Tuesday, August 3, 2010

गज़ल्

मैं ढूंढता हूं एक राज़दार शहर में
हर दोस्त मेरा बन गया अखबार शहर में.


जिस शख्स का इतिहास भी थाने में दर्ज़ था,
वो आज बन गया है असरदार शहर में.


अपने मुनाफे के लिये भगवान बेच दे ,
ऐसे हैं धर्म के अलमबरदार शहर में.



दिन रात लोग जो करें सत्ता की दलाली,
हां हां उन्ही के दम पे है सरकार शहर में.


जब से ये 'हाय' 'बाय' 'हलो' शब्द चले हैं,
गुम हो गया है जैसे 'नमस्कार' शहर में.

4 comments:

Rajeev Bharol said...

वाह, बहुत ही अच्छी ग़ज़ल. सीधे दिल पर असर करती है.

परमजीत सिँह बाली said...

बहुत बढिया व सामयिक गजल है बधाई स्वीकारें।

वन्दना said...

वाह आज के हालात पर गहरा कटाक्ष्।

अरविन्द चतुर्वेदी Arvind Chaturvedi said...

@Rajeev Bharol ji
@परमजीत सिंह जी
@वन्दना जी

आप ब्लौग पर पधारे एवं टिप्पणी की,इस हेतु आपका आभार.
आपको गज़ल पसन्द आयी, धन्यवाद.