Tuesday, May 11, 2010

मेरी यूरोप यात्रा-7 पेरिस आखिर पेरिस है !



पेरिस पहुंचना ही एक रोमांचकारी अनुभव लगा. 1987 में पहली बार जब यूरोप आया था (तब स्पेन- मैड्रिड व वेलेंसिया, तथा स्वित्ज़र्लेंड -जिनेवा ही देख पाया था) तब इतना रोमांच कारी अनुभव मैड्रिड में भी हुआ था. लग्भग दो घंटे हम पेरिस को खुली बस की दूसरी मंज़िल से देखते रहे , सराहते रहे और सच कहूं तो ( इस पचपन की उम्र में भी ) एक बचकानी सी खुशी महसूस करते रहे.

पेरिस के अनेक दर्शनीय स्थलों पर एफिल टोवर का रुतबा इस कदर हावी है कि दो घंटे के दौरान कम से चार बार हम एफिल टोवर के चारों ओर से गुजरे. पेरिस यानी एफिल टोवर. बाकि सब दोयम .

बस् के ऊपर से पेरिस के बहुत से चित्र लिये और पेरिस को ‘महसूस ‘ किया. यह भी देखा कि पेरिस घूमने आने वालों मे साइकल से घूमने वाले बहुत हैं. बताया गया कि यहां एलेक्ट्रिक साइकल भी किराये पर मिलती हैं. दिन भर के लिये . साइकल पर घूमने वाले विशेष हेलमेट भी पहनते हैं ,वैसे यह शौक सिर्फ पेरिस या फ्रांस में ही नहीं पूरे यूरोप में है.
सडक किनारे वाले चाय,काफी ,बीयर बार यहां भी बहुत हैं,एक प्रकार से यह संस्कृति का ही एक अंग है.


‘चढ़ो-उतरो फिर चढ़ो-उतरो’ इस प्रकार की बस की सैर का पहला अनुभव मुझे 2004 में कोपेनहेगेन में हुआ था. इस प्रकार के विकल्प में पर्यटक वह सभी कुछ मनचाहे रूप में देख सकता है,बिना किसी बन्धन के. हांलाकि हमारे पास यह विकल्प था, परंतु हम लोग पूरे दो घण्टे बस पर ही सवार रहे और पेरिस को ऊपर –ऊपर से ही देखते रहे. सीमित समय में सभी कुछ ,जो दर्शनीय था, हम देखना चाहते थे.बस के समय की समाप्ति पर सेन नदी ( पेरिस भ्री सभी मुख्य यूरोपीय नगरों की भांति नदी के इर्द-गिर्द ही है) पर बोट-क्रूज़ का भी कार्यकृम था,अत: हम यहां-वहां उतर कर शाम के कार्यकृम में कटौती नहीं करना चाहते थे.

पेरिस के विभिन्न चर्च, ओपेरा, एफिल टोवर,तमाम म्यूजियम,मुख्य बाज़ार, सत्ता के केन्द्र व सदन , कभी सेन नदी के किनारे किनारे तो कभी मुख्य बाज़ार सभी का आनन्द लिय बस के ज़रिये.

जैसे ही बस –यात्रा समाप्ति पर उतरे ,हम बोट क्रूज़ के निर्धारित स्थान की ओर चल दिये.
वहां टिकट बुक करने पर पता चला अभी अगली बोट के लिये 20मिनट और हैं. अब हमने ( अजय और उसका कैमरा भी साथ दे रहे थे)लोगों को देखना शुरू किया.फोटो भी साथ साथ लेते जा रहे थे. फुटपाथी दुकानदार व हौकर्स पर नज़र गयी तो पाया कि अधिकांशतया वह सभी दो वर्गों के ही हैं . एक अफ्रीकी मूल व दूसरी गठेले बदन वाले एसियाई. लगा कि वे या पाकिस्तानी या भारतीय हो सकते हैं . एक सिख भी दिखा.हमने मोलभाव भी शुरू कर दिया था. शायद यह उन्हें पसन्द नहीं आया. ( यह एक –दो अफ्रीकी दुकानदार के चेहरे के हाव-भाव से जाना. बाद में बात-चीत से पता चला कि एशियाई हौकर्स हरियाणा ( भारत) के थे परंतु अधिकांश के पास कोई लाइसेंस नहीं था. जैसे ही कोई पुलिस वाला देखते वह भागने लगते.( हमारे यहां कहतें हैं –भागो भागो कमेटी आ गयी- जब भी वह म्युनिसिपल कमेटी के अथवा पुलिस के लोगों को देखते हैं-भागने लगते हैं)


खैर, समय होने पर हमने बोट-क्रूज़ का आनन्द लिया. लगभग 90मिनट के क्रूज़ के बाद महसूस किया कि पेट में चूहे कूद रहे थे. सुबह से बस चना-चबेना ही चल रहा था, कोई पूरा भोजन नहीं किया था. पीटर ने पूछा कि किस तरह का खाना हम पसन्द करेंगे तो हम सब का उत्तर था यदि भारतीय मिले तो अच्छा.

( आगे .. पेरिस में भारतीय खाना ??)
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