वैसे तो पंगे लेना अरुन अरोरा जी की ठेकेदारी में आता है. हमारा इस कला / क्रिया /कार्य कलाप से दूर दूर का वास्ता नहीं है ,पर यार होली कोई रोज़ रोज़ थोडी ही आती है.
तो हमने सोचा कि थोडी देर के लिये हो जाये कुछ नया और लेने लग गये ...पंगे.
होली के पंगे हों और चंडूखाने की बात न चले ,ये तो हो ही नहीं सकता.तो भैया जी मैने खोला अपना बस्ता और निकाली चंडूखाने की नयी नयी खबरें.
बमुश्किल तीन खबरें ही बन पायी थी कि पता चला ( पडोस का) मुर्गा भी ( भांग खाकर) बांग देने की सोच रहा है. घडी ( खराब) देखकर तीन पर ही तसली कर ली.
पहली खबर भडास का मोहल्ले से होली मिलन.
दूसरी खबर - ग्रेग चैपल बनेंगे हौकी टीम के कोच
और तीसरी खबर - देवेगौडा बनेंगे थर्ड अम्पायर्
पूरी तरह होलियाना चुहल यानी पंगा. ( मान कर चल रहा हूं कि इसे होली की तरंग में ही लिया जायेगा )
बुरा ना मानो होली है.
Saturday, March 22, 2008
ऐश्वर्य जब तुम्हे पुकारे "अंकल जी" ..........
नाचो दे दे ताल ,मजे लो होली में,
गालों मलो गुलाल, मजे लो होली में.
रंग -बिरंगे चेहरों में ढूंढो धन्नो,
घर हो या ससुराल, मजे लो होली में.
हुस्न एक के चार नज़र आयें देखो,
ऐनक करें कमाल,मजे लो होली में.
ऐश्वर्य जब तुम्हे पुकारे "अंकल जी"
छू कर देखो गाल, मजे लो होली में.
लड्डू पेडे गूझे,गुझिया,माल पुआ,
खाओ सब तर -माल मजे लो होली में.
मिले रंग में भंग, मज़ा तब लो दूना,
बहकी बहकी चाल, मजे लो होली में.
बीबी बोले मेरे संग खेलो होली,
बैठो सड्डे नाल मजे लो होली में.
नाचो दे दे ताल ,मजे लो होली में,
गालों मलो गुलाल, मजे लो होली में.
गालों मलो गुलाल, मजे लो होली में.
रंग -बिरंगे चेहरों में ढूंढो धन्नो,
घर हो या ससुराल, मजे लो होली में.
हुस्न एक के चार नज़र आयें देखो,
ऐनक करें कमाल,मजे लो होली में.
ऐश्वर्य जब तुम्हे पुकारे "अंकल जी"
छू कर देखो गाल, मजे लो होली में.
लड्डू पेडे गूझे,गुझिया,माल पुआ,
खाओ सब तर -माल मजे लो होली में.
मिले रंग में भंग, मज़ा तब लो दूना,
बहकी बहकी चाल, मजे लो होली में.
बीबी बोले मेरे संग खेलो होली,
बैठो सड्डे नाल मजे लो होली में.
नाचो दे दे ताल ,मजे लो होली में,
गालों मलो गुलाल, मजे लो होली में.
Saturday, March 1, 2008
ज्ञानेन्द्रपति की कविता ----आप साहित्य प्रेमी हैं अथवा नहीं- इसे अवश्य पढें
अर्सा पहले एक मशहूर कवि की पुस्तक प्रकाशित हुई. जैसा कि अपेक्षित था-पुस्तक काफी चर्चित हुई. एक हिन्दी पत्रिका में पुस्तक की समीक्षा करते हुए आलोचक ने लिखा कि पुस्तक की अधिकांश रचनायें राजनैतिक टोन वाली हैं और तथा इन कविताओं का राजनैतिक तत्व उन पर हावी है,जो कविता को कमज़ोर करता है.
1999 में मेरा दूसरा संग्रह “चीखता है मन” प्रकाशित हुआ. ( भूमिका श्री कन्हैयालाल नन्दन ने लिखी थी). इसके परिचय में मैने लिखा कि यदि कवि की रचना पर उसका राजनैतिक सोच हावी होता है तो क्या हर्ज़ है? प्रश्न सिर्फ यह होना चाहिये कि कवि अपने सोच के प्रति ईमानदार है अथवा नहीं.
पिछले माह पुस्तक मेले में किताबघर द्वारा प्रकाशित ‘कवि ने कहा’ ( ज्ञानेन्द्रपति) के पन्ने पलट रहा था. पहली ही कविता दिल को छू गयी और पुस्तक खरीद ली. मेले से घर वापसी के लिये जैसे ही प्रगति मैदान स्टेशन से मेट्रो में बैठा ,अपना स्टेशन ( द्वारका ) आने तक अनेक कवितायें पढ़ गया. तब से कई कवितायें दो दो बार पढी हैं, घर पर बच्चों को भी सुनायी हैं . हांलाकि मैं रचनाकर की राजनैतिक सोच से सहमत नहीं हूं ,परंतु कविता से बुरी तरह प्रभावित हूं, या कहिये कि मुरीद हो गया हूं.
य़ह सब इसलिये कहना पडा कि मैं चाहता हूं कि आप इस कवि को पढें. उनकी कुछ कवितायें बहुत लम्बी है, तीन रचनायें ,जिनसे कवि का सोच उजागर होता है और तेवर झांकता है, यहां प्रस्तुत हैं.---)
कुछ कविताऎं और कुछ कविताऍं
कुछ कविताऍं
तो मैं खेतों से शकरकन्द की तरह खोदकर लाया
कुछ कविताऍं
तितलियों की तरह ,खुली खिडकियों से,
घुस आयीं मेरे घर
कि अपने घर .
कुछ कविताओं के लिये मैं कितना कितना घूमा
गो-यूथों के पीछे पीछे चरवाहे बालक सा ,
कि सांझ उन्हें दुह सकूं
धारोष्ण.
कुछ कविताऍं
कई कई बिट्वन की कुतिया माता सरीखी
दुधीले थन और गीली थूथन लिये ,
लगीं चलीं आयीं सडक से
पीछे पीछे मेरे दुआरे.,
एक गर्भवती औरत के प्रति
यह तुम्हारा उदर ब्रह्माण्ड हो गया है.
इसमें क्या है? एक बन रहा शिशु भर?
झिल्ली में लिपटी मांस पहनती चेतना. बस ?
कितनी फैलती जा रही है परिधि तुम्हारे उदर की
तुम क्या जानो कि अंतरिक्ष तक चली गयी है यह विरूप गोलाई और ये
पेड-पौधे,मकान,सडकें,मैं,यह पोल ,वह कुत्ता,उछलता वह मेढक,
रँभाती गाय,बाड़ कतरता माली, क्षितिज़ पर का सूरज
सब उसके अन्दर चले गये हैं और तुम भी.
नदी और नगर
नदी के किनारे
नगर बसते हैं
नगर के बसने के बाद
नगर के किनारे से नदी बहती है,
1999 में मेरा दूसरा संग्रह “चीखता है मन” प्रकाशित हुआ. ( भूमिका श्री कन्हैयालाल नन्दन ने लिखी थी). इसके परिचय में मैने लिखा कि यदि कवि की रचना पर उसका राजनैतिक सोच हावी होता है तो क्या हर्ज़ है? प्रश्न सिर्फ यह होना चाहिये कि कवि अपने सोच के प्रति ईमानदार है अथवा नहीं.
पिछले माह पुस्तक मेले में किताबघर द्वारा प्रकाशित ‘कवि ने कहा’ ( ज्ञानेन्द्रपति) के पन्ने पलट रहा था. पहली ही कविता दिल को छू गयी और पुस्तक खरीद ली. मेले से घर वापसी के लिये जैसे ही प्रगति मैदान स्टेशन से मेट्रो में बैठा ,अपना स्टेशन ( द्वारका ) आने तक अनेक कवितायें पढ़ गया. तब से कई कवितायें दो दो बार पढी हैं, घर पर बच्चों को भी सुनायी हैं . हांलाकि मैं रचनाकर की राजनैतिक सोच से सहमत नहीं हूं ,परंतु कविता से बुरी तरह प्रभावित हूं, या कहिये कि मुरीद हो गया हूं.
य़ह सब इसलिये कहना पडा कि मैं चाहता हूं कि आप इस कवि को पढें. उनकी कुछ कवितायें बहुत लम्बी है, तीन रचनायें ,जिनसे कवि का सोच उजागर होता है और तेवर झांकता है, यहां प्रस्तुत हैं.---)
कुछ कविताऎं और कुछ कविताऍं
कुछ कविताऍं
तो मैं खेतों से शकरकन्द की तरह खोदकर लाया
कुछ कविताऍं
तितलियों की तरह ,खुली खिडकियों से,
घुस आयीं मेरे घर
कि अपने घर .
कुछ कविताओं के लिये मैं कितना कितना घूमा
गो-यूथों के पीछे पीछे चरवाहे बालक सा ,
कि सांझ उन्हें दुह सकूं
धारोष्ण.
कुछ कविताऍं
कई कई बिट्वन की कुतिया माता सरीखी
दुधीले थन और गीली थूथन लिये ,
लगीं चलीं आयीं सडक से
पीछे पीछे मेरे दुआरे.,
एक गर्भवती औरत के प्रति
यह तुम्हारा उदर ब्रह्माण्ड हो गया है.
इसमें क्या है? एक बन रहा शिशु भर?
झिल्ली में लिपटी मांस पहनती चेतना. बस ?
कितनी फैलती जा रही है परिधि तुम्हारे उदर की
तुम क्या जानो कि अंतरिक्ष तक चली गयी है यह विरूप गोलाई और ये
पेड-पौधे,मकान,सडकें,मैं,यह पोल ,वह कुत्ता,उछलता वह मेढक,
रँभाती गाय,बाड़ कतरता माली, क्षितिज़ पर का सूरज
सब उसके अन्दर चले गये हैं और तुम भी.
नदी और नगर
नदी के किनारे
नगर बसते हैं
नगर के बसने के बाद
नगर के किनारे से नदी बहती है,
लेबल:
Gyanendrapati,
क़विता,
ज्ञानेन्द्रपति
Wednesday, February 27, 2008
क्या बर्फ सचमुच पिघलेगी ?

समूचे विश्व में पिछले 15-20 वर्षों में राज्नैतिक घटनाक्रम लगातार बदलता रहा है. या यूं कहें कि इसे बदलने के प्रयास लगातार कामयाब होते दिख रहे हैं.
मेरी दो छात्रायें वियतनाम से हैं. उनसे बात करता हूं तो पता लगता है,उन्हे एहसास ही नहीं कि वियतनाम कभी बंटा हुआ भी था. जर्मनी में इतनी वारिशें हुई हैं कि आम जर्मन के लिये पूर्वी और पश्चिमी जर्मनी का फर्क़ धुल गया सा लगता है. दूसरी तरफ सोवियत संघ कब का समाप्त हुआ. चेकोस्लोवाकिया बंट गया, फिलस्तीनी अब भी अपनी ज़मीन के लिये लड रहे हैं. टिब्बत, चीन, ताईवान का मुद्दा समाप्त नही हो पाया है. यानी दो तरह के हालात हैं दुनिया में . कहीं लोग जुड रहे हैं और कहीं बिखर ( बिछुड) रहे हैं.
आज जब खबर आयी कि दो कोरिय्याई देश ( दक्षिण कोरिया व उत्तर कोरिया) के बीच मत्भेद समाप्त करने के लिये अमरीका भी प्रयास कर रहा है तो अनायास ही मुझे 1989 की अपनी प्योंग्यांग ( उत्तर कोरिया की राजधानी) यात्रा याद आ गयी.
अमरीका ने सौ से अधिक सदस्यों वाला एक संगीत समूह ( आर्केस्त्रा)दोनों देशों की यात्रा पर भेजा है, जो संगीत के माध्यम से दूरियां घटाने का प्रयास करेगा. प्योंगयांग में इसे सराहा गया है तथा इस ग्रुप को लोकप्रियता भी मिली है.एक प्रकार से यह उस प्रयास का विस्तार ही है, जिसे दोनो देशों के प्रमुख पिछले अनेक वर्षों से करते आ रहे हैं. आने वाला समय ही बतायेगा कि बर्फ वाकई पिघलेगी अथवा नहीं.
मेरी प्योंगयांग यात्रा- 1989
1988 के ओलम्पिक खेल सियोल ( दक्षिण कोरिया) को मिले थे, इससे दोनो कोरिय्याई देशों मे और दूरी बढ गयी थी. सोवियत संघ तब तक अस्तित्व में था और उसके प्रयास के बावजूद प्योंगयांग को खेलों की मेज़बानी नहीं
मिल पायी थी,जब कि प्योंगयांग ने खेलों की पूरी तैयारी कर रखी थी.इस तैयारी का लाभ उठाने के लिये तथा प्योंगयांग की साख बढाने के लिये 1989 में सोवियत संघ की मदद से विश्व युवा समारोह आयोजित किया गया था.
उन दिनों सोवियत संघ के तत्वावधान में एक अंतर्राष्ट्रीय युवा संघटन काम करता था( अधिकांश साम्यवादी देशों मे इसका खूब प्रसार था). भारत समेत अन्य देशों में भी साम्यवादी व समाजवादी विचारधारा वाले संग्ठन इससे सम्बद्ध थे.भारत में दक्षिणपंथी दलों ( भाजापा आदि) को छोडकर अन्य ( कांग्रेस,जनता-परिवार्, सभी रंग के कम्युनिस्ट ,तेलुगु देशम इसमें शामिल थे, सपा तब अस्तित्व में नहीं थी तथा बसपा बहुत छोटी पार्टी थी )
इस विश्व युवा समारोह में भाग लेने हेतु भारत से लगभग 400 युवा लोगो का एक दल भेजा गया था, जिसमे करीब 350 राजनैतिक दलों की युवा शाखाऑ के प्रतिनिधि थे व शेष 50 में युवा खिलाडी, संगीतज्ञ, पत्रकार आदि शामिल थे.सौभाग्य से में भी इसमें शरीक हुआ और प्योंगयांग की सैर का लाभ उठाया.राजनैतिक रूप से सक्रिय होने के कारण घटना क्रम में मेरी भी कुछ भूमिका थी. (वह भी धीरे धीरे इस लेख श्रंखला में आयेगा.)
चूंकि सारा खेल सोवियत संघ द्वारा प्रायोजित था अत: जाहिर है कि आन्दोलन का अगुआ होने के नाते खर्च भी उसे ही वहन करना था. पूरे विश्व से युवाओं को लेकर विश्व युवा समारोह हेतु प्योंगयांग पहुंचाने का दायित्व रूसी विमान सेवा ऐरोफ्लोट ने ही उठाया.
भारत से यह प्रतिनिधिमंडल ऐरोफ्लोट विमान सेवा मे सवार हुआ. ( शायद 9 मई 1989 को), और पाकिस्तान के एक एयर्पोर्ट ( शायद लाहोर-ठीक से याद नहीं) पर एक घंटा रुका,फिर ताश्कन्द, खबरस्त ,आदि होता हुआ लगभग 18 घंटे बाद प्योंग्यांग पहुंचा.
रास्ते में क्या क्या हुआ?,प्योंगयांग की यात्रा कैसी रही? अमरीकी पर्तिनिधि भी थे क्या? आदि आदि रोचक जानकारी मैं दूंगा -स्मय समय पर आने वाली पोस्ट में श्नै: श्नै:.(यदि रुचि है तो )इंतज़ार कीज़िये.
लेबल:
DPRKOREA,
Pyongyang,
उत्तर कोरिया
Thursday, February 21, 2008
पडोस में लोकतंत्र -कब तक़ आखिर, आखिर क़ब तक़्
मुशर्रफ तो मुशर्रफ, अमरीका तक को ये गुमान नहीं होगा कि पाकिस्तान में खिचडी पकने जा रही है. बेनज़ीर की शहादत आखिर रेंज लायी और पाकिस्तान की जनता ने आधे मन से ही सही, पर
अंतत: मुशर्रफ गलती कर ही बैठे. मजे से पूरे देश पर सेना के जनरल की तरह शासन चल रहा था.जनता यहां वहां थोडी बहुत ना-नुकुर कर तो रही ठीक परंतु हालात इतने खराब नहीं थे, क्यों कि पीछे से अमरीका का पूरा साथ था.
लेकिन जैसे हर जनरल का कभी न कभी अंत आता ही है, मियां मुशर्रफ भी लालच में आ ही गये. सोचा होगा कि किसी तरह एक बार जम्हूरियत (Democracy) का झुनझुना दिखाकर सत्ता हथिया ली तो फिर कोई चुनौती देने वाला भी नहीं बचेगा, आका ( अमरीका ) खुश होगा ,सो अलग. यानी दोनो हाथॉं में लड्डू. पर पांसा उल्टा पड गया.
1975 में जब श्रीमती इन्दिरा गान्धी ने भारत में आपात काल घोषित किया था, तब उन्हें भी भान नहीं था कि कहीं न कहीं जनता विरोध भी कर सकती है. जब विरोध की सुगबुगाहट बढने लगी, तो इन्दिराजी ने भी वैसा ही सोचा था,जो मुशर्रफ ने अब सोचा था. जैसा इन्दिरा जी को झेलना पडा ( शाह कमीशन की जांच, फिर गिरफ्तारी आदि..), अब मुशर्रफ की बारी है.
भारत में तो लोक्तंत्र की जडें मज़बूत थीं और कानून-judiciary भी काफी हद तक़ स्वतंत्र ठीक सो वह बच भी गयीं और फिर शानदार वापसी भी की, परंतु पाकिस्तान और भारत की तुलना सम्भव नहीं है. जिस तरह मुशर्रफ ने वहां अदालत judiciary को तिगनी का नाच नचाया था, अब वही judiciary उनके पीछे पड जाये तो आश्चर्य नहीं होना चाहिये.
और फिर पाकिस्तान में तो यह खेल बहुत पुराना है. हर तानाशाह इस परिस्थिति से गुजरा है. बचा भी कोई नहीं, अयूब खां हों या जनरल टिक्का खां,और या जिया उल हक़, सबके सब उसी गति को प्राप्त हुए. अत: माना जाना चाहिये कि अब मुशर्रफ भी क़तार में है.
सरकार कौन बनाता है और कितने दिन चला पाता है, यह कहना पाकिस्तान जैसे मुल्क के लिये कुछ ज्यादा ही मुश्किल है.
हां एक बात ज़रूर ,कि भारत के सम्बन्ध कोई सुधरने वाले नहीं हैं. जब भी पाकिस्तान में सत्ता परिवर्तन हुआ है, भारत के सम्बन्ध बिगडे ही हैं.
अंतत: मुशर्रफ गलती कर ही बैठे. मजे से पूरे देश पर सेना के जनरल की तरह शासन चल रहा था.जनता यहां वहां थोडी बहुत ना-नुकुर कर तो रही ठीक परंतु हालात इतने खराब नहीं थे, क्यों कि पीछे से अमरीका का पूरा साथ था.
लेकिन जैसे हर जनरल का कभी न कभी अंत आता ही है, मियां मुशर्रफ भी लालच में आ ही गये. सोचा होगा कि किसी तरह एक बार जम्हूरियत (Democracy) का झुनझुना दिखाकर सत्ता हथिया ली तो फिर कोई चुनौती देने वाला भी नहीं बचेगा, आका ( अमरीका ) खुश होगा ,सो अलग. यानी दोनो हाथॉं में लड्डू. पर पांसा उल्टा पड गया.
1975 में जब श्रीमती इन्दिरा गान्धी ने भारत में आपात काल घोषित किया था, तब उन्हें भी भान नहीं था कि कहीं न कहीं जनता विरोध भी कर सकती है. जब विरोध की सुगबुगाहट बढने लगी, तो इन्दिराजी ने भी वैसा ही सोचा था,जो मुशर्रफ ने अब सोचा था. जैसा इन्दिरा जी को झेलना पडा ( शाह कमीशन की जांच, फिर गिरफ्तारी आदि..), अब मुशर्रफ की बारी है.
भारत में तो लोक्तंत्र की जडें मज़बूत थीं और कानून-judiciary भी काफी हद तक़ स्वतंत्र ठीक सो वह बच भी गयीं और फिर शानदार वापसी भी की, परंतु पाकिस्तान और भारत की तुलना सम्भव नहीं है. जिस तरह मुशर्रफ ने वहां अदालत judiciary को तिगनी का नाच नचाया था, अब वही judiciary उनके पीछे पड जाये तो आश्चर्य नहीं होना चाहिये.
और फिर पाकिस्तान में तो यह खेल बहुत पुराना है. हर तानाशाह इस परिस्थिति से गुजरा है. बचा भी कोई नहीं, अयूब खां हों या जनरल टिक्का खां,और या जिया उल हक़, सबके सब उसी गति को प्राप्त हुए. अत: माना जाना चाहिये कि अब मुशर्रफ भी क़तार में है.
सरकार कौन बनाता है और कितने दिन चला पाता है, यह कहना पाकिस्तान जैसे मुल्क के लिये कुछ ज्यादा ही मुश्किल है.
हां एक बात ज़रूर ,कि भारत के सम्बन्ध कोई सुधरने वाले नहीं हैं. जब भी पाकिस्तान में सत्ता परिवर्तन हुआ है, भारत के सम्बन्ध बिगडे ही हैं.
लेबल:
Democracy,
Indiragandhi,
Musharraf,
Pakistan
Tuesday, February 19, 2008
मुशर्रफ!! अमरीका तुम्हे मरने नहीं देगा, हम तुम्हे जीने नहीं देंगे
अब वक़्त आ गया सा लगता है ,जब पाकिस्तान में तख्त उछाले जायेंगे और ताज उछले जायेंगे.शुरुआती
Monday, February 18, 2008
हाय राम ! इत्ते सारे फ्लाई –ओवर ( और फिर भी ढाक के तीन पात).

दिल्ली फ्लाई-ओवरों का शहर बनता जा रहा है. 1982 में जब यहां एशियाई खेल आयोजित हुए थे से अब तक फ्लाई-ओवरों का पूरा का पूरा जाल सा बिछ गया है. और अभी भी कम से बीस फ्लाई-ओवर और प्रस्तावित है तथा कुछ निर्माणाधीन हैं. यह् सब इसलिये ये कि यातायात (Traffic ट्रैफिक ) सुचारु रूप से चले. दिल्ली पर सडकें लगभग दो मंजिला हो गयीं हैं. अब प्रश्न यह है कि क्या इन सभी फ्लाई-ओवरों से यातायात कुछ सुधरा है ?
ज़हां जहां ये फ्लाई-ओवर बनाये गये थे वहां पहले अक्सर ट्रैफिक जाम लगा करता था. सुबह शाम ( peak hours ) बह्त मुश्किल हुआ करती थी. उस दृष्टि से उन चौराहों पर निस्सन्देह कुछ फर्क पडा है.परंत विशेष नहीं. इन फ्लाई-ओवरों से आगे निकलते ही सारा का सारा ट्रैफिक फिर जमा हो जाता है. यातायात की गति पर फिर भी कुछ असर नहीं पडता क्यों कि फ्लाई-ओवरों के तुरंत बाद जाम की वही ( बल्कि बदतर भी) स्थिति अब भी है.
पूरे दिल्ली में सभी जगह वही हाल है. आश्रम चौक ,पीरागढी, रजौरी गार्डेन, ओबेराय होटेल, डिफेंस कोलोनी, धौलाकुआं....... कहीं की भी हालत नहीं सुधरी है. और तो और गुडगांव जाने वाली एक्स्प्रेस-वे (express -way) के साथ बने डोमेसटिक एयरपोर्ट ( domestic Airport) वाले फ्लाई-ओवर की तो सबसे ज्यादा गयी बीती हालत है. द्वारका तथा एयरपोर्ट जाने वाला ट्रेफिक मिलकर ऐसी खराब हालत पैदा करतेहैं कि औसत आदमी यातायात व्यवस्था को कोसते हुये स्वयं को भी दोषी मानता है कि इधर आया ही क्यों.अनेकों व्यक्तियों की फ्लाइट छूट जाती है.
लगभग यही आलम पूरी दिल्ली में है,जहां भी फ्लाई ओवर बने हैं. ज़हां कहीं अभी निर्माण कार्य जारी है,वहां की हालत और भी बदतर है. एक या दो किलोमीटर के जाम में से निकलने के लिये घंटा-डेढ घंटा तो मामूली बात है.
आखिर कब सुधरेंगे हालात ?
Tuesday, February 5, 2008
लाइये जुगनू कहीं से खोजकर , और हमको रास्ता दिखलाइये
एक चिंगारी कहीं से लाइये,
इन बुझे शोलों को फिर भडकाइये.
इस अन्धेरे को मिटाने के लिये,
रोशनी का एक क़तरा चाहिये.
लाइये जुगनू कहीं से खोजकर ,
और हमको रास्ता दिखलाइये.
आपकी हर बात पर विश्वास है,
आप तो झूठी कसम मत खाइये.
क्या पता कोई कही ठुकरा न दे,
सबके आगे हाथ मत फैलाइये.
हर जगह सम्वेदना मिलती नहीं,
हर किसी का द्वार मत खटकाइये.
फेंकिये सारी नक़ाबें नोचकर,
असली चेहरा सामने तो लाइये
इन बुझे शोलों को फिर भडकाइये.
इस अन्धेरे को मिटाने के लिये,
रोशनी का एक क़तरा चाहिये.
लाइये जुगनू कहीं से खोजकर ,
और हमको रास्ता दिखलाइये.
आपकी हर बात पर विश्वास है,
आप तो झूठी कसम मत खाइये.
क्या पता कोई कही ठुकरा न दे,
सबके आगे हाथ मत फैलाइये.
हर जगह सम्वेदना मिलती नहीं,
हर किसी का द्वार मत खटकाइये.
फेंकिये सारी नक़ाबें नोचकर,
असली चेहरा सामने तो लाइये
बस्तियों में भीड़ बढती जा रही है
बस्तियों में भीड़ बढती जा रही है
एक चिंगारी सुलगती जा रही है.
सारी ऊंची कुर्सियां हिलने लगीं,
भीड अब अंगड़ाई लेती जा रही है.
आग ज्यों ज्यों तेज़ होती जा रही है,
उन हवाओं को अखरती जा रही है.
राख में जो अब तलक खामोश थी,
आज अंगारे उगलती जा रही है.
ये हवा है तेज़ चाकू की तरह
पक्षियों के पर कतरती जा रही है.
चांद से शायद कहीं मतभेद है,
चांदनी छत पर उतरती जा रही है.
उसकी चुप है इक पहेली की तरह,
जितना सुलझाओ उलझती जा रही है.
एक चिंगारी सुलगती जा रही है.
सारी ऊंची कुर्सियां हिलने लगीं,
भीड अब अंगड़ाई लेती जा रही है.
आग ज्यों ज्यों तेज़ होती जा रही है,
उन हवाओं को अखरती जा रही है.
राख में जो अब तलक खामोश थी,
आज अंगारे उगलती जा रही है.
ये हवा है तेज़ चाकू की तरह
पक्षियों के पर कतरती जा रही है.
चांद से शायद कहीं मतभेद है,
चांदनी छत पर उतरती जा रही है.
उसकी चुप है इक पहेली की तरह,
जितना सुलझाओ उलझती जा रही है.
Monday, February 4, 2008
यदि उत्तर भारतीय बदला लेने पर उतर आयें...
बम्बई देश की आर्थिक राजधानी कही जाती है. यदि कोई यह कहे कि बम्बई इसीलिये बम्बई है क्यों कि इसे मराठियों ने अपने श्रम और जीवट से यहां तक पहुंचाया है -तो मैं इसे मूर्खता पूर्ण बक्तव्य ही कहूंगा.
बम्बई ,बंग्लौर, पूना, अहमदाबद ,हैदराबाद ,नोएडा,या गुडगांव या देश का अन्य कोई भाग कितनी भी तरक्की करले,परंतु इसमें खून पसीना पूरे भारत का लगा हुआ है. यह हो सकता है कि स्थानीय लोगों का योगदान अन्य की अपेक्षा अधिउक हो, परंतु कोई यह तथ्य स्वीकार नहीं कर सकता कि बम्बई मराठियों की है और गैर-मराठी समुदाय का कोई योगदान नहीं है. बम्बई यदि देश के केन्द्रीय करों में एक तिहाई योगदान करती है तो यह सिर्फ मराठी समुदाय का योगदान नहीं है.
राज ठाकरे नये नये मुल्ला बने हैं ,कुछ ज्यादा ही प्याज़ खा रहे हैं . वेश्या नंगा नाच करके अपनी ओर नज़रें आकृष्ट करने लगेगी ऐसा ही प्रतीत हो रहा है.
देखिये निशाना किसको बना रहे हैं? बम्बई का तेक्सी वाला, कुली, मज़दूर, सब्ज़ीवाला दूधवाला, ...हां इनमे से अधिकांश उत्तर भारतीय ( यूपी या बिहार भी) हो सकते है,परंतु जिस दिन ये काम करना बन्द कर देंगे तो बम्बई में पूरा चक्का जाम हो जायेगा.
मनपा चुनाव के समय भी राज ठाकरे ऐसा नाटक कर चुके हैं. महौल चुनाव का था,बात आयी गयी हो गयी. अब पानी सर के ऊपर जा रहा है.
इस अधकचरे राज नीतिज्ञ से कोई पूछे-कि यदि उत्तर भारतीय बदला लेने पर उतर आयें... कितने मराठी मानुष हैं शेष भारत में..?( या उत्तर भारत मे.. ?)- कौन आयेगा बचाने..?
राज ठाकरे जैसों की जगह पागलखाना या जेलखाना है. भगवान ने उसे सद्बुद्धि दे दी तो ठीक, बरना इतना ठोका जायेगा कि अपने आप उसे सदबुद्धि आ जायेगी .
बम्बई ,बंग्लौर, पूना, अहमदाबद ,हैदराबाद ,नोएडा,या गुडगांव या देश का अन्य कोई भाग कितनी भी तरक्की करले,परंतु इसमें खून पसीना पूरे भारत का लगा हुआ है. यह हो सकता है कि स्थानीय लोगों का योगदान अन्य की अपेक्षा अधिउक हो, परंतु कोई यह तथ्य स्वीकार नहीं कर सकता कि बम्बई मराठियों की है और गैर-मराठी समुदाय का कोई योगदान नहीं है. बम्बई यदि देश के केन्द्रीय करों में एक तिहाई योगदान करती है तो यह सिर्फ मराठी समुदाय का योगदान नहीं है.
राज ठाकरे नये नये मुल्ला बने हैं ,कुछ ज्यादा ही प्याज़ खा रहे हैं . वेश्या नंगा नाच करके अपनी ओर नज़रें आकृष्ट करने लगेगी ऐसा ही प्रतीत हो रहा है.
देखिये निशाना किसको बना रहे हैं? बम्बई का तेक्सी वाला, कुली, मज़दूर, सब्ज़ीवाला दूधवाला, ...हां इनमे से अधिकांश उत्तर भारतीय ( यूपी या बिहार भी) हो सकते है,परंतु जिस दिन ये काम करना बन्द कर देंगे तो बम्बई में पूरा चक्का जाम हो जायेगा.
मनपा चुनाव के समय भी राज ठाकरे ऐसा नाटक कर चुके हैं. महौल चुनाव का था,बात आयी गयी हो गयी. अब पानी सर के ऊपर जा रहा है.
इस अधकचरे राज नीतिज्ञ से कोई पूछे-कि यदि उत्तर भारतीय बदला लेने पर उतर आयें... कितने मराठी मानुष हैं शेष भारत में..?( या उत्तर भारत मे.. ?)- कौन आयेगा बचाने..?
राज ठाकरे जैसों की जगह पागलखाना या जेलखाना है. भगवान ने उसे सद्बुद्धि दे दी तो ठीक, बरना इतना ठोका जायेगा कि अपने आप उसे सदबुद्धि आ जायेगी .
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