Wednesday, April 14, 2010

यूरोप में भारतीयम

संस्थान के अकादमिक कार्य को पूरा करने मैं आज से यूरोप के दौरे पर निकल रहा हूं.
मुख्यत: फ्रांस के ग्रिनोबल नगर में रहूंगा किंतु कुछ भ्रमण व कुछ अन्य कार्यों से इस्तानबुल ( टर्की) , पेरिस ( फ्रांस) तथा जिनेवा व ज़्यूरिख (स्विट्ज़रलेंड) भी जाना होगा.

इन नगरों में यदि कोई हिन्दी ब्लोग जगत से सम्बन्धित हस्ती है तो कृपया अवश्य सूचित करें, मिल कर आनन्द आयेगा.
15 दिन बाद फिर 'मेरा भारत महान'की ओर वापसी होगी.

( भारतीयम की दृष्टि से ज़रा यूरोप का नज़ारा भी देखा जाये )

Saturday, March 27, 2010

निश्चित ही चयनकर्ता मुझसे अधिक जानकार हैं किंतु मेरी भी एक राय है !!

वही हुआ जिसका डर था.वेस्ट इण्डीज़ में अप्रैल में होने वाले टी-20 विश्वकप के लिये भारतीय टीम की घोषणा तो कर दी किंतु चूक फिर हो गयी.
भारत एक बार इस टूर्नामेंट का चेम्पियन रह चुका है अत: हर भारतीय क्रिकेट प्रेमी उम्मीद कर रहा था कि चयनकर्ता ऐसी टीम का चयन करेंगे जो इस बार फिर विश्व विजेता बनने की सम्भावना रखती हो.

शाम तक आते आते जब टीम की घोषणा हुई तो एक बार फिर चोंकना पड़ा. टीम के 15 खिलाडियों में चार ऐसे नाम हैं जो इस टीम को कमज़ोर बनाते हैं. जब मुझ जैसा ( क्रिकेट प्रेमी एवं )मामूली जानकार इस कमज़ोरी को देख सकता है तो फिर विशेषज्ञ चयन कर्ता क्यों नहीं?
क्या वे किसी दबाब में कार्य कर रहे हैं? या कमज़ोर खिलाडी को शामिल करने में भी कोई रणनीति है?

इस टीम में जिन खिलाडियों के नाम पर कोई दूसरी राय हो ही नहीं सकती वे हैं: धोनी, सहवाग, गम्भीर ,सुरेश
रैना, युवराज, युसुफ पठान, रविन्द्र जदेजा, हरभजन ,ज़हीर खान, प्रवीण कुमार, दिनेश कार्तिक. यहां विनय कुमार का नाम भी जोड़ा जा सकता है.

किंतु जिन नामों को मैं कमज़ोर मानता हूं और जिनकी ज़गह पर दूसरा खिलाड़ी चुन जाना चाहिये था ,वह निम्न है:--
अशिष नेहरा ( इर्फान पठान ), पीयुष चावला ( पी. ओझा या अशीष मिश्र ), रोहित शर्मा ( मनीष पांडे या शिखर धवन).

मेरी राय में इन तीनों ने हाल फिलहाल कोई बहुत अच्छा परफोर्मेंस तो नहीं ही दिया है. साथ ही उनके स्थान को भरने के लिये कई और नाम हैं किंतु आई पी एल -3 के शोरशराबों में किसी का ध्यान उधर भले ही ना गया हो.
वर्तमान परिस्थियों में सब कुछ देखते हुए उक्त तीन स्थानों पर इरफान पठान, अशीष मिश्र,और मनीष पांडे के नाम जुडना चागिये था.

बाकी.. सब ऊपर वाले की मर्ज़ी पर चलता है ...

Monday, March 8, 2010

मैं हर तरह के आरक्षण के खिलाफ हूं. महिला आरक्षण विधेयक से महिलाओं का भला नहीं होगा. बुरा लगे तो दो रोटी ज्यादा खा लेना....

जो महिला विधेयक को एक क्रांतिकारी कदम बता रहे हैं मैं उनसे पूछना चाहता हूं कौन सी क्रांति की आशा है उन्हे इस प्रतिगामी विधेयक से?

संसद में या विधानसभाओं में चन्द महिलायें ज्यादा हो जायेंगी तो कौन सा फर्क़ पडने वाला है. पंचायत, नगर निगम व नगर पालिकाओं में महिला आरक्षण के नतीजे यही बताते हैं कि राजनीतिक परिवारों के पुरुष उनकी कन्धे पर बन्दूक रख कर राजनीति करते हैं .

मैं स्पष्ट कर दूं कि मैं महिलाओं को अधिक अवसर दिये जाने का पक्षधर ज़रूर हूं परंतु किसी भी तरह के आरक्षण के खिलाफ हूं.आरक्षण कोई रामबाण नहीं है.

अनुसूचित जाति, जनजाति ,अन्य पिछडे वर्गों को आगे लाने के लिये बहुत कुछ किया जा सकता है सिर्फ आरक्षण की वैसाखी देकर उन्हें विकलांग बना दिया गया है और यही गति देश की महिलाओं की करने की साजिश है.

यदि आज के राजनैतिक दल सही मायनों में अनुसूचित जाति, जनजाति ,अन्य पिछडे वर्गों व महिलाओं का भला चाहते हैं उन्हे प्रगति के शिखर पर ले जाना चाहते हैं तो शिक्षा ही एकमात्र उपाय है.

मुफ्त शिक्षा, समान शिक्षा व अनिवार्य शिक्षा यही हमारा मंत्र होना चाहिये.

आरक्षण रूपी झुनझुने थमाने से न किसी का भला हुआ है और न ही होगा. पाखंड और ढकोसले की राजनीति वोट भले ही दिला दे, देश को पीछे ही धकेलेगी.

10 वर्षों के लिये दिया गया अनुसूचित जाति व जनजाति हेतु आरक्षण अभी तक लागू है. आज तक यह अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो पाया. इससे सिर्फ समाज में वैमनस्य व कटुता ही बढी है. यही हाल मण्डल आयोग के चलते हुआ. अन्य पिछडे वर्गों को भी बस सुनहरे ख्वाब दिखाये गये. कहीं कुछ नहीं बदला. क्रीमी लेयर ही सब फसल चर् गयी.

महिला आरक्षण को लेकर जश्न मनाने वालों को भी मैं यही कहना चाहता हूं. जिस महिला के उत्थान की आप बात करते हो, उसे तो यही नहीं पता कि संसद है क्या?

50 वर्ष हो गये ,हम दो पीढियों को साक्षर नहीं कर पाये.

आरक्षण हर मर्ज़ की दवा नहीं है.

हमें सोच बदलनी होगी.
हो सकता है कि कल आरक्षण समर्थक सफल भी हो जायें और मेरा मज़ाक उडायें.

कडवी ज़रूर लगेगी मेरी बात.पर सच हमेशा कडवा ही होता है.
बुरा लगे तो ... दो रोटी ज्यादा खा लेना .. ( और मुझसे पर गरिया लेना.)

संसद में राजनैतिक पाखंड की ऐतिहासिक मिसाल है महिला आरक्षण विधेयक

आज राज्य सभा में में संसद की गरिमा अक्षुण्ण रह गयी. हालांकि आने वाले दिनों में यह गरिमा तार तार होगी, यह तय है. महिला आरक्षण विधेयक भारतीय राजनीति में राजनैतिक तंत्र द्वारा देश पर थोपा जाने वाला सबसे बडा पाखंड है . इस पाखंड का भंडाफोड- संसद में होने से संसद की गरिमा नहीं बची रह सकती.

देश के अधिकांश राजनैतिक दल ,जो इस विधेयक का समर्थन कर रहे हैं, पहले दर्जे के पाखंडी और फरेबी सिद्ध हुए हैं.14 वर्षों से ढिंढोरा पीट पीट कर विधेयक पास न होने पर पूरे तंत्र को दोषी बताते आये हैं. क़िंतु महिला आरक्षण के मुद्दे पर एक भी दल ऐसा न निकला जो अपनी कथनी और करनी को एक रूप दिखा पाता.

कितने चुनाव आये और गये. लोक सभा के चुनाव भी हुए और विधान सभाओं के भी. आज महिला आरक्षण के नाम का नारा लगाने वाले एक भी दल ने 10 प्रतिशत से ज्यादा महिला प्रत्याशी नहीं उतारे. यह तथ्य इन सारे दलों के पाखंड को बेनक़ाब करता है.

यदि ये दल वास्तव में महिला वर्ग के हितैषी होते तो इन्हे किसी विधेयक अथवा कानून की आवश्यकता नहीं थी. 33 प्रतिशत ही क्यों 50 या इससे भी ज्यादा चुनाव क्षेत्रों में यह दल महिला प्रत्याशी को उतार सकते थे. इन्हे कौन रोकने वाला था?

अब यह फिर देश के समक्ष रोना रोयेंगे. सियापा करेंगे. दोषारोपण करेंगे.

इनकी नीयत साफ नहीं है.

दोगले हैं ये .

पाखंडी .

Monday, March 1, 2010

होली है भई होली है. खेलने वाली नहीं , गाने वाली

शाम हुई और मन हुरियारा हो गया.
फागुन की हवा में ही कुछ ऐसी मस्ती होती है
कि मन करता है कुछ रंगीन्,
कुछ चुलबुली शरारत ,
कुछ छेडछाड़ की जाये

किसी की चुनरी भिगोई जाये
किसी को चिकोटी काटी जाये.
किसी से चुहल की जाये.
और कुछ नहीं
तो बस मस्ती में अकेले ही झूम लिया जाये
.......
.....

और बस यूं ही कुछ पुरानी होली याद आयी ....ऐसे ...


कमल फूल जल में बाढे, और चन्दाआआआ हो उगे आकाश,
मेरो मना पिउ में लागो
और पिउ को हहो मोमें हतु नांय
पिउ बिन होरी को खेलै ?
हो पिउ बिन होरी को खेलै ?

कोजा बसे गढ आगरें, और कोजा औरंगाबाद
कोजा बसे गढ सांकरे और कोजा चन्दन चौपार
मेरो मना पिउ में लागो
और पिउ को हो मोमें हतु नांय
पिउ बिन होरी को खेलै ?
हो पिउ बिन होरी को खेलै ?


देवरा बसे गढ आगरें, और जेठा औरंगाबाद
ससुर बसे गढ सांकरे और बलमा चन्दन चौपार
मेरो मना पिउ में लागो
और पिउ को हो मोमें हतु नांय
पिउ बिन होरी को खेलै ?
हो पिउ बिन होरी को खेलै ?



साभार : ब्रज गोकुलम्

Thursday, February 25, 2010

घर हो या ससुराल ,मज़े लो होली में

नाचो दे दे ताल, मजे लो होली में,
गालों मलो गुलाल, मजे लो होली में.

रंग बिरंगे चेहरों में ढून्ढो धन्नो,
घर हो या ससुराल , मजे लो होली में.

हुश्न एक के चार नज़र आयें देखो,
एनक करे कमाल , मजे लो होली में


चढे भंग की गोली ,डगमग पैर चलें,
बहकी बहकी चाल, मजे लो होली में.

ऐश्वर्या जब तुम्हे पुकारे ‘अंकल जी’,
छूकर देखो गाल, मजे लो होली में


छेडछाड में पिट सकते हो ,भैया जी,
गैंडे जैसी खाल, मजे लो होली में.



बीबी बोले मेरे संग खेलो होली,
बैठो सड्डे नाल , मजे लो होली

Sunday, February 14, 2010

ये लो भैया,अब 'भारतीयम' भी..... माजरा क्या है ?

पहले पहल तो चौंका. ब्लोगवाणी पर टिप्पणियों की सूची पर नज़र पडी तो देखा किसी ने 'भारतीयम' ब्लोग पर टिप्पणी की है. चौंकना स्वाभाविक था. क्योंकि टिप्पणी का विषय मेरे ब्लोग की किसी हालिया पोस्ट से बिलकुल ही भिन्न था.
फोरन भारतीयम पर जा कर देखा तो पता चला कि किसी शंकर नामक ब्लोग्गर ने इसी नाम से एक और ब्लोग चालू कर दिया है. मैं तो 2007 से भारतीयम नाम से ब्लोग्गिंग कर रहा हूं. फिर अब एक और भारतीयम....?


मैं नहीं जानता कि जिन भाई ने ये भारतीयम नाम से दूसरा ब्लोग प्रारम्भ किया है ,उन्हे मेरे भारतीयम की जानकारी थी या नहीं. परंतु उनका ब्लोग 2008 से है और इसमे अभी तक 10 पोस्ट हुईं हैं . मैने तो आज ही पहली बार देखा.

कुछ दिनों पहले बी एस पाबला जी के चिट्ठा चर्चा सम्बन्धी डोमैन नाम को लेकर सारथी जी की टिप्पणी पढ़ी थी जिसमें उन्होने इसे एक साधारण सी घटना ही बताई थी. अब पशोपेश में हूं .


मैं तो शंकर जी से अनुरोध करूंगा कि यदि इसे अन्यथा न लें तो कुछ और नाम अपना लें .

यदि वह स्वीकारते हैं तो ठीक ,नहीं स्वीकारते तो भी ठीक.

और फिर कर भी क्या सकता हूं मैं ?
सिर्फ कुछ भ्रम ही तो फैलेगा...चलने दो बाल किशन ...

Sunday, January 31, 2010

एक अहसास का नाम है मां

भाई समीरलाल (उड़न तश्तरी)ने मां को याद किया तो प्रतिक्रिया स्वरूप मुझे मेरी वह " मां" शीर्षक रचना याद आ गयी ,जो वर्षों पहले मेरे संग्रह " चीखता है मन " में प्रकाशित हुई थी. भाई समीरलाल जी को समर्पित रचना पेश है:

अपने आगोशोँ मे लेकर मीठी नीँद सुलाती माँ
गर्मी हो तो ठंडक देती, जाडोँ मेँ गर्माती माँ

हम जागेँ तो हमेँ देखकर अपनी नीँद भूल जाती
घंटोँ,पहरोँ जाग जाग कर लोरी हमेँ सुनाती माँ

अपने सुख दुख मेँ चुप रहती शिकन न माथे पर लाती
अपना आंचल गीला करके ,हमको रहे हंसाती माँ

क्या दुनिया, भगवान कौन है, शब्द और अक्षर है क्या
अपना ज्ञान हमेँ दे देती ,बोली हमे सिखाती माँ

पहले चलना घुट्ने घुट्ने और खड़े हो जाना फिर
बच्चे जब ऊंचाई छूते बच्चोँ पर इठलाती माँ

उसका तो सर्वस्व निछावर है,सब अपने बच्चों पर,
खुद रूखा सूखा खा लेती है, भर पेट खिलाती मां.


जब होती है दूर हृदय से प्यार बरसता रहता है
उसकी याद बहुत आती है, आंखे नम कर जाती मां

–अरविन्द चतुर्वेदी

Saturday, January 30, 2010

एक जनप्रिय राजनेता के ब्लोग से मेरी टिप्पणी क्यों हुई गायब ?

आज दूसरी बार जब मैं उस ब्लोग पर गया तो हैरान रह गया.
कल ही एक जनप्रिय राजनेता के ब्लोग पर पहली बार जाकर एक "अत्यंत शालीन" टिप्पणी कर के आया था. इस टिप्पणी में न कोई राजनीति की बात थी न कोई दोषारोपण. ना कोई आलोचना ना किसी की निन्दा. न किसी का पक्ष ना ही किसी का विरोध.

परंतु फिर भी वह टिप्पणी जो उनकी पोस्ट पर पहली टिप्पणी थी , गायब हो गयी.

न केवल टिप्पणी गायब हुई बल्कि ब्लोग की वह पोस्ट भी एडिट ( Edit) हो गयी.

नही समझ आ रहा.

है कोई जो इस पर कुछ प्रकाश डाल सके ?

Wednesday, January 27, 2010

तुलसी इस संसार में भांति भांति के ब्लॉग

पिछले दो दिन से अस्पताल के बिस्तर पर पड़ा पड़ा ब्लोगवाणी व चिट्ठाजगत पर ढूंढ ढूंढ कर ब्लोग पढ़ रहा हूं.15 -20 कमेंट भी मार चुका हूं ( इतनी टिप्पणियां तो महीने भर में भी नहीं हो पाती) इतने दिनों से समय भी नहीं मिल पा रहा था. डाक्टर ने कहा था आज अस्पताल से छुट्टी मिल जायेगी परंतु फिर निर्णय बदल दिया. एक तरह् से अच्छा हुआ. कल घर से लेपटोप मंगवा कर एक दिन के वाई फाई कनेक्शन के लिये दिये 200 रुपये वसूलने थे और सेहत पूरा साथ दे रही थी ,ऊपर से डाक्टर से अनुमति भी मिल गयी थी.

जो ब्लोग कभी पढे नहीं थे ,उन पर भी तांक झांक कर आया . अपनी पसन्द के उन ब्लोगों की पुरानी पुरानी पोस्ट का भी ढूंढ ढूंढ कर जायज़ा लिया. यहां वहां टिप्पणी मार कर खुद को खुश कर लिया. बीच बीच में ब्लोगवाणी व चिट्ठाजगत का चक्कर भी लगा आया .

हिन्दी ब्लोगिंग का एक नया रूप देखने को मिला. कुछ नये ब्लोग्गर अच्छा लिख रहे हैं. हां, वाद् विवाद् भी साथ साथ बढते जा रहे हैं.

विविधता बहुत बढ गयी है जो एक अच्छा लक्षण है.

हैप्पी ब्लोग्गिंग.