


कुछ लोग अपने कार्यालय में काम करने ही जाते है. कुछ लोग मात्र टाइमपास के लिये. कुछ कार्यालय को जनसम्पर्क करने हेतु एक बेहतर विकल्प के रूप में लेते हैं.कुछ लोग सब कुछ चाहते हैं मगर थोडा थोड़ा.
परंतु सचाई यह है कि , यदि अवसर प्राप्त हो तो, अधिकांश व्यक्ति ( दोनो पुरुष कर्मचारी व महिला कर्मचारी ) कुछ देर के लिये ही सही, काम के बीच में कुछ पल आनंद ,शांति के लिये निकालने से गुरेज़ नही करेंगे . .
मेरे एक मित्र है डा. करन भाटिया, रुड़की में हाइड्रोलोजी संस्थान में वैज्ञानिक हैं. आई आई टी बम्बई में ( 1977) में होस्टल में हम साथ साथ थे. अब मुलाकातें बहुत कम होती हैं ( पिछले 15 वर्ष में शायद दो ही बार मिले हैं). ई-मेल से सम्पर्क बना रहता है.
पिछले सप्ताह मुझे भाटिया जी ने प्यारे से कार्टूंस भेजे. वही सबके साथ share कर रहा हूं.