जा रहा हूं, मगर लौट कर आऊंगा,
सबसे कहना सही वक्त पर आऊंगा.
मैं जवां हूं, भट्कने में कुछ डर नहीं,
जब भी थक जाऊंगा,अपने घर आऊंगा.
दूर था ,इसलिये सबने देखा नहीं
हर जगह देखना अब नज़र आऊंगा.
जंग छोटी - बडी कोई होती नहीं
जंग जैसी भी हो जीत कर आऊंगा.
चौंकना मत अगर मेरी दस्तक सुनो,
देके आने की पहले खबर ,आऊंगा .
आगे जो भी सफर,होंगे अपने ही पर
पंख थे जो पराये, कतर आऊंगा .
आके वापस दुबारा न जाना पडे,
पूरा करके ही अपना सफर आऊंगा.
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Sunday, June 29, 2008
Tuesday, February 5, 2008
बस्तियों में भीड़ बढती जा रही है
बस्तियों में भीड़ बढती जा रही है
एक चिंगारी सुलगती जा रही है.
सारी ऊंची कुर्सियां हिलने लगीं,
भीड अब अंगड़ाई लेती जा रही है.
आग ज्यों ज्यों तेज़ होती जा रही है,
उन हवाओं को अखरती जा रही है.
राख में जो अब तलक खामोश थी,
आज अंगारे उगलती जा रही है.
ये हवा है तेज़ चाकू की तरह
पक्षियों के पर कतरती जा रही है.
चांद से शायद कहीं मतभेद है,
चांदनी छत पर उतरती जा रही है.
उसकी चुप है इक पहेली की तरह,
जितना सुलझाओ उलझती जा रही है.
एक चिंगारी सुलगती जा रही है.
सारी ऊंची कुर्सियां हिलने लगीं,
भीड अब अंगड़ाई लेती जा रही है.
आग ज्यों ज्यों तेज़ होती जा रही है,
उन हवाओं को अखरती जा रही है.
राख में जो अब तलक खामोश थी,
आज अंगारे उगलती जा रही है.
ये हवा है तेज़ चाकू की तरह
पक्षियों के पर कतरती जा रही है.
चांद से शायद कहीं मतभेद है,
चांदनी छत पर उतरती जा रही है.
उसकी चुप है इक पहेली की तरह,
जितना सुलझाओ उलझती जा रही है.
Monday, August 6, 2007
अपने हाथों का खिलौना न बनाना मुझको
अपने हाथों का खिलौना न बनाना मुझको ,
हो सके तो किसी मूरत सा सजाना मुझको.
मैं जो मिट्टी हूं तो एक बीज़ मिला दे मुझमें,
में हूं पत्थर तो अहिल्या सा बनाना मुझको.
बून्द हूं तो किसी दरिया में समा जाने दो ,
मैं जो दरिया हूं तो सागर में मिलाना मुझको.
हूं जो नफरत तो मुझे ,क़त्ल करके दफनाना,
मैं मोहब्बत हूं तो सीने से लगाना मुझको.
मैं जो आकाश दिखूं,ओढना चादर की तरह ,
दिखूं धरती तो, बिछौने सा बिछाना मुझको.
जो हूं कांटा तो मुझे दिल में छुपा कर रखना,
फूल हूं तो किसी मन्दिर में चढाना मुझको.
मैं हूं दोहा, तो किसी पाठ् सा पढ जाना मुझे,
मैं गज़ल हूं तो ज़रा झूम के गाना मुझको.
हो सके तो किसी मूरत सा सजाना मुझको.
मैं जो मिट्टी हूं तो एक बीज़ मिला दे मुझमें,
में हूं पत्थर तो अहिल्या सा बनाना मुझको.
बून्द हूं तो किसी दरिया में समा जाने दो ,
मैं जो दरिया हूं तो सागर में मिलाना मुझको.
हूं जो नफरत तो मुझे ,क़त्ल करके दफनाना,
मैं मोहब्बत हूं तो सीने से लगाना मुझको.
मैं जो आकाश दिखूं,ओढना चादर की तरह ,
दिखूं धरती तो, बिछौने सा बिछाना मुझको.
जो हूं कांटा तो मुझे दिल में छुपा कर रखना,
फूल हूं तो किसी मन्दिर में चढाना मुझको.
मैं हूं दोहा, तो किसी पाठ् सा पढ जाना मुझे,
मैं गज़ल हूं तो ज़रा झूम के गाना मुझको.
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