Monday, July 30, 2007

नाचने दो मंत्री को भी...

हिमाचल प्रदेश के एक मंत्री को त्यागपत्र देना पडा क्योंकि टीवी के एक चैनल ने स्टिंग औपरेशन् द्वारा अपने चैनल पर दिखा दिया था कि अपने जन्मदिन की पार्टी में मंत्री जी नाच रहे थे.
मंत्री जी ( जी एस बाली) ने क्या बिगाडा था किसी का ? अरे भाई जन्म दिन भी उनका. पार्टी भी दी उन्होने ( या उनके मित्रों ने ). नचैया भी सारे वे खुद लेके आये, खाना भी उन्ही का. ( और ..पीना भी ). नाचे भी वह खुद.

क्या लेना था मीडिया को? खाम्ख़ां टांग अडाने की आदत से बाज नही न आते कुछ लोग.

क्यों क्या मंत्री आदमी नही होता?
क्या मंत्री के जज़बात नही होते ?
क्या मंत्री खुश नही दिख सकता ? ये मीडिया वाले भी न .. अपने आप को क्या समझते है ? क्या इनके जन्म दिन नही होते ? क्या ये लोग पार्टियां नही देते? क्या ये खाते-पीते नही है ? क्या ये नाचते नही है ?
तो फिर दूसरे को नाचते देख तुम्हारे पेट में क्यों दर्द होता है ?

बोलो बोलो,है कोई जबाब तुम्हारे पास ?
हां,अगला बहक जाय, दारू -शारू पीके दंगा -शंगा करे, तो पक्कडो. जरूर पकडो. मगर खाली-पीली ? क्या बात हुई ?

हां नशे में कुछ गलत शलत हर्कत कर जाये किसी के साथ, तो पकडो.जरूर पकडो. मगर खाली-पीली ?

हां , किसी पब्लिक प्लेस में कुछ करता हुआ पाये जाये, तो फिर मांगो ना इस्तीफा ? अपनी निज़ी पार्टी में .कोई गल नई, बश्शाओ . खूब खेलो. खुलकर खेलो ना फरुखाबादी .

मुख्यमंत्री जी, आपने भी गलत परिपाटी दाल दी ना. इस्तीफा मांग कर.
अब होगा क्या ? क्या इससे पार्टियां रुक जायेंगी ? या जन्म दिन नही होंगे ? अब क्या रोज़ इस्तीफा लोगे ? किस किसका लोगे ? मंत्री कम पड जायेंगे ? जितने एम एल ए हैं ना तुम्हारी पार्टी में ,सब को मंत्री बनाओगे क्या ?

Sunday, July 29, 2007

मैं नही पीता


मैं नहीं पीता

किंतु

मेरे दोस्त बताते हैं कि

शराब गम गलत करती है.

भला

गम भी कोई गलत करने की चीज़ है ?


सोचता हू मैं.


और

सोचते ही सोचते ,

इकट्ठा कर लेता हूं,

गम का सामान.


कुछ यादें,

कुछ अनुभवों की कडुवाहट,

कुछ टूटे सम्बन्धों का कसैलापन,

कुछ नये रिश्तों के सभावित मसौदे,


कुछ सहज स्वीकृत धोखे,

कुछ पूर्व मित्रों के जताये एहसानात,

कुछ गुनगुने विश्वासघात.


ज़ाडों की कुछ ठंडी रातें, चन्द रेगिस्तानी दिन

कुछ लिजलिजे आदर्श.



तह करके,

सजाके रख लेता हू अपने पास,

ऐसे,

जैसे रखता है कोई पिता,

अपने दूर परदेश गई ब्याहता बिटिया के

बचपन के खिलोने.

वाह!

गम भी कोई गलत करने की चीज़ है ?

Thursday, July 26, 2007

तो ये है महिला सशक्तीकरण ?


बडा शोर सुनते थे पहलू में दिल का

जो चीरा तो कतरा-ए-खूं भी न निकला.



ज़ब प्रतिभा पाटिल को महामहिम राष्ट्रपति पद हेतु प्रत्याशी बनाया गया था, तो कांग्रेस पार्टी ने मीडिया के सभी चौराहों पर खूब ढोल पीटे थे कि ये है महिला सशक्तीकरण की दिशा में पहला कदम.जिसने भी प्रतिभा पाटिल का विरोध किया उस पर "महिला विरोधी" होने का लेबल चस्पां कर दिया गया.

चहेते सम्पादकों से अनेक सम्पादकीय लिखवाये गये , मीडियाकर्मियों को शुभेक्षाओं से नवाज़ा गया जिसने प्रतिभा पाटिल के समर्थन में कसीदे पढे.कई तो ऐसे कसीदे लिख पढ कर पद्मश्री,पद्मभूषण आदि की तैय्यारी में अभी से बैठे हैं.तो कुछ राज्यसभा की आस लगाये है.

अभी कल की ही बात है जब श्रीमती प्रतिभा पाटिल ने महामहिम राष्ट्रपति पद की शपथ लेते समय महिला सशक्तीकरण को ही अपने सम्भाषण का मुख्य मुद्दा बनाया था , लगने लगा था कि बस अब हो गया भरतीय नारी का कल्याण और मिल गयी उसे सदियों की दासता से मुक्ति एक ही झटके में. चढने ही वाली है भारतीय् नारी उत्तंग शिखर पर.

अगले ही दिन दिखा सत्ता का असली रंग.सत्ता का चरित्र क्या होता है ,पता लग गया. मुलम्मा उतर गया.
नारे और वादे क्या होते है और क्या होती है उनकी उपयोगिता, सामने आ गया.
दिल्ली राज्य के पुलिस कमिश्नर की नियुक्ति में जब 1972 बैच की IPS officer Dr. Kiran Bedi वरिष्ठता क्रम मं सबसे आगे दिखीं तो सत्ता को पसीने आ गये.शुरु हो गया क्रम उन बहानों को ढूंढने का जिनके चलते किरन बेदी को किनारे लगाया जा सके.

पहले दिल्ली के कुछ वकीलों से एक बयान दिलवाया गया कि यदि किरन बेदी को यह पद दिया गया तो वे विरोध करेंगे क्यों कि लगभग 20 वर्ष पहले किरन बेदी के नेट्रत्व में किसी जुलूस पर पुलिस ने लाठी चार्ज किया था. फिर बहाना बनाया गया कि Dr. Kiran Bedi हाल फिल्हाल के वर्षों में active police-role में नही रही हैं. यानि कि हर तरह से योग्यता के प्रश्न को भुलाने का बहाना.

सता योग्यता नही देखती, सत्ता seniority नही देखती. सत्ता देखती है ठ्कुर सुहाती. You should be politically correct to find favour with powers that be.यदि आपका अपना कोई वज़ूद है,यदि आप के पास स्वतंत्र विचार है,यदि आप में बिना किसी नेता की चप्पू बने अपना नाम स्वयम स्थापित करने की योग्यता है, तो निश्चित ही आप सत्ता के गलियारों के चहेते/ चहेती नही बन सकते. यह चरित्र है सत्ता का.


किरन बेदी का उदाहरण यह सभी सिद्ध करता है.

अब यह जग जाहिर है कि महिला सशक्तीकरण मात्र एक नारा है, नितांत खोखला नारा,जिसे जब चाहे अपनी सुविधानुसार इस्तेमाल किया जा सकता है.
प्रश्न यह है कि कब तक निरीह जनता भुलावे भरे नारों ,छलावे भरे सपनों को देख कर गुमराह होती रहेगी ?

( Kiran Bedi's photo: Utsav Arora ( http://www.pbase.com))

Wednesday, July 25, 2007

एक फ्लौप सर्वेक्षण के नतीज़े

चिट्ठाकारी से सम्बन्धित एक सर्वेक्षण की प्रश्नावली ( questionnaire) मैने इस चिट्ठे पर 18 जुलाई को post किया था, जिसमें इस विषय पर कुछ रोचक प्रश्न शामिल थे. आशा थी,कि अधिकांश पढने वाले भाग लेंगे.
मित्र अरुण अरोरा जी ने इस सर्वेक्षण की घोषणा को एक लिंक भी अपनी साइट पर दिया ताकि अन्य लोग भी भाग ले सकें,परंतु कुल मिलाकर 34 लोगों ने इस सर्वेक्षण में हिस्सा लिया. हालांकि इस सर्वेक्षण की सीमाएं भी थीं तथा अनेक प्रश्नों का स्वरूप आदर्श नहीं था( जैसा कि सारथी जी ने सूचित भी किया था).

sample size कम होने , तथा सर्वेक्षण में प्रयुक्त प्रश्नावली (questionnaire) की सीमाओं के बावजूद नतीज़े प्रस्तुत कर रहा हू. इसमे ज्यादा स्पष्टीकरण की आवश्यकता भी नहीं है अत: सारे परिणाम ज्यों की त्यों प्रस्तुत हैं.


The statistics associated with results are shown below. This display can not be altered.
कौन से विषयों में आपकी रुचि है ?

1. ब्लौगिंग तक्नीक आदि 6 (18%)
2. काव्य -कथा साहित्य 7 (21%)
3. हास्य-व्यंग्य 11 (32%)
4. घरेलू उपयोगी विषय् 0 (0%)
5. खेल-कूद,स्वास्थ्य 0 (0%)
6. आर्थिक,धन,निवेश,बचत आदि 0 (0%)
7. सिनेमा, टी.वी ,मनोरंजन् 2 (6%)
8. राजनीति,कूट्नीति, चुनाव आदि 8 (24%)
9. सैर सपाटा, भ्रमण, 0 (0%)
Total Votes: 34


आप अमूमन कितने चिट्ठे /ब्लौग् प्रति सप्ताह देखते हैं?

1. पन्द्रह से कम् 3 (9%)
2. पन्द्रह से तीस् 5 (16%)
3. तीस से पचास 10 (31%)
4. पचास से भी अधिक् 14 (44%)
Total Votes: 32


क्या आप ब्लौग एग्रीग्रटेर की सेवाय्रें प्रयोग करते है ?

1. हां सिर्फ एक :नारद् 2 (6%)
2. हां सिर्फ एक: ब्लौग्वाणी 17 (49%)
3. हां सिर्फ एक: चिट्ठाजगत 0 (0%)
4. हां सिर्फ एक: हिन्दीब्लौग्स् 0 (0%)
5. हां,एक से अधिक् 10 (29%)
6. हां ,लगभग सभी 5 (14%)
7. नियमित नही, सिर्फ कभी कभी 0 (0%)
8. कभी नही 1 (3%)
Total Votes: 35


ब्लौग लिखना/ पढना आपके लिये क्या है?

1. ज्ञान वर्धन 10 (30%)
2. टाइम पास 2 (6%)
3. मनोरंजन् 5 (15%)
4. जन सम्पर्क /मित्र मंडल 2 (6%)
5. उपर्युक्त सभी 9 (27%)
6. इनमें से कोई भी नहीं 5 (15%)
Total Votes: 33


क्या आप हिन्दी के अतिरिक्त अन्य भाषाओं में चिट्ठे लिखते /पढते है ?

1. सिर्फ हिन्दी में 16 (50%)
2. हिन्दी व अंग्रेज़ी में 15 (47%)
3. हिन्दी व अन्य भारतीय भाषाओं में 1 (3%)
Total Votes: 32


हिन्दी चिट्ठों की विषय वस्तु के बारे में आपकी राय ?

1. बहुत ही रोचक विषय 7 (23%)
2. कुछ कुछ रोचक् 21 (68%)
3. कम रोचक 1 (3%)
4. बहुत ही कम रोचक् 2 (6%)
Total Votes: 31


हिन्दी चिट्ठों की लेखन शैली/ भाषा पर आपकी राय ?

1. आशा से भी अधिक अच्छी 3 (9%)
2. आशा के अनुरूप् 15 (47%)
3. अपेक्षा से कम् 7 (22%)
4. बहुत अधिक सुधार की गुंजाइश 7 (22%)
Total Votes: 32


हिन्दी चिटृठों के कुल पाठक वर्ग की संख्या का अनुमान ?

1. लग्भग 1000 20 (63%)
2. 1000 से 2000 1 (3%)
3. 2000 से 5000 5 (16%)
4. 5000 से 10000 2 (6%)
5. 10000 से 20000 1 (3%)
6. 20000 से 50000 1 (3%)
7. 50000 से अधिक किंतु एक लाख से कम् 1 (3%)
8. एक लाख से अधिक् 1 (3%)
Total Votes: 32




अगला सर्वेक्षण शीघ्र ही आयेगा,कृपया नये survey हेतु कुछ विषय( topics) का सुझाव दें. स्वागत .

Tuesday, July 24, 2007

जब सभी ने होंठ पर विद्रोह के स्वर रख लिये

जब सभी ने होंठ पर विद्रोह के स्वर रख लिये,
एह्तियातन हमने अपने होंठ सी कर रख लिये.


दिल में मेला सा लगा था ,इसलिये बेचैन था,
चन्द सन्नाटे चुरा कर दिल के अन्दर रख लिये.


सब समारोहों में जाने के लिये तैयार थे,
राम मुंह पर था, बगल में सबने खंजर रख लिये.


पूजना सब चाहते थे ,अपने अपने इष्ट को,
सबने आलों में सजाकर अपने ईश्वर रख लिये.


जब भी धोखों की नदी में डूबने का मन हुआ,
हमने अपने दिल के अन्दर चन्द पत्थर रख लिये.


युं कहा करते थे मेरे दोस्त ,कुछ अपनी सुना,
मेज़ पर , बापू के, मैने तीन बन्दर रख लिये

Friday, July 20, 2007

चिट्ठाकारी का सर्वेक्षण् :एक अनुरोध्

मैने 'चिट्ठाकारी का सर्वेक्षण्' शीर्षक से अपनी पिछली पोस्ट में आप सभी पाठकों व चिट्ठाकारों से सर्वेक्षण में भाग लेने का अनुरोध किया था.तब से अब तक 150 हिट्स होने के बावजूद् मात्र 24 लोगों ने सर्वेक्षण में हिस्स लिया है.यह संख्या भी कल शाम आठ बजे तक थी .उसके बाद कोई नया मत नही आया है.इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि यह पोस्ट अब एग्ग्रीग्रेटर के प्रथम पृष्ठ पर नज़र नहीं आ रही होगी.

मेरा सभी से पुन: अनुरोध है इसे अपने पोस्ट पर link करें ताकि अधिक से अधिक लोग इसे देखें और सर्वेक्षण् में भाग लें . Questionnaire बहुत आसान है. कुल 24 मतॉं के आधार पर कोई भी फैसला कठिन होगा.


मेरी मूल (original )पोस्ट्: ऎक बार फिर :


हिन्दी में चिट्ठाकार भी बढते जा रहे हैं और हिन्दी चिट्ठों के पाठक भी.ऐसे में यह जानकारी रुचि का विषय हो सकती है कि इन चिट्ठों के लेखक व पाठक क्या सोचते हैं.
किन किन विषयों मे उनकी रुचि है ,क्या वे पढना चाहते हैं आदि आदि.
मैने सोचा कि क्यों न इस विषय पर एक सर्वेक्षण आयोजित किया जाये.
इस दृष्टि से एक प्रश्नावली तैयार की है जिसमें सिर्फ आठ प्रश्न हैं.
आप सभी चिट्ठाकारों से अनुरोध है कि अधिक से अधिक संख्या में इस सर्वेक्षण में भाग लें तथा अन्य मित्रों / पाठकों को भी इस सर्वेक्षण में भाग लेने हेतु प्रेरित करें.

नियमित सर्वेक्षण्:

इस चिट्ठे पर प्रत्येक पक्ष ( पखवाडे) एक नये विषय पर सर्वेक्षण आयोजित किया जायेगा. सर्वेक्षण् के विषयों पर आप सभी की राय भी ली जायेगी.वे सभी विषय जो हमें कही ना कहीं झकझोरते हैं, जिन पर समाज में राय बंटी हुई होती है, उन्हे इस प्रकार के सर्वेक्षणों हेतु चुना जायेगा,तथा विश्लेषण के बाद नतीजों को आप सब के समक्ष रखा जायेगा,ऐसी योजना है.
यह सब आप लोगों की भागीदारी पर ही निर्भर होगा,अत: आप सभी को इस पहले सर्वेक्षण् से ही शुरुआत करनी होगी.

दाहिनी ओर मेरी फोटो के पास बने लोगो पर जा कर क्लिक करें ,एक questionnaire आपके सामने खुल जायेगा. प्रश्नों का उत्तर दें और बस. (survey) सर्वेक्षण् के परिणाम की प्रतीक्षा करें.
यह सर्वेक्षण् पूरे सप्ताह भर के लिये खुला है. यानी आप आज से 25 जुलाई तक कभी भी वोट कर सकते हैं.
25 जुलाई के बाद एक नया विषय आप सभी के समक्ष होगा. फ़िर ये क्रम निरंतर जारी रहेगा.

Wednesday, July 18, 2007

14 जुलाई की ब्लौगर मीट:एक और अ-रपट्

इत्ती सारी रपटें तो पैले ई पौंच गयी.सबन नें पढ भी लयी. हज़म ऊ कर लयी. फिर भी का जर्रूरत आन पडी अ-रपट लिक्खन की ?
तो भैया जी ,बात ऐसी ही कि जो पेट में पडत है ,बाय .
बाहर तो आनें ई चिईयें.
जो अन्दर की बात बाहर नायं निकरी तो है जय्ये बदहज़मी.
ताई मारें हमने सोची कि ..गुरु है जाओ शुरू...

बात शुरू कत्त है कौन कौन लये था 'हिडेन अजेंडा'.

एक ने कह दई कि सबतों बढिया ब्लौग लिखन् वारे है : सारथी उर्फ जे सी शाश्त्री फिलिप.बडी मेहनत कत्त हैं परंतु लिखतई जाय रहे है. थकत नही है.दूसरे ने बोली सच्ची बात बहिनी. बिल्कुल सच्ची.
अब जब दो बहिनें काऊ की तारीफ कर दें तो तीसरे भैया का सुन सकत है? भैया ने सुनी और फर्मान जारी कर दओ कि वे तो ईसाइयत को प्रचार करवे वाले है. चौथे भैया बोले 'ना भई ,जे सही (नही है. और फिर गर सही है तो भी क्या, हम क्या किसी से उसका धरम प्पूछ कर बात करेंगे .बात आई गई है गयी. जी तो अच्छो भयो कि ज्यादा लोग सुन नाई पाये, नई तो शायद है जाती वही पर ...)

एक ने' जीतु भाई नही आये 'की टिप्पणी की तो दूसरा बोलन लगे. अच्छा हुआ ,नही तो पूरा फोकस उन्ही पे होता, हमें कौन पूछता?

एक ने लडू बांटे ,खुशी की बात थी. दूसरे ने तीसरे से कहा, भैया जी मत खाना, मेरे ड्ब्बे क्र लड्डू में 'फफून्द' लगी है.
देखो कही ,तुम्हारे डब्बे में भी तो ....

हम साम्प्रदायिकता की कितनी भी आलोचना करें. 'लीग' को कितना भी कोसें. हम में से हरेक के अन्दर एक 'लीगी' छुपा हुआ है. ऎक बहेन जी बडी शान से से कह रही थी आज मेरी चार छत्तीस्गढियोंसे मुलकात हुई.( असली पहचान छुपाने के लिये ,प्रदेश का नाम बदल दिया गया है)फ़िर एक भैया बोले कि मेरी बेटी का नाम वो है ,जो आपके प्रदेश में एक फूल होता है.

में तो पहली बार किसी ऐसी मीट में गया था. कई अन्य भी कई और अन्यों से अपरिचित थे. एक बहिनी का परिचय तमाम अन्य से यों हुआ : सफेद शिर्ट मे'फलाने ' है, उनके बगल में 'ढिकाने'. और जो उनके पीछे दिख नही पा रहे वे है 'एक्स', बगल में जिनका जूता ज्यादा चमक रहा है वे हैं 'वायी', . एक नये आगंतुक बोले, " मे हूं'ज़ेड' मेरे ब्लौग का नाम....." .
तब तक बहिनी सब नामों को भूल भी चुकी थी, बोली," चलो कोई बात नही , चार को पहचानती हू और चार का नाम जानती हू,इतना काफी है".

एक सुजान ब्लौगर जब हिन्दी के स्पीच रिकग्नीशन् ( आवाज पहचानने वाला )सोफ्ट्वेयर के बारे में बताने लगे तो दूसरे टांग घुस्साऊ मास्टेर साहेब से चुप ना रहा गया. उन्होने कुछ विपरीत टिप्पणी की. पहले वाले समझ गये और नपी तुली हिन्दी में आखिर डांट पिलायी तब जाकर मास्टेर साहेब चुपा गये.

......
अंत में जब सब जाने वाले थे तब प्रवेश हुआ ... अब जाने भी दो यारो ( जब अभी तक की रपट में किसी का नाम नही आया ,तो अब आखिर में क्यों ?

कुल मिला कर बढिया रहा मामला.

चिट्ठाकारी का सर्वेक्षण्

हिन्दी में चिट्ठाकार भी बढते जा रहे हैं और हिन्दी चिट्ठों के पाठक भी.ऐसे में यह जानकारी रुचि का विषय हो सकती है कि इन चिट्ठों के लेखक व पाठक क्या सोचते हैं.
किन किन विषयों मे उनकी रुचि है ,क्या वे पढना चाहते हैं आदि आदि.
चूंकि में सांख्यिकी व बाज़ार अनुसन्धान विषय पढता पढाता हूं ,मैने सोचा कि क्यों न इस विषय पर एक सर्वेक्षण आयोजित किया जाये.
एक मुफ्त उपलब्ध औज़ार की मदद से एक प्रश्नावली तैयार की है जिसमें सिर्फ आठ प्रश्न हैं.
आप सभी चिट्ठाकारों से अनुरोध है कि अधिक से अधिक संख्या में इस सर्वेक्षण में भाग लें तथा अन्य मित्रों / पाठकों को भी इस सर्वेक्षण में भाग लेने हेतु प्रेरित करें.

नियमित सर्वेक्षण्

इस चिट्ठे पर प्रत्येक पक्ष ( पखवाडे) एक नये विषय पर सर्वेक्षण आयोजित किया जायेगा. सर्वेक्षण् के विषयों पर आप सभी की राय भी ली जायेगी.वे सभी विषय जो हमें कही ना कहीं झकझोरते हैं, जिन पर समाज में राय बंटी हुई होती है, उन्हे इस प्रकार के सर्वेक्षणों हेतु चुना जायेगा,तथा विश्लेषण के बाद नतीजों को आप सब के समक्ष रखा जायेगा,ऐसी योजना है.
यह सब आप लोगों की भागीदारी पर ही निर्भर होगा,अत: आप सभी को इस पहले सर्वेक्षण् से ही शुरुआत करनी होगी.

दाहिनी ओर मेरी फोटो के पास बने लोगो पर जा कर क्लिक करें ,एक questionnaire आपके सामने खुल जायेगा. प्रश्नों का उत्तर दें और बस. (survey) सर्वेक्षण् के परिणाम की प्रतीक्षा करें.
यह सर्वेक्षण् पूरे सप्ताह भर के लिये खुला है. यानी आप आज से 25 जुलाई तक कभी भी वोट कर सकते हैं.
25 जुलाई के बाद एक नया विषय आप सभी के समक्ष होगा. फ़िर ये क्रम निरंतर जारी रहेगा.

Wednesday, July 11, 2007

चन्द्र शेखर : एक राजनैतिक संत


चन्द्र शेखर : एक राजनैतिक संत
अनेक दिनों से जानकारी मिल रही थी कि अध्यक्ष जी (चन्द्रशेखर जी के चाहने वाले उन्हे इसी नाम से सम्बोधित करते थे) कुछ ज्यादा ही अस्वस्थ हैं.बार बार सोचता था के अगले रविवार भोन्डसी ( गुडगांव स्थित भारत यात्रा केन्द्र ) आश्रम जरूर जाऊंगा. अध्यक्ष जी के बारे में नियमित जानकारी के दो ही सूत्र थे -डा. सुब्रमण्यम स्वामी या सजपा की सचिव वसंता नन्द्कुमार. मेरा मोबाइल फोन खो जाने से वसंता का नम्बर मिलना मुश्किल हो रहा था, और डा.स्वामी ,सदैव की भांति इस वर्ष भी पढाने हार्वर्ड वि.वि. चले गये थे.

वही हुआ जिसका डर था. परसों रात टीवी से खबर हुई कि अध्यक्ष जी की हालत गंभीर है. और सुबह पता चला कि ... नही रहे.

इतवार का दिन था अत: ड्राइवर को नही आना था. पहले सोचा कि अकेला चला जाऊं पर यह सोचकर कि वी आई पी गणों के आने से साउथ एवेन्यू में भीड होगी, ड्राइवर को बुलवा लिया. तीन साउथ एवेन्यू पहुंचते ही सबसे पहले सुधीन्द्र भदौरिया दिखे. मैने उन्हे याद दिलाया कि 1986 में यहां सबसे पहले वही लेकर आये थे.य़ुवा लोक दल का मैं राष्ट्रीय सचिव था. सुधीन्द्र भदौरिया उस समय युवा जनता के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे. फिर तो रोज़ का नियम बन गया. 7, जनतर मंतर से निकल कर हम सब युवा साथी सुधीन्द्र भदौरिया के साथ अध्यक्ष जी के पास पहुंच जाते. श्याम रज़क, सुमन,त्रिलोक त्यागी, दुश्यंत गिरि,भक्तचरण दास,बालू, ( और अन्य वे भी जो अब तक कई बार एम पी,एम एल ऎ,मंत्री बन चुके है..).
कभी कभी डा. सुब्रमण्यम स्वामी के साथ भी जाना हो जाता था. फिर डा. सुब्रमण्यम स्वामी ने मुहिम चलायी कि लोकदल व जनता पार्टी का विलय होना चाहिये, अजीत सिंघ को जनता पार्टी का अध्यक्ष बना कर चन्द्र शेखर जी को प्रधान मंत्री बनाना है. कुछ लोगों ने ,जो चन्द्र शेखर जी के काफी करीब थे ,उन्होने विरोध करना शुरू किया और यह भी कानाफूसी की कि डा स्वामी उन्हे राजनैतिक रूप से खत्म कर देंगे यदि ऐसा हो गया तो. किंतु चन्द्र शेखर जी ने किसी की नही सुनी और एक सच्चे राजनैतिक संत की तरह अपने पद की कुरबानी के लिये तैयार हो गये.

फिर वीपी सिंह सामने आ गये. जनता दल की भूमिका बनने लगी थी. हम सब जानते थे कि चन्द्र शेखर जी मन से वी पी सिंह की अध्यक्षता हेतु तैयार नही होंगे. किंतु विपक्षी एकता एवम राष्ट्र के व्यापक हित में फिर एक बार वह मान गये और वी पी सिंह ने जनता दल की अध्यक्षता सम्हाल ली.
जब 1989 के आम चुनावों में जनता दल के संसदीय नेता पद का चुनाव आया तो जाहिर है पार्टी में अलग अलग राय के लोग थे. बैठक के एक दिन पहले सहमति बन गयी थी कि चौ.देवी लाल को नेता पद सौंपा जायेगा. किंतु संसद भवन के सेंट्रल हौल में सम्पन्न बैठक में जिस प्रकार चौ.देवी लाल को नेता चुने जाने के बाद नाटकीय रूप से पगड़ी वी पी सिंह के सर पर रख दी गयी वह अपने आप में एक ओछी राजनीतिक घटना थी जिसकी मिसाल मिलना मुश्किल है. ऐसी स्थिति में चन्द्रशेखर जैसा राजनैतिक संत ही इस गरल को पचा सकता था और वही उन्होने किया.

जैसा कि हम लोगों को अन्देशा था, वी पी सिंह की सरकार शुरू से ही डावांडोल रही. चन्द्रशेखर ने सरकार से दूरी ही बना रखी थी. अध्य़क्ष जी के नेतृत्व के लिये सदैव तैयार कुछ नेताओं ने जनता पार्टी का रूप बना कर रखा ही था और जनता दल में हम लोग शामिल नही हुए थे. कही न कही एक उम्मीद थी कि अध्यक्ष जी जनता दल से अलग हो ही जायेंगे. जद से बाहर रहने वाले इस समूह में प्रमुख थे देवेगौडा, डा. स्वामी, सैयद शहाबुद्दिन,इन्दुभाई पटेल,सरोजिनी महिषी,जयंत मल्होत्रा आदि. आखिर हम लोगों की उम्मीद रंग लायी,और रथ यात्रा के प्रश्न पर वीपी सिंह की सरकार गिर गयी. पूरा अराजकता का माहौल था देश भर में. आरक्षण के प्रश्न पर दंगे हो रहे थे.छात्र आत्महत्याएं कर रहे थे.आड्वाणी की रथयात्रा ने माहौल को और भी गर्मा दिया था. ऐसी अराजक स्थिति में राजीव गान्धी सरकार बनाने के लिये तैयार नही थे. इस चुनौती को एक बार फिर स्वीकार किया ‘अजात्शत्रु’ चन्द्रशेखर ने और तुरंत ही पूरे अराजक महौल को ठंडा करने में सफलता प्राप्त की. उनकी सरकार की सफलता ने नये आयाम स्थापित किये. अराजक असम की सरकार , लिट्टे समर्थक द्रमुक की तमिल्नाडु सरकारों को बिना हिचक राष्ट्रहित में बर्खाश्त कर दिया. इजराइल से दोस्ती आगे बढाई, अमेरिकी विमानों को बिन हिचक ईन्धन देना स्वीकार किया, साथ ही फिलिस्तीनी नेता अराफात से भी सम्बन्ध रखे, और इस्राइल से भी. मनमोहन सिंह अवकाश प्राप्त करके घर बैठे थे, उन्हे सलाह्कार बनाकर आर्थिक सुधारों की नींव रखने का जिम्मा दिया, जिसे बाद में राव सरकार ने और आगे बढाया.
किंतु जब बिना किसी मुद्दे के राजीव गान्धी ने आंखे तरेरनी शुरू की तो अध्यक्ष जी से सहन नही हुआ. उन्होने काफी लचीलापन दिखाया था किंतु फिर भी बात नही बनी. आखिर 6 मार्च को उन्होने त्यागपत्र दे दिया. मॆं उस समय लोकसभा की अधिकारी दीर्घा से उनका भाव पूर्ण भाषण सुन रहा था. मेरे अनेक मित्र ऊपर पत्रकार दीर्घा में थे जिन्होने बताया कि इतना सन्नाटा संसद की किसी भी बैठक में नही देखा गया जितना उस दिन था. सब सन्न थे. मानो सांप सूंघ गया हो. मुझे याद है कि उस रात सम्झौते के बहुत प्रयास हुए जो लग्भग पूरी रात चले. किंतु चन्द्रशेखर यहां गच्चा खा गये. वे उन लोगों की बातों में आ गये जिन्हे वे अपना बहुत करीबी मानते थे . समय गवाह है कि सत्ता से अलग होते ही चन्द्रशेखर का साथ सबसे पहले छोडने वालों मे यही लोग थे , जिन्होने त्यागपत्र देने के लिये उकसाया था. अध्यक्ष जी को गुमराह करने वालों मे जो भी थे, वे बहुत दिनों तक उनके साथ नही रहे और सत्ता के बाहर होते ही साथ छोड गये. चन्द्र शेखर इतने उदार मना थे कि उन्होने साथ छोड गये लोगों का भी बुरा नही माना. हां हाजरी लगाने ये लोग फिर भी यदा कदा तीन साउथ एवेन्यू जाते रहते थे. आखिर वे एक सच्चे राजनैतिक संत थे और अपने राज नैतिक प्रतिद्वन्दियों को भी पूरा सम्मान देते थे.

रविवार को जब तीन साउथ एवेन्यू गया तो सबको वहां देखा, जिनकी राजनीति अध्यक्ष जी की छत्रछाया में विकसित,पल्लवित,पुष्पित हुई. एक पूरा विकसित सुवासित चमन वहां गुल्ज़ार हो रहा था किंतु इस चमन का असली माली ,भोंडसी का संत बहुत दूर से यह नज़ारा देख रहा था.
मेरी विनम्र श्रद्धांजलि

Saturday, July 7, 2007

बारिश के मौसम में धूप की गज़ल


पेड़ से छन कर आई धूप


हरी घास पर छाई धूप .



बादल का गर्जन सुनकर,


बारिश को ललचाई धूप.



एक पुराने गाने सी


लगती सुनी सुनाई धूप



जाड़ों में अच्छी लगती है


गरम गरम अलसाई धूप.



अपनी छवि को देख नदी में,


खुद से ही शर्माई धूप .



नदी किनारे रेत पे गिरकर ,


लेती है अंगड़ाई धूप.



खूब फुदकती टुकड़ा टुकड़ा


बादल ने सरकाई धूप.



इन्द्रधनुष के संतूरों पर


सबने खूब बजाई धूप.



नंगे पर्वत, सोती नदिया


देख देख बौराई धूप.



खेत में बिखरे दाने दीखे,


फूली नहीं समाई धूप.




बारिश के मौसम में अक्सर


पड़ती नहीं दिखाई धूप.









Friday, July 6, 2007

कठपुतली या रबर् स्टाम्प ?


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी


पूजना सब चाहते थे अपने अपने इष्ट को,
सबने आलों में सजाकर अपने ईश्वर रख लिये.

राष्ट्रपति के चुनाव में अब सभी ने अपने अपने पत्ते खोल दिये हैं और यू पी ए ,यु एन पी ए अथवा एन डी ए ,सभी का रुख सामने है.
यदि देश की राजनैतिक हवा में कोइ तूफान नही आया तो पहली बार एक महिला का राष्ट्रपति होना तय है.

आजकल टेलेविजन पर जब भी कान्ग्रेसी प्रत्याशी का जिक्र होता है, एक ही विजुअल दिखाया जाता है जिसमें प्रतिभा जी का हाथ पकड कर सोनिया जी अपने घर के अन्दर ले जा रही हैं.
कितना सिम्बोलिक है यह विजुअल?
कहने वाले कहते रहे कि पहले सात रेसकोर्स पर एक पुतला सरीखा ( हांलांकि बहुत काबिल भी !!!) व्यक्ति बिठाया और अब रैसीना पहाडी पर भी एक कठपुतली के माध्यम से कब्ज़ा कर लिया ,भले ही लोग उसे 'दागी' कहते रहें,की फर्क़ पैन्दा है ?

जहां तक कठपुतली या रबड स्टाम्प की बात है, तो मेरा स्पष्ट मानना है कि कोइ भी कितना भी योग्य, कितना भी स्वतंत्र या किसी भी अन्य योग्यता वाला व्यक्ति इस पद पर लाया जाता ( या पहले भी लया गया) ,काम तो उसने भी सम्विधान के दायरे में ही तो करना था. और सम्विधान हमारा ऐसा है कि राष्ट्रपति को 'मर्ज़ी ना मर्ज़ी बेगार करनी ही पडेगी'वाली बात है.
क्योंकि सम्विधान में जो राष्ट्रपति के अधिकार व कर्तव्य गिनाये गये है ,क्या आपने उन पर गौर फर्माया है ? यदि नही तो देखिये :

सबसे पहले धारा 74 को ही लीजिये. जब तक यह धारा सम्विधान में इसी रूप में रहेगी तब तक राष्ट्रपति एक कठपुतली मात्र ही बन कर रहेगा. उसके अपने अधिकार तो सारे इस धारा ने छीन रखे है.

धारा 72, 75,78,85,86,103,111,143 तथा 201 में राष्ट्रपति के पास जितने भी अधिकार है, सारे के सारे फैसले जो राष्ट्रपति ले सकता है, उनमें से एक भी राष्ट्रपति फैसला स्वयम का न होकर मंत्रिमंडल की "सलाह" पर ही हो सकता है.
पिछले अनेक वर्षों के उदाहरण हमारे सामने है, जहां यदि राष्ट्रपति ने मंत्रिमंडल का कोई फैसला वापस भी किया है, तो दुबारा सिफ्आरिश आने पर मज़्बूर होकर स्वीकार भी करना पडा है.

सम्विधान की इन धाराओं के चलते राष्ट्रपति तो एक प्रकार का बन्धुआ मज़्दूर जैसा ही दिखता है.
फिर क्या फर्क़ पडता है यदि प्रतिभा जीतें या भैरों सिंह जी. जो भी जीतेगा उसे सोने के पिंजरे में बन्द तोते की भूमिका ही निभानी है.

Thursday, July 5, 2007

गरीबी की रेखा: अमीरी की रेखा









इधर कुछ खबरें ऐसी आयीं हैं जो हमको ,आपको,सबको सोचने पर मज़बूर करने वाली हैं. मुझे ज्यादा फर्क़ नही पडा जब खबर आयी कि कार्लोस ने बिल गेट्स को पीछे छोडते हुये अमीरी की सूची में पहला स्थान बना लिया.परंतु में हिल सा गया जब मैने पढा कि एक दलित नेता ने अपनी सम्पत्ति की घोषणा की और कहा (या कहने का दुस्साहस किया) कि मेरे पास 52 करोड रुपये की सम्पत्ति है. मै सोचने पर फिर मज़बूर हुआ जब खबर आयी कि अज़ीम प्रेम ज़ी के पास 15 हज़ार करोड की पूंजी है, या मुकेश अम्बानी अपने महल के निर्माण पर 250 करोड रुपये खर्च करने वाले है. इन सब खबरों को यदि अलग अलग देखा जाये तो शायद विशेष फर्क़ नही पड़्ता .परंतु जब इन खबरों के साथ आप को ज्ञात हो कि भारत की 30 प्रतिशत जनता की रोज़ाना कमाई एक अमरीकी डालर ( अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गरीबी का यही पैमाना है)से भी कम है ,यानी कि लगभग 40 रुपये रोज़ से भी कम, तो फिर एक बार आप सोचने पर मज़बूर होते हैं या नही, यह दर्शाता है कि आपअपने आसपास के परिवेश से कितने जुडे है और आपकी सम्वेदनशीलता कितनी है.

एक क्षण को यदि हम मान भी लें कि आखिर इसमे हम कर ही क्या सकते है. किसी भी समाज में बराबरी तो सम्भव है ही नही ( जी हां, कम्युनिष्ट देशों में भी नही, और इसके बहुत से प्रमाण मौजूद हैं) और हर व्यक्ति अपनी अपनी किस्मत लेकर ही पैदा होता है. गरीब यदि अपनी किस्मत से ही गरीब है तो अधिक कुछ नही तो इतना तो कर ही सकते है कि कभी कभार अपनी आइसक्रीम एक दिन छोड़्कर उसकी कुछ मदद कर दी जाये.

किंतु इससे भी बडा प्रश्न है कि क्या उपभोग की भी कोई सीमा होनी चाहिये ? हाल ही में ज्ञात हुआ कि ब्राज़ील के सओ-पोलो नगर में जितने भी अरबपति हैं वे 50 -50 फुट ऊंची चहार्दीवारी बनाकर अपने मकानों के अन्दर क़ैद होकर रहने पर मज़्बूर हैं क्योंकि आसपडोस में निकल भी आये तो लुटेरे उन्हे लूट लेंगे एसा खतरा है. ऐसी बदबूदार अमीरी ( अंग्रेज़ी के स्टिंकिंग रिच का अनुवाद) वाले लोगों के लिये क्या कोई अमीरी की रेखा होनी चाहिये?

हम यह आकलन करते है कि एक व्यक्ति को कम से कम कितनी आय होनी चाहिये कि वह दो वक़्त पेट भर कर खाना खा सके. इसे हम गरीबी की रेखा मानते है. संयुक्त राष्ट्र संघ व उसकी अन्य एजेंसियां इस सीमा को एक डौलर प्रतिदिन मानती हैं . भारत में यह सीमा प्रतिदिन कार्य के लिये आवश्यक ऊर्जा ( कैलोरी में) पर आधारित की गयी है. इसी प्रकार हम आकलन कर सकते हैं कि एक व्यक्ति को एक दिन में अधिकतम कितनी ऊर्जा चाहिये तथा वह ऊर्जा महंगे से महंगे किन श्रोतों से प्राप्त हो सकती है.विलासिता के महत्तम साधन जुटाने के लिये प्रति-व्यक्ति प्रतिदिन कितने धन की आवश्यकता होगी, इसका आकलन कोई विशेष कठिन तो नही होना चाहिये.

यदि एसा किया जाये तो अमीरी की रेखा कहा निश्चित हो, इस पर सोच विचार की आवश्यकता है. मैँ इस काम पर लगा हूं और शीघ्र ही विस्तार से इस विषय पर चर्चा करूंगा. कृपया अपने मत से अवगत करायें.