहने इस मार्केटिंग के और क्या बात है विज्ञापन की . किंतु बात यहां मात्र विज्ञापन की ही नहीं है. इस विज्ञापन के पीछे जो मानसिकता व संस्कृति है, मैं उसे रेखांकित करना चाहता हूं.
पहले पहल इस विज्ञापन को मैने एम टी वी ( MTV) चैनल पर देखा.हैरानी हुई. किंतु यह हैरानी और अधिक बढ़ गयी जब मैने उक्त website देखी. अनेक फिल्मी अभिनेत्रियों के चित्र यहां दिखाये गये हैं ,और इन चित्रों के नीचे एक संख्या लिखी हुई है जो इन अभिनेत्रियों को प्राप्त मतों की संख्या है- जो इन्हे Most kissable (अति चुम्बनीय) बनाते हैं.
फिर आती हैं चुम्बन की कहानियां. भिन्न भिन्न प्रतिभागियों ने अपने पहले चुम्बन की कहानी भी लिखी है ( धैर्य की कमी के कारण मैं इन्हे पढ़ न सका)
इस पूरी ‘खोज’ की पृष्ठभूमि यूं है कि Advertising Management विषय की class में मैने छात्रों को assignments दिये थे और उनसे विज्ञापन के नये उदाहरण(approaches/strategies) ढूंढ़ कर लाने को कहा था.
कुछ अन्य विज्ञापनों की चीर-फाड़ फिर कभी.
( कहीं जाने-अनजाने मैं मुझसे इस वेबसाइट का प्रचार न हो जाये, इसलिये पूरा नाम नहीं दे रहा, साथ ही माउथ फ्रेशनर का नाम का उल्लेख भी नहीं किया गया है)
Tuesday, January 20, 2009
ये प्यार का गुरु है ,सिखाता है कि लडकी को कैसे पटाया जाये
यह आप पर निर्भर है कि आप की क्या उम्र है और आप इस विकट समस्या से जूझ रहे हैं या नहीं. यदि आपका किसी पर दिल आ गया है और वह ( लडकी / महिला) आपको घास नहीं डाल रही . अब आप किसका सहारा लेंगे? आपको तलाश है किसी अनुभवी व्यक्ति की जो लडकी पटाने में माहिर हो और आपको कुछ ऐसे टिप्स दे दे ताकि आपका काम चल जाये.
हो सकता है कि आप अपनी महिला दोस्त से वह ‘विशेष’ प्रस्ताव देना चाहते हों मगर हिम्मत नहीं पड़ रही ,या आपको अपने ऊपर पूरा विश्वास नहीं है . फिर आप ऐसा गुरु तलाश रहे हों, जो आपको प्यार में उत्पन्न विकट स्थिति से उबार सके.
कम से मेरे ज़माने में तो आशिक़ इतने forward नहीं थे और न ही उन्हे ऐसे “गुरु” आसानी से उपलब्ध थे जो उनके इस पुनीत कार्य में उनकी मदद कर सकते. बल्कि नौसिखिया आशिक तो ऐसे भी होते थे,जो उम्र भर अपने महबूब से इज़हारेमुहब्बत भी नहीं कर पाते थे और देखते ही देखते “उनकी” कहीं और शादी भी हो जाती थी. अब ज़माना बदल गया है.
इतना बदल गया है ज़माना ?
जी हां, एफ एम रेडियो के अनेक चेनलों पर इस प्रकार के कार्यक्रम उप्लब्ध हैं ,जहां लव-गुरु आपकी ऐसी ही समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करते हैं. एमटीवी नामक चैनल पर ऐसा ही एक प्रोग्राम आता है “लवलाइन” और यहां भी लव गुरु हाज़िर हैं ,जो जिज्ञासुओं को वह सब सीख दे रहे हैं जो,कही और् नही मिल सकती.
जानना चाहते हैं कि ज़माना कितना बदल गया है ? तो आप स्वयं ही परखें और इन रेडिओ टीवी चैनलों का मज़ा लें.
हो सकता है कि आप अपनी महिला दोस्त से वह ‘विशेष’ प्रस्ताव देना चाहते हों मगर हिम्मत नहीं पड़ रही ,या आपको अपने ऊपर पूरा विश्वास नहीं है . फिर आप ऐसा गुरु तलाश रहे हों, जो आपको प्यार में उत्पन्न विकट स्थिति से उबार सके.
कम से मेरे ज़माने में तो आशिक़ इतने forward नहीं थे और न ही उन्हे ऐसे “गुरु” आसानी से उपलब्ध थे जो उनके इस पुनीत कार्य में उनकी मदद कर सकते. बल्कि नौसिखिया आशिक तो ऐसे भी होते थे,जो उम्र भर अपने महबूब से इज़हारेमुहब्बत भी नहीं कर पाते थे और देखते ही देखते “उनकी” कहीं और शादी भी हो जाती थी. अब ज़माना बदल गया है.
इतना बदल गया है ज़माना ?
जी हां, एफ एम रेडियो के अनेक चेनलों पर इस प्रकार के कार्यक्रम उप्लब्ध हैं ,जहां लव-गुरु आपकी ऐसी ही समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करते हैं. एमटीवी नामक चैनल पर ऐसा ही एक प्रोग्राम आता है “लवलाइन” और यहां भी लव गुरु हाज़िर हैं ,जो जिज्ञासुओं को वह सब सीख दे रहे हैं जो,कही और् नही मिल सकती.
जानना चाहते हैं कि ज़माना कितना बदल गया है ? तो आप स्वयं ही परखें और इन रेडिओ टीवी चैनलों का मज़ा लें.
Monday, January 19, 2009
अपने देश में ही क्यों पराये हैं हिन्दीभाषी ?
नहीं ,मैं बम्बई की बात नहीं कर रहा हूं. वहां तो फिलहाल राज ठाकरे के गुंडो की कार्य वाही पर अंकुश लगा हुआ है.हिन्दी भाषियों के प्रति घृणा फैलाने का जो पुनीत कार्य राज ठाकरे ने बम्बई में कर रखा है,कमोबेश वैसी ही हालत उत्तर-पूर्व में भी है. आज नहीं ,बल्कि अनेक वर्षों से यहां हिन्दीभाषी लगातार घृणा का शिकार होते आ रहे है. सबसे ताज़ा-तरीन घटना है आसाम में बदरपुर् व हरंगाजाओ नामक स्टेशनों की तथा त्रिपुरा के धर्मनगर की, जहां भारतीय रेलवे द्वारा नियुक्त तीन दर्जन हिन्दीभाषी युवकों को नौकरी पर हाज़िर होने से रोक लिया गया. जब ये लोग अपनी ड्यूटी पर पहुंचे तो वरिष्ठ अधिकारियों ने स्थानीय लोगों के दबाब में आकर नौकरी से वंचित रखा.
स्थानीय लोग इन हिन्दीभाषियों का विरोध काफी समय से करते आ रहे हैं और अनेक स्थानों पर हिन्दीभाषी हिंसा का शिकार भी हुए हैं. क्या कसूर है इनका ? कहां हैं मानवाधिकार समर्थक और कहां है हमारा कानून? कोई तो बताये कि आखिर अपने देश में ही क्यों पराये हैं हिन्दीभाषी ?
स्थानीय लोग इन हिन्दीभाषियों का विरोध काफी समय से करते आ रहे हैं और अनेक स्थानों पर हिन्दीभाषी हिंसा का शिकार भी हुए हैं. क्या कसूर है इनका ? कहां हैं मानवाधिकार समर्थक और कहां है हमारा कानून? कोई तो बताये कि आखिर अपने देश में ही क्यों पराये हैं हिन्दीभाषी ?
Saturday, January 10, 2009
कैसी कैसी नौटंकी होगी लोकसभा चुनाव में
अभी तक जो भी नौटंकियां राजनैतिक दल करते आ रहे थे, मानो कम थीं.अपनी कमीज़ को औरों से ज्यादा सफेद साबित करने की जो होड़ राजनैतिक दलों में लगी है ,उसका ही नतीजा है समाजवादी पार्टी के नेता अमरसिंह का लखनऊ सीट पर प्रत्याशी की घोषणा.
समाजवादी पार्टी के नेता ने मुन्नाभाई की गान्धीगीरी का चुनावी लाभ उठाने की नीयत से संजय दत्त को लखनऊ से लोकसभा का प्रत्याशी बनने की घोषणा कर दी. कांग्रेस की गान्धीगीरी का उन्हें यही सबसे माक़ूल जवाब लगा. इसमें तर्क ढूंढना फिज़ूल है.संजय दत्त का लखनऊ से क्या और कैसे नाता है, यह सवाल भी बेमानी है. चुनाव में प्रत्याशी सुनिश्चित करने का सबसे बडा पैमाना उसका "जिताऊ" होना है, फिर वह सारी दीगर कसौटिओं पर भले ही खोटा निकले. कांग्रेस व भाजपा के अलावा समाजवादी पार्टी के लिये भी यह फिल्मी गली अपरिचित नहीं है. राज बब्बर ( भले ही अब वह कांग्रेस की गोद में बैठ गये हैं), व जया प्रदा का सहारा वह पहले भी ले चुकी है.
अभी तक अनेक चुनावों का इतिहास सिद्ध करता है फिल्मी कलाकारों की लोकप्रियता सभी दलों के लिये कारगर हथियार साबित हुई है. तमिलनाड की तो पूरी की पूरी राजनीति फिल्म से जुडी शख्सियतों के इर्द-गिर्द ही घूमती आ रही है. एम जी आर से लेकर विजयकांत तक सब 'मौलीवुड" के रंग में ही रंगे हुए रहे हैं. एन टी रामा राव के बाद आन्ध्र में भी जब यही रंग चढ़ा, तो वहां भी ऐसे व्यक्ति निरंतर सफलता पाने के प्रयास मे लगेगी हैं जिनका नाता फिल्मों से रहा है. नयी पार्टी प्रजाराज्यम भी इसी का नतीजा है.
बम्बई नगरी में सुनील दत्त लम्बे अर्से तक राजनीति में फिल्म उद्योग के प्रतिनिधि के रूप में रहे. अमिताभ का जिक्र छोड़ भी दें तो शतुघ्न सिन्हा, राजेश खन्ना की लोकप्रियता समय समय पर कांग्रेस व भाजपा ने भुनाई. इसी क्रम में गोविन्दा की लोकप्रियता का लाभ मंत्री राम नाइक को हराने में हुआ और अब शाहरुख की चर्चा है कि वह बम्बई की एक सीट पर कांग्रेस के प्रत्याशी बनेंगे .
अब भाजपा को कौन सा ठुमके वाला पसन्द आता है, यह जानने के लिये ज्यादा इंतज़ार नहीं करना पडेगा. टी वी कलाकर नितीश भारद्वाज,अरविन्द त्रिवेदी,दीपिका चिखालिया, स्मृति ईरानी आदि को तो भाजपा भुना ही चुकी है.
मजे की बात तो यह है कि जब कई टिप्पणीकारों ने ( इसमें कभी संजय दत्त के वकील रहे और लखनऊ से एक बार प्रत्याशी रहे राम जेठ्मालानी भी शामिल हैं) संजय दत्त के नाम पर कानूनी योग्यता का प्रश्न खड़ा किया ,तो झट से उनके स्थान पर नयी पत्नी मान्याता का नाम अमर सिंह ने आगे कर दिया.साथ ही भोजपुरी कलाकार मनोज तिवारी का नाम भी उनके पक्ष से घोषित हो चुका है.
तो अब इस स्थिति तक आ गयी है राजनैतिक नौटंकी. दुहाई है.
समाजवादी पार्टी के नेता ने मुन्नाभाई की गान्धीगीरी का चुनावी लाभ उठाने की नीयत से संजय दत्त को लखनऊ से लोकसभा का प्रत्याशी बनने की घोषणा कर दी. कांग्रेस की गान्धीगीरी का उन्हें यही सबसे माक़ूल जवाब लगा. इसमें तर्क ढूंढना फिज़ूल है.संजय दत्त का लखनऊ से क्या और कैसे नाता है, यह सवाल भी बेमानी है. चुनाव में प्रत्याशी सुनिश्चित करने का सबसे बडा पैमाना उसका "जिताऊ" होना है, फिर वह सारी दीगर कसौटिओं पर भले ही खोटा निकले. कांग्रेस व भाजपा के अलावा समाजवादी पार्टी के लिये भी यह फिल्मी गली अपरिचित नहीं है. राज बब्बर ( भले ही अब वह कांग्रेस की गोद में बैठ गये हैं), व जया प्रदा का सहारा वह पहले भी ले चुकी है.
अभी तक अनेक चुनावों का इतिहास सिद्ध करता है फिल्मी कलाकारों की लोकप्रियता सभी दलों के लिये कारगर हथियार साबित हुई है. तमिलनाड की तो पूरी की पूरी राजनीति फिल्म से जुडी शख्सियतों के इर्द-गिर्द ही घूमती आ रही है. एम जी आर से लेकर विजयकांत तक सब 'मौलीवुड" के रंग में ही रंगे हुए रहे हैं. एन टी रामा राव के बाद आन्ध्र में भी जब यही रंग चढ़ा, तो वहां भी ऐसे व्यक्ति निरंतर सफलता पाने के प्रयास मे लगेगी हैं जिनका नाता फिल्मों से रहा है. नयी पार्टी प्रजाराज्यम भी इसी का नतीजा है.
बम्बई नगरी में सुनील दत्त लम्बे अर्से तक राजनीति में फिल्म उद्योग के प्रतिनिधि के रूप में रहे. अमिताभ का जिक्र छोड़ भी दें तो शतुघ्न सिन्हा, राजेश खन्ना की लोकप्रियता समय समय पर कांग्रेस व भाजपा ने भुनाई. इसी क्रम में गोविन्दा की लोकप्रियता का लाभ मंत्री राम नाइक को हराने में हुआ और अब शाहरुख की चर्चा है कि वह बम्बई की एक सीट पर कांग्रेस के प्रत्याशी बनेंगे .
अब भाजपा को कौन सा ठुमके वाला पसन्द आता है, यह जानने के लिये ज्यादा इंतज़ार नहीं करना पडेगा. टी वी कलाकर नितीश भारद्वाज,अरविन्द त्रिवेदी,दीपिका चिखालिया, स्मृति ईरानी आदि को तो भाजपा भुना ही चुकी है.
मजे की बात तो यह है कि जब कई टिप्पणीकारों ने ( इसमें कभी संजय दत्त के वकील रहे और लखनऊ से एक बार प्रत्याशी रहे राम जेठ्मालानी भी शामिल हैं) संजय दत्त के नाम पर कानूनी योग्यता का प्रश्न खड़ा किया ,तो झट से उनके स्थान पर नयी पत्नी मान्याता का नाम अमर सिंह ने आगे कर दिया.साथ ही भोजपुरी कलाकार मनोज तिवारी का नाम भी उनके पक्ष से घोषित हो चुका है.
तो अब इस स्थिति तक आ गयी है राजनैतिक नौटंकी. दुहाई है.
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