



विज्ञापनोँ मेँ नारी देह के शोषण की बात लगता है अब पुरानी हो गयी है. यौन सुख को फंतासी मेँ पिरोकर पाठकोँ /दर्शकोँ को परोसना विज्ञापन दाताओँ का नया शगल है. अपनी बात को स्पष्ट करने के लिये आपको 'अमूल- मैचो' अंडरवियर के उस विज्ञापन श्रंखला का जिक्र करना चाहूंगा, जिसे अश्लील मानकर ए एस सी आई ( एड्वरटाइजिंग स्टैंडर्ड्स काउंसिल औफ इंडिया- इसे आप भारत मेँ विज्ञापन-पुलिस या सेंसर भी मान सकते हैँ.)के पास शिकायत भेजी गयी थी. ठीक अभी दो दिन पूर्व ही ए एस सी आई ने उस शिकायत को अमान्य करते हुए इस विज्ञापन को 'श्लील' होने का प्रमाणपत्र दे दिया.
पहल्रे वह विज्ञापन: लगभग छह माह पूर्व अमूल अंडरवियर ब्रांड के निर्माताओँ ( इससे अमूल डेरी /दुग्ध उत्पादक का कोई दूर दूर का भी सम्बन्ध नही है) एक विज्ञापन एजेसी ( सैंट्स एंड वारियर्स- हिन्दी मेँ नाम हुआ-साधू एवम योद्धा) से टीवी विज्ञापन फिल्म बनाने हेतु करार किया.इस एजेंसी के पुष्पिन्दर् सिंह -पुष्पी( फोटॉ देखें) ने विज्ञापन बनाया .इस विज्ञापन फिल्म के निदेशक का नाम है बड्डी, और नायिका है साना खान .इसे ब्लेक मैजिक फिल्म्स ने बनाया है, जिसे अरविन्द नामक् कैमरामेन ने फिल्माया है. इस विज्ञापन मेँ एक नव विवाहित महिला कपड़े धोने तालाब पर जाती है.पुरुष (शायद अपने पति) का गन्दा अंडरवियर गठरी से निकाल कर धोती है. जिस हाव भाव को दर्शाया गया है,उससे लगता है वह कल्पना लोक मेँ खो गयी है तथा अंडरवियर धोने से उसे 'अज्ञात'सुख प्राप्त हो रहा है.तालाब किनारे खडी अन्य महिलायें भी 'बड़ी हसरत' से यह देखती हैं. फ़िर हमारे विज्ञापन की नायिका एक सोटी से अंडरवियर पीटने वाली होती है,तब अन्य महिलायें मुंह बिचकाती नजर आती हैँ कि हाय राम 'इसे' मत पीटो प्लीज़.आवाज़ आती है 'अमूल मैचो- क्रफ्टेड फार फेंटासीज'. विज्ञापन मेँ पृष्ठ भूमि मेँ आवाज़ आती है:' ये तो बड़ा टॉयिंग है,ये तो बड़ा टॉयिंग है,ये तो बड़ा टॉयिंग है.......'
विज्ञापन तमाम चैनलोँ पर प्राइम टाइम पर दिखाया जा रहा है. देखने वालोँ ने इसे पसन्द नही किया. आपात्तियां आने लगी कि यह घर मेँ बठकर सबके साथ नही देखा जा सकता .इसे अश्लील कहा गया. लोगोँ ने फूहड,गन्दा, विकृत आदि आदि कहा.
फिर मई माह मेँ ए एस सी आई को शिकायत की गई .ए एस सी आई द्वारा सम्बधित व्यक्तिओँ को नोटिस जारी हुए, सुनवाई हुई और अब फैसला आ गया कि विज्ञापन इतना खराब नही हैकि इस पर रोक लगाने जैसा कठोर /भयानक फैसला लिया जाये. यानि कि अब हरी झंडी मिल ही गयी.
इस बीच सी एन एन चैनल ने एक सर्वेक्षण किया जिसमेँ (कहते हैँ) 5000 लोगोँ ने भाग लिया. 49% ने इसे अश्लील नही माना जब कि 51% ने अश्लील माना.
विज्ञापन एजेंसी व अमूल अंडर्वीयर के निर्माता खुश है और कहते है कि इस विज्ञापन से हमारी बिक्री 35 % बढ़् गयी है.ए एस सी आई की हरी झंडी मिलने के बाद अब इसे सिनेमाघरोँ मेँ भी दिखाया जायेगा और इसके लिये इसे सेंसर बोर्ड का प्रमाणपत्र भी मिल गया है. मजे की बात है कि कोलकाता एड्वर्टाइजिंग क्लब ने इस विज्ञापन को एक पुरस्कार भी दिया है.
पश्न है कि क्या टीवी विज्ञापनोँ के लिये अलग से एक सेंसर बोर्ड होना चाहिये?क्या यही हल है?क्या ए एस सी आई जैसी एजेंसियों मे बैठे लोगोँ ने अपने घरोँ मेँ अपनी बहू-बेटियोँ के साथ यह विज्ञापन देखा है?
क्या विज्ञापनोँ के लिये कोई मानक / कोई आचार सन्हिता होनी चाहिये? इन प्रश्नोँ के साथ अन्य जुड़े हुए प्रश्नोँ
और विज्ञापनोँ पर् चर्चा फिर कभी.
वैसे मेँ मित्रों की जानकारी के लिये बता दूं कि अस्सी व नब्बे के दशक मेँ मैं स्वयम विज्ञापन जगत से अनेक वर्षोँ तक जुडा रहा था.
अरविन्द चतुर्वेदी