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Wednesday, August 15, 2007

तुम हो पहरेदार चमन के




राजनीति और साहित्य दो अलग अलग धारायें है. बहुत कम लोग ही मुझे मिले हैं जिनका दोनों से ही सम्बन्ध है. प्रो. उदय प्रताप सिंह एक ऐसी ही शख्सियत हैं समाज्वादी पार्टी के सांसद है. लोकसभा व राज्यसभा दोनो में रहे हैं. पिछले 18-19 वर्षों से सक्रिय राजनीति में हैं.
प्रो. उदय प्रताप सिंह का कविता से पुराना सम्बन्ध है. अध्यापक रहे हैं.पिछले 40-50 वर्षों से लगातार लिखते आ रहे हैं.मेरी प्रोफेसर उदय प्रताप जी से जान-पहचान लग्भग 17 वर्षों से है. फिलहाल मैं राजनीति में सक्रिय नहीं हूं फिर भी साहित्यिक,सांसकृतिक कार्यक्रमों में मुलाक़ात हो ही जाती है.
पिछले 11 अगस्त को मेरी संस्था " अक्ष" की ओर से एक साहित्यिक आयोजन था,जिसमें पुस्तक के लोकार्पण के अतिरिक्त लघु कवि सम्मेलन भी था. उदय प्रताप् जी आमंत्रित थे.उन्होने देशभक्ति से ओत-प्रोत एक रचना पढी जिसमे उन्होने चन्द्र शेखर आज़ाद की जनम्स्थली बदरका को प्रणाम कहा.मेरे विशेष अनुरोध पर उन्होने एक रचना पढी, जिसका सम्बन्ध लोकतंत्र की पहरेदारी से है. लोकतंत्र में जनता का एक सजग् प्रहरी के रूप में जो दायित्व है,उसी को रेखांकित करती है ये कविता.
उदय प्रताप सिंह जी की अनुमति लेकर यहां यह कविता संक्षिप्त रूप में प्रस्तुत है:


ऐसे नहीं जागकर बैठो तुम हो पहरेदार चमन के ,
चिंता क्या है सोने दो यदि सोते हैं सरदार चमन के.
वैसे भी ये बड़े लोग हैं, अक्सर धूप चढ़े जगते हैं
व्यवहारों से कहीं अधिक तस्वीरों में अच्छे लगते हैं
इनका है इतिहास गवाही जैसे सोये वैसे जागे
इनके स्वार्थ सचिव चलते हैं नई सुबह के रथ के आगे
माना कल तक तुम सोये थे लेकिन ये तो जाग रहे थे
फिर भी कहां चले जाते थे ,जाने सब उपहार चमन के
ऐसे नहीं जागकर बैठो.......


जिनको आदत है सोने की उपवन की अनुकूल हवा में
उनका अस्थिशेष भी उड जाता है बनकर धूल हवा में
लेकिन जो संघर्षों का सुख सिरहाने रखकर सोते हैं
युग के अंगडाई लेने पर वे ही पैगम्बर होते हैं
जो अपने को बीज बनाकर मिट्टी में मिलना सीखे हैं
सदियों तक उनके सांचे में धलते हैं व्यवहार चमन के
ऐसे नहीं जागकर बैठो......


यह आवश्यक नहीं कि कल भी होगी ऐसी बात चमन में
ऐन बहारों में ठहरी है कांटों की बारात चमन में
कल की आने वाली कलियां पिछले खाते जमा करेंगी
तब इन कागज़ के फूलों की गलती कैसे क्षमा करेंगी
उस पर मेरी क़लम गवाही बिना सत्य के कुछ ना कहेगी
केवल बातों के सिक्के से चलते थे व्यापार चमन के
ऐसे नहीं जागकर बैठो...

( समारोह की पूरी रपट लग से एक पोस्ट में दी जायेगी)

चित्र 1 :मंच पर श्री उदय प्रताप सिंह कवि अरविन्द पथिक को प्रशस्ति पत्र भेंट करते हुए
चित्र 2:अरविन्द चतुर्वेदी का कविता पाठ्
चित्र 3 : मंच पर श्री उदय प्रताप सिंह,प.सुरेश नीरव,उ.प्र.सरकार के मंत्री यश्वंत सिंह,दिल्ली सरकार के मंत्री डा. ए.के.वालिया

Sunday, July 29, 2007

मैं नही पीता


मैं नहीं पीता

किंतु

मेरे दोस्त बताते हैं कि

शराब गम गलत करती है.

भला

गम भी कोई गलत करने की चीज़ है ?


सोचता हू मैं.


और

सोचते ही सोचते ,

इकट्ठा कर लेता हूं,

गम का सामान.


कुछ यादें,

कुछ अनुभवों की कडुवाहट,

कुछ टूटे सम्बन्धों का कसैलापन,

कुछ नये रिश्तों के सभावित मसौदे,


कुछ सहज स्वीकृत धोखे,

कुछ पूर्व मित्रों के जताये एहसानात,

कुछ गुनगुने विश्वासघात.


ज़ाडों की कुछ ठंडी रातें, चन्द रेगिस्तानी दिन

कुछ लिजलिजे आदर्श.



तह करके,

सजाके रख लेता हू अपने पास,

ऐसे,

जैसे रखता है कोई पिता,

अपने दूर परदेश गई ब्याहता बिटिया के

बचपन के खिलोने.

वाह!

गम भी कोई गलत करने की चीज़ है ?

Sunday, June 10, 2007

मन्या की 'पागल औरत' का विस्तार ?

अभी अभी मन्या के चिट्ठे पर 'पागल औरत ' पढी. अच्छी लगी. साथ ही लगा कि इसके विस्तार के तौर पर अपनी एक पुरानी कविता जोड दूं तो ठीक रहेगा. मेरे प्रथम संग्रह 'नक़ाबों के शहर मेँ' से एक कविता 'संस्कार व सभ्यता' प्रस्तुत है.

सड़क के किनारे
सांसी -ठठेरों की एक बस्ती
बस्ती भी क्या
खानाबदोशों के आठ घर भर
बस.
गन्दे से पिल्लों के साथ कुश्ती करते बच्चे
कूड़े के ढ़ेर के पास दरी बिछाये मुखिया.
अध खुले स्तनों से चिपके हुए नवजात
और वहीं आस पास
चार बोतलें,कुछ गिलास लेकर बेठे
कमेरे
सांसी ठठेरे.

देखकर सांसी -ठठेरों की बस्ती
संस्कारवान मैं,
सभ्य, शिक्षित ,सुसंस्कृत समाज का हिस्सा मैं
बुद्धिजीवी मैं,
पचा नही पाया दृश्य को
जी मेँ कुछ उपजा
और थूक दिया मैने बड़ा सा
घृणा का एक हिस्सा
और बढ़ गया
नव-धनाड्यों की उस बस्ती की ओर
जहां लेब्राडोर,अल्शेसिअन ,पामनेरिअन नस्लों को
गोद मेँ उठाये ठीक ललनायें,नव्यौवनायें
गार्डेन चेयर पर
लौन मेँ पावं पसारे बैठे थे मुखिया
लिये मुहं मेँ सिगार
नव्जात को बौटल -फीड देती एक गवर्नेस,
और पास ही
कनोपी के नीचे
बार स्टेंड पर बीयर की चुस्कियां लेते
नव धनाड्य कमेरे.
संस्कारवान मैं,
सभ्य, शिक्षित ,सुसंस्कृत समाज का हिस्सा मैं
बुद्धिजीवी मैं,
पचाने की कोशिश करने लगा दृश्य को ,
जी मेँ उपजा नही कुछ भी
और थूक ही नही पाया
घृणा का कोई हिस्सा.

-अरविन्द चतुर्वेदी

अभिमन्यु की भटकन

कभी कभी बन्द् किवाडों को खोलकर्
जी चाहता है
बाहर् घूमूं
और् समय् की नब्झ् पर् हाथ् रखकर्
टटोलूं
और् देखूं
कैसे करता है मौसम्
समय् के बुखार् की तीमारदारी .

बस्ता उठाये ,बतियाते जाते
दो बच्चे
देखते ही
ओस बन जाने जैसा महसूस करता हूं,
जैसे गुजर् गया होऊं
किसी फूलों की क्यारी के बीच्.

सड़क पर आते ही घबरा सा जाता हूँ
वाहनोँ की चिल्ल पोँ
बेतहाशा रफ्तार से भागती दुनिया,
किसी तूफान की आशंका से भर जाती है मुझे
बस के अन्दर
किसी कन्या के गदराये उरोजोँ को छूने की
एक अधेड़ पुरुष की कोशिश
किसी कीचड़,किसी दलदल मेँ फेंक जाती है मुझे.
एक असफल अभिमन्यु बनकर
फंसा रहूँ दलदल मेँ
या
घर लौट कर कर लूँ फिर
बन्द
अपने किवाड़ोँ को?
- अरविन्द चतुर्वेदी