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Tuesday, September 25, 2007

तुम हो पहरेदार चमन के -उदय प्रताप सिंह्







राजनीति और साहित्य दो अलग अलग धारायें है. बहुत कम लोग ही मुझे मिले हैं जिनका दोनों से ही सम्बन्ध है. प्रो. उदय प्रताप सिंह एक ऐसी ही शख्सियत हैं समाज्वादी पार्टी के सांसद है. लोकसभा व राज्यसभा दोनो में रहे हैं. पिछले 18-19 वर्षों से सक्रिय राजनीति में हैं.
प्रो. उदय प्रताप सिंह का कविता से पुराना सम्बन्ध है. अध्यापक रहे हैं.पिछले 40-50 वर्षों से लगातार लिखते आ रहे हैं.मेरी प्रोफेसर उदय प्रताप जी से जान-पहचान लग्भग 17 वर्षों से है. फिलहाल मैं राजनीति में सक्रिय नहीं हूं फिर भी साहित्यिक,सांसकृतिक कार्यक्रमों में मुलाक़ात हो ही जाती है.
पिछले 11 अगस्त को मेरी संस्था " अक्ष" की ओर से एक साहित्यिक आयोजन था,जिसमें पुस्तक के लोकार्पण के अतिरिक्त लघु कवि सम्मेलन भी था. उदय प्रताप् जी आमंत्रित थे.उन्होने देशभक्ति से ओत-प्रोत एक रचना पढी जिसमे उन्होने चन्द्र शेखर आज़ाद की जनम्स्थली बदरका को प्रणाम कहा.मेरे विशेष अनुरोध पर उन्होने एक रचना पढी, जिसका सम्बन्ध लोकतंत्र की पहरेदारी से है. लोकतंत्र में जनता का एक सजग् प्रहरी के रूप में जो दायित्व है,उसी को रेखांकित करती है ये कविता.
उदय प्रताप सिंह जी की अनुमति लेकर यहां यह कविता संक्षिप्त रूप में प्रस्तुत है:


ऐसे नहीं जागकर बैठो तुम हो पहरेदार चमन के ,
चिंता क्या है सोने दो यदि सोते हैं सरदार चमन के.
वैसे भी ये बड़े लोग हैं, अक्सर धूप चढ़े जगते हैं
व्यवहारों से कहीं अधिक तस्वीरों में अच्छे लगते हैं
इनका है इतिहास गवाही जैसे सोये वैसे जागे
इनके स्वार्थ सचिव चलते हैं नई सुबह के रथ के आगे
माना कल तक तुम सोये थे लेकिन ये तो जाग रहे थे
फिर भी कहां चले जाते थे ,जाने सब उपहार चमन के
ऐसे नहीं जागकर बैठो.......


जिनको आदत है सोने की उपवन की अनुकूल हवा में
उनका अस्थिशेष भी उड जाता है बनकर धूल हवा में
लेकिन जो संघर्षों का सुख सिरहाने रखकर सोते हैं
युग के अंगडाई लेने पर वे ही पैगम्बर होते हैं
जो अपने को बीज बनाकर मिट्टी में मिलना सीखे हैं
सदियों तक उनके सांचे में ढ्लते हैं व्यवहार चमन के
ऐसे नहीं जागकर बैठो......


यह आवश्यक नहीं कि कल भी होगी ऐसी बात चमन में
ऐन बहारों में ठहरी है कांटों की बारात चमन में
कल की आने वाली कलियां पिछले खाते जमा करेंगी
तब इन कागज़ के फूलों की गलती कैसे क्षमा करेंगी
उस पर मेरी क़लम गवाही बिना सत्य के कुछ ना कहेगी
केवल बातों के सिक्के से चलते थे व्यापार चमन के
ऐसे नहीं जागकर बैठो...

( समारोह की पूरी रपट अलग से एक पोस्ट में दी जायेगी)

चित्र 1 : सर्व श्री पंडित सुरेश नीरव( मुख्य कौपी सम्पादक,कादम्बिनि पत्रिका ),भरत चतुर्वेदी, उदय प्रताप सिंह , अरविन्द चतुर्वेदी
चित्र 2:उदय प्रताप जी द्वारा डा. वालिया ( वित्त मंत्री, दिल्ली सरकार) का स्वागत ,साथ हैं उ.प्र.सरकार के मंत्री यश्वंत सिंह
चित्र 3 : मंच पर श्री उदय प्रताप सिंहका स्वागत केशव गान्धी द्वारा
चित्र 4: मंच पर पंडित सुरेश नीरव( मुख्य कौपी सम्पादक,कादम्बिनि पत्रिका ),भरत चतुर्वेदी, उदय प्रताप सिंह , अरविन्द चतुर्वेदी

Wednesday, August 15, 2007

तुम हो पहरेदार चमन के




राजनीति और साहित्य दो अलग अलग धारायें है. बहुत कम लोग ही मुझे मिले हैं जिनका दोनों से ही सम्बन्ध है. प्रो. उदय प्रताप सिंह एक ऐसी ही शख्सियत हैं समाज्वादी पार्टी के सांसद है. लोकसभा व राज्यसभा दोनो में रहे हैं. पिछले 18-19 वर्षों से सक्रिय राजनीति में हैं.
प्रो. उदय प्रताप सिंह का कविता से पुराना सम्बन्ध है. अध्यापक रहे हैं.पिछले 40-50 वर्षों से लगातार लिखते आ रहे हैं.मेरी प्रोफेसर उदय प्रताप जी से जान-पहचान लग्भग 17 वर्षों से है. फिलहाल मैं राजनीति में सक्रिय नहीं हूं फिर भी साहित्यिक,सांसकृतिक कार्यक्रमों में मुलाक़ात हो ही जाती है.
पिछले 11 अगस्त को मेरी संस्था " अक्ष" की ओर से एक साहित्यिक आयोजन था,जिसमें पुस्तक के लोकार्पण के अतिरिक्त लघु कवि सम्मेलन भी था. उदय प्रताप् जी आमंत्रित थे.उन्होने देशभक्ति से ओत-प्रोत एक रचना पढी जिसमे उन्होने चन्द्र शेखर आज़ाद की जनम्स्थली बदरका को प्रणाम कहा.मेरे विशेष अनुरोध पर उन्होने एक रचना पढी, जिसका सम्बन्ध लोकतंत्र की पहरेदारी से है. लोकतंत्र में जनता का एक सजग् प्रहरी के रूप में जो दायित्व है,उसी को रेखांकित करती है ये कविता.
उदय प्रताप सिंह जी की अनुमति लेकर यहां यह कविता संक्षिप्त रूप में प्रस्तुत है:


ऐसे नहीं जागकर बैठो तुम हो पहरेदार चमन के ,
चिंता क्या है सोने दो यदि सोते हैं सरदार चमन के.
वैसे भी ये बड़े लोग हैं, अक्सर धूप चढ़े जगते हैं
व्यवहारों से कहीं अधिक तस्वीरों में अच्छे लगते हैं
इनका है इतिहास गवाही जैसे सोये वैसे जागे
इनके स्वार्थ सचिव चलते हैं नई सुबह के रथ के आगे
माना कल तक तुम सोये थे लेकिन ये तो जाग रहे थे
फिर भी कहां चले जाते थे ,जाने सब उपहार चमन के
ऐसे नहीं जागकर बैठो.......


जिनको आदत है सोने की उपवन की अनुकूल हवा में
उनका अस्थिशेष भी उड जाता है बनकर धूल हवा में
लेकिन जो संघर्षों का सुख सिरहाने रखकर सोते हैं
युग के अंगडाई लेने पर वे ही पैगम्बर होते हैं
जो अपने को बीज बनाकर मिट्टी में मिलना सीखे हैं
सदियों तक उनके सांचे में धलते हैं व्यवहार चमन के
ऐसे नहीं जागकर बैठो......


यह आवश्यक नहीं कि कल भी होगी ऐसी बात चमन में
ऐन बहारों में ठहरी है कांटों की बारात चमन में
कल की आने वाली कलियां पिछले खाते जमा करेंगी
तब इन कागज़ के फूलों की गलती कैसे क्षमा करेंगी
उस पर मेरी क़लम गवाही बिना सत्य के कुछ ना कहेगी
केवल बातों के सिक्के से चलते थे व्यापार चमन के
ऐसे नहीं जागकर बैठो...

( समारोह की पूरी रपट लग से एक पोस्ट में दी जायेगी)

चित्र 1 :मंच पर श्री उदय प्रताप सिंह कवि अरविन्द पथिक को प्रशस्ति पत्र भेंट करते हुए
चित्र 2:अरविन्द चतुर्वेदी का कविता पाठ्
चित्र 3 : मंच पर श्री उदय प्रताप सिंह,प.सुरेश नीरव,उ.प्र.सरकार के मंत्री यश्वंत सिंह,दिल्ली सरकार के मंत्री डा. ए.के.वालिया