Thursday, September 27, 2007
Tuesday, September 25, 2007
तुम हो पहरेदार चमन के -उदय प्रताप सिंह्

राजनीति और साहित्य दो अलग अलग धारायें है. बहुत कम लोग ही मुझे मिले हैं जिनका दोनों से ही सम्बन्ध है. प्रो. उदय प्रताप सिंह एक ऐसी ही शख्सियत हैं समाज्वादी पार्टी के सांसद है. लोकसभा व राज्यसभा दोनो में रहे हैं. पिछले 18-19 वर्षों से सक्रिय राजनीति में हैं.
प्रो. उदय प्रताप सिंह का कविता से पुराना सम्बन्ध है. अध्यापक रहे हैं.पिछले 40-50 वर्षों से लगातार लिखते आ रहे हैं.मेरी प्रोफेसर उदय प्रताप जी से जान-पहचान लग्भग 17 वर्षों से है. फिलहाल मैं राजनीति में सक्रिय नहीं हूं फिर भी साहित्यिक,सांसकृतिक कार्यक्रमों में मुलाक़ात हो ही जाती है.
पिछले 11 अगस्त को मेरी संस्था " अक्ष" की ओर से एक साहित्यिक आयोजन था,जिसमें पुस्तक के लोकार्पण के अतिरिक्त लघु कवि सम्मेलन भी था. उदय प्रताप् जी आमंत्रित थे.उन्होने देशभक्ति से ओत-प्रोत एक रचना पढी जिसमे उन्होने चन्द्र शेखर आज़ाद की जनम्स्थली बदरका को प्रणाम कहा.मेरे विशेष अनुरोध पर उन्होने एक रचना पढी, जिसका सम्बन्ध लोकतंत्र की पहरेदारी से है. लोकतंत्र में जनता का एक सजग् प्रहरी के रूप में जो दायित्व है,उसी को रेखांकित करती है ये कविता.
उदय प्रताप सिंह जी की अनुमति लेकर यहां यह कविता संक्षिप्त रूप में प्रस्तुत है:
ऐसे नहीं जागकर बैठो तुम हो पहरेदार चमन के ,
चिंता क्या है सोने दो यदि सोते हैं सरदार चमन के.
वैसे भी ये बड़े लोग हैं, अक्सर धूप चढ़े जगते हैं
व्यवहारों से कहीं अधिक तस्वीरों में अच्छे लगते हैं
इनका है इतिहास गवाही जैसे सोये वैसे जागे
इनके स्वार्थ सचिव चलते हैं नई सुबह के रथ के आगे
माना कल तक तुम सोये थे लेकिन ये तो जाग रहे थे
फिर भी कहां चले जाते थे ,जाने सब उपहार चमन के
ऐसे नहीं जागकर बैठो.......
जिनको आदत है सोने की उपवन की अनुकूल हवा में
उनका अस्थिशेष भी उड जाता है बनकर धूल हवा में
लेकिन जो संघर्षों का सुख सिरहाने रखकर सोते हैं
युग के अंगडाई लेने पर वे ही पैगम्बर होते हैं
जो अपने को बीज बनाकर मिट्टी में मिलना सीखे हैं
सदियों तक उनके सांचे में ढ्लते हैं व्यवहार चमन के
ऐसे नहीं जागकर बैठो......
यह आवश्यक नहीं कि कल भी होगी ऐसी बात चमन में
ऐन बहारों में ठहरी है कांटों की बारात चमन में
कल की आने वाली कलियां पिछले खाते जमा करेंगी
तब इन कागज़ के फूलों की गलती कैसे क्षमा करेंगी
उस पर मेरी क़लम गवाही बिना सत्य के कुछ ना कहेगी
केवल बातों के सिक्के से चलते थे व्यापार चमन के
ऐसे नहीं जागकर बैठो...
( समारोह की पूरी रपट अलग से एक पोस्ट में दी जायेगी)
चित्र 1 : सर्व श्री पंडित सुरेश नीरव( मुख्य कौपी सम्पादक,कादम्बिनि पत्रिका ),भरत चतुर्वेदी, उदय प्रताप सिंह , अरविन्द चतुर्वेदी
चित्र 2:उदय प्रताप जी द्वारा डा. वालिया ( वित्त मंत्री, दिल्ली सरकार) का स्वागत ,साथ हैं उ.प्र.सरकार के मंत्री यश्वंत सिंह
चित्र 3 : मंच पर श्री उदय प्रताप सिंहका स्वागत केशव गान्धी द्वारा
चित्र 4: मंच पर पंडित सुरेश नीरव( मुख्य कौपी सम्पादक,कादम्बिनि पत्रिका ),भरत चतुर्वेदी, उदय प्रताप सिंह , अरविन्द चतुर्वेदी
Monday, September 24, 2007
शादी से पहले कितने अफेयर थे आपके ?
कल रात INDIA TV पर 'आप की अदालत' देख रहा था. कार्यक्रम में हास्य कलाकार राजू श्रीवास्तव की पेशी के अंतिम दौर में आमंत्रित श्रोताओं के प्रश्न पूछने की बारी आई. एक 10 वर्ष का बच्चा खड़ा हुआ .प्रश्न था कि " शादी से पहले आप के कितने अफेयर रहे थे ?"
में सन्न रह गया. इसलिये कि प्रश्न पूछने वाले की उम्र मात्र 10 वर्ष थी.
दस वर्ष की उम्र और ऐसा प्रश्न ?
(कंटेंट बिल का विरोध करने वालो .देख लो )
कम से कम कार्यक्रम के एडिटर को तो सोचना चाहिये. कोई लाइव प्रोगराम तो था नही.
राजू श्रीवास्तव भी भोंचक्क. यह क्या प्रश्न आया ,और आया भी तो किससे ?
उत्तर दिया- " यह बच्चो का प्रश्न नही है.जरूर इसे किसी और ने पुछ्वाया है ". फिर भी बता दिया कि जिससे मेरा अफेयर था ,उसी से शादी भी हो गयी.
यह मैने इसलिये लिखा है कि इससे आज कल के बच्चों की मानसिकता पता चलती है.
अभी मैने कुछ दिन पहले एक पोस्ट लिखी थी कि "टी वी देखकर समय से पहले बड़े हो रहे हैं बच्चे".
इस पोस्ट पर टिप्पणी में समीर लाल, नीरज दीवान ,सुरेश चिपलुंकर ,देवी एवं नीशू ने भी इस विषय पर चिंता जताई थी. मैं समझता हूं कि वर्तमान युग मैं हमारे समाज की बडी समस्याओं में से एक है यह - कि कैसे सामना करें हम अपनी संस्कृति पर होने वाले आक्रमणों का ?
कभी कभी हम बहुत खुश होते हैं कि हमारे बच्चे बहुत होशियार हैं .यह पीढ़ी पिछली पीढी से चार कदम आगे है. किंतु हर जगह आगे ही रहे ,इसमें खतरे हैं. हमें समय रहते चेत् जाना चाहिये .यही हमारे बच्चों के लिये बेहतर है.
में सन्न रह गया. इसलिये कि प्रश्न पूछने वाले की उम्र मात्र 10 वर्ष थी.
दस वर्ष की उम्र और ऐसा प्रश्न ?
(कंटेंट बिल का विरोध करने वालो .देख लो )
कम से कम कार्यक्रम के एडिटर को तो सोचना चाहिये. कोई लाइव प्रोगराम तो था नही.
राजू श्रीवास्तव भी भोंचक्क. यह क्या प्रश्न आया ,और आया भी तो किससे ?
उत्तर दिया- " यह बच्चो का प्रश्न नही है.जरूर इसे किसी और ने पुछ्वाया है ". फिर भी बता दिया कि जिससे मेरा अफेयर था ,उसी से शादी भी हो गयी.
यह मैने इसलिये लिखा है कि इससे आज कल के बच्चों की मानसिकता पता चलती है.
अभी मैने कुछ दिन पहले एक पोस्ट लिखी थी कि "टी वी देखकर समय से पहले बड़े हो रहे हैं बच्चे".
इस पोस्ट पर टिप्पणी में समीर लाल, नीरज दीवान ,सुरेश चिपलुंकर ,देवी एवं नीशू ने भी इस विषय पर चिंता जताई थी. मैं समझता हूं कि वर्तमान युग मैं हमारे समाज की बडी समस्याओं में से एक है यह - कि कैसे सामना करें हम अपनी संस्कृति पर होने वाले आक्रमणों का ?
कभी कभी हम बहुत खुश होते हैं कि हमारे बच्चे बहुत होशियार हैं .यह पीढ़ी पिछली पीढी से चार कदम आगे है. किंतु हर जगह आगे ही रहे ,इसमें खतरे हैं. हमें समय रहते चेत् जाना चाहिये .यही हमारे बच्चों के लिये बेहतर है.
Sunday, September 23, 2007
मिनि ब्लौगर( अचानक) मीट: पब्लिक के बीच में
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करुणानिधि या घृणा निधि

तमिल लिपि में क तथा ग के लिये एक ही अक्षर इस्तेमाल किया जाता है.उसी तरह ख तथा घ के लिये भी एक ही अक्षर है. जब उच्चारण करते है तो क, ख ग, अथवा घ में विशेष फर्क़ नहीं होता. इस के आधार पर ‘करुणा’ तथा ‘घृणा’ तमिल भाषा बोलने व लिखने वाले के लिये शब्दिक रूप में एक दूसरे से बहुत दूर नहीं कहे जा सकते.
तमिल नाड के मुख्यमंत्री एम घृणा निधि ने पिछले सप्ताह भग्वान राम के प्रति जो उद्गार व्यक्त किये है, वे यथा नाम तथा गुण ही सिद्ध करते हैं. यानि कि वह करुणा के निधि न होकर घृणा के ही निधि ( खज़ाना) हैं.
गलत स्त्रोत बताकर तथा ‘बाल्मिकि रामायण” से गलत उद्धरण देकर आखिरकार यह शख्स क्या सिद्ध करना चाहता है ? राम का सम्पूर्ण चरित इस अधम व्यक्ति के लिये एक कल्पना मात्र हैं ,जिसका कोई प्रमाण नही है. यहां तक ही होता गनीमत थी. यह श्ख्स कहता है कि राम सुरापान करते थे, सीता अपने आप रावण के साथ गयी क्यों कि वह उसे चाहती थी.
जो राम को मानना चाहे माने, न मानना चाहे ना माने. हमें इसॅसॆ कोई गुरेज़ नहीं. किंतु हैरानी है कि लोकतंत्रिक पद्धति से चुने गये इस व्यक्ति को अन्य ( उसके लिये-उत्तर भारत के लोग, राम भक्त, आस्थावान्, प्रार्थना रत अथवा रावण- वध करने वाले ) किसी की आस्था, विश्वास पर चोट करने का हक़ किसने दिया.
क्या मुख्य मंत्री किसी भी कनून से ऊपर है? इस घृणा की निधि द्वार दिये गये बयान Criminal Procedure Code (Cr PC की धारा 156(3) व Indian Penal Code की धारा 295 ए ( किसी अन्य की धार्मिक भावनाओं को जान-बूझ कर आहत करना) तथा धार व 298 ( धामिक भावनायें को चोटृ पहुंचाने सम्बन्धी बयान देना)का उल्लंघन है.
इस व्यक्ति व इसकी पार्टी का एक ही उद्देश्य है कि- उत्तर भारतीयॉ से घृणा, राम के नाम से घृणा, और हा इस घृणाको आगे फैलाने का प्रयास.
राम सेतु के मुद्दे पर जिस प्रकार करुणानिधि, टी आर बालू, तथा द्रमुक सरकार के अन्य मंत्री आर्कट वीरासामी ने जिस प्रकार के बयान दिये हैं, उससे तो ये लगता है कि कांग्रेस ने रामसेतु की सुपारी DMK को दे दी है.
गालियों का दुरुस्त जबाब
मैं तो समझता था कि ईर्ष्या ,डाह अथवा जलन एक भारतीय गुण ही है. परंतु भारत के आगे निकलकर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न व्यवसायों से जुडे लोगों के विचार सुनकर या पढ़कर आश्चर्य होता है.कुछ दिन पूर्व मैने अपनी एक पोस्ट पर टिप्पणी में लिखा था कि सचिन तेन्दुलकर की सफलता से गोरी चमड़ी (मेरा आशय क्रिकेट खेलने वाले देशों से ही है) के लोग थोडा जलते हैं. आज INDIA TV नामक CHANNEL पर एक 'विशेष' कार्यक्रम में आस्ट्रेलियाई खिलाडियों द्वारा भारतीय क्रिकेट टीम के उपहास एवं वरिष्ठ खिलाडियों - विशेषकर Sachin Tendulakar व Saurav Ganguli को चुन चुन कर दी गयी गालियां सुनकर बडा ताज्जुब हुआ. अफसोस भी क्यों कि क्रिकेट को एक Gentelman's game माना जाता रहा है. जब BCCI के अधिकारियों तक बात पहुंची तो उसकी तरफ से राजीव शुक्ल ने बचाव में एक बयान जारी कर दिया. BCCI की ओर से जारी बयान तो मात्र एक औपचारिकता ही है.
किंतु आस्ट्रेल्याई मौखिक गुंडा गर्दी का सबसे माक़ूल जबाब भारतीय 20-20 टीम ने दिया. कंगारू यह कहते नहीं थक रहे थे कि भारतीय टीम को धूल चटा देंगे, मसल कर रख देंगे ( they will make a mincemeat of indian team),आदि आदि. इस का जबाब खेल के मैदान में ही दिया जाना सबसे उचित था .
धोनी व भारतीय टीम ने ऐसी टीम को चारों खाने चित्त किया जो इस पूरे टूर्नामेंट की सबसे फेवरिट टीम बतायी जा रही थी तथा जिसका सट्टा बज़ार में भी सबसे कम भाव था. ज़िस भारतीय टीम को वे मसलने का सपना पाले थे , उसने उनके सही मानों में छक्के छुडाकर फाइनल् में प्रवेश किया.
भारतीय टीम इस अद्भुत विजय हेतु बधाई की पात्र तो है ही, इस बात के लिये विशॆष् बधाई की हक़्दार है कि आस्ट्रेलियाई घमंड को चूर किया ( वैसे कुछ दिन पूर्व ही ज़िम्बाब्वे की टीम उन्हें हराके चेतावनी दे गयी थी). परंतु रस्सी के जल जाने पर भी जो एंठन बची थी ,आज उसे निकाल कर भारतीय टीम ने कमाल का काम किया है.
हां फाइनल में जो होगा ( पाकिस्तान के साथ) देख लेंगे, परंतु शेर बनने वाले को बिल्ली बनाकर भेजना जरूरी था.
फिर कहना चाहता हूं- चक दे INDIA.
किंतु आस्ट्रेल्याई मौखिक गुंडा गर्दी का सबसे माक़ूल जबाब भारतीय 20-20 टीम ने दिया. कंगारू यह कहते नहीं थक रहे थे कि भारतीय टीम को धूल चटा देंगे, मसल कर रख देंगे ( they will make a mincemeat of indian team),आदि आदि. इस का जबाब खेल के मैदान में ही दिया जाना सबसे उचित था .
धोनी व भारतीय टीम ने ऐसी टीम को चारों खाने चित्त किया जो इस पूरे टूर्नामेंट की सबसे फेवरिट टीम बतायी जा रही थी तथा जिसका सट्टा बज़ार में भी सबसे कम भाव था. ज़िस भारतीय टीम को वे मसलने का सपना पाले थे , उसने उनके सही मानों में छक्के छुडाकर फाइनल् में प्रवेश किया.
भारतीय टीम इस अद्भुत विजय हेतु बधाई की पात्र तो है ही, इस बात के लिये विशॆष् बधाई की हक़्दार है कि आस्ट्रेलियाई घमंड को चूर किया ( वैसे कुछ दिन पूर्व ही ज़िम्बाब्वे की टीम उन्हें हराके चेतावनी दे गयी थी). परंतु रस्सी के जल जाने पर भी जो एंठन बची थी ,आज उसे निकाल कर भारतीय टीम ने कमाल का काम किया है.
हां फाइनल में जो होगा ( पाकिस्तान के साथ) देख लेंगे, परंतु शेर बनने वाले को बिल्ली बनाकर भेजना जरूरी था.
फिर कहना चाहता हूं- चक दे INDIA.
Friday, September 21, 2007
ओफिस (कार्यालय )में कैसे सोएं ?



कुछ लोग अपने कार्यालय में काम करने ही जाते है. कुछ लोग मात्र टाइमपास के लिये. कुछ कार्यालय को जनसम्पर्क करने हेतु एक बेहतर विकल्प के रूप में लेते हैं.कुछ लोग सब कुछ चाहते हैं मगर थोडा थोड़ा.
परंतु सचाई यह है कि , यदि अवसर प्राप्त हो तो, अधिकांश व्यक्ति ( दोनो पुरुष कर्मचारी व महिला कर्मचारी ) कुछ देर के लिये ही सही, काम के बीच में कुछ पल आनंद ,शांति के लिये निकालने से गुरेज़ नही करेंगे . .
मेरे एक मित्र है डा. करन भाटिया, रुड़की में हाइड्रोलोजी संस्थान में वैज्ञानिक हैं. आई आई टी बम्बई में ( 1977) में होस्टल में हम साथ साथ थे. अब मुलाकातें बहुत कम होती हैं ( पिछले 15 वर्ष में शायद दो ही बार मिले हैं). ई-मेल से सम्पर्क बना रहता है.
पिछले सप्ताह मुझे भाटिया जी ने प्यारे से कार्टूंस भेजे. वही सबके साथ share कर रहा हूं.
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Tuesday, September 18, 2007
जन्मतिथि एवम पुण्य तिथि पर काका हाथरसी को श्रद्धांजलि

आज हास्य रस के पुरोधा कवि श्री काका हाथरसी का जन्म दिन भी है और पुण्य तिथि भी. आज के दिन सन 1906 में काका का जन्म हुआ और सन 1995 में आज के ही दिन काका परलोक सिधार गये थे . कम लोगों को उनका असली नाम पता है- वह प्रभु दयाल गर्ग के नाम से जाने जाते थे ,परंतु काका नाम अधिक मशहूर हुआ. हास्य उनके जीवन का अभिन्न अंग था,उनकी जीवन शैली थी. वह हास्य को भरपूर जीते थे.
उनके इस सिद्धांत को रेखांकित करती कविता है-
डाक्टर वैद्य बता रहे ,कुदरत का कानून
जितना हंसता आदमी, उतना बढ़ता खून
उतना बढ़ता खून, हास्य मेँ की कंजूसी
सुन्दर सूरत मूरत पर छाई मनहूसी
कंह काका कवि,हास्य व्यंग्य जो पीते डट के,
रहती सदा बहार ,बुढापा पास न फटके.
काका की जनप्रिय पुस्तकों में -काका के कारतूस, काका की फुलझडियां, का का की कचहरी ,काक्दूत, काका के प्रहसन महामूर्ख सम्मेलन, चकल्ल्स,काका की चौपाल , आदि दर्जनों पुस्तकें है जिनके दर्जनों संस्करण बिक चुके हैं.
काका ने विशुद्ध हास्य लिखा, गुद्गुदाने वाले व्यंग्य को कविता में पिरोया.
उनकी 'विद्यार्थी' की परिभाषा इस प्रकार है
पूज्य पिता की नाक में डाले रहो नकेल
रेग्युलर होते रहो तीन साल तक फेल
तीन साल तक फेल. भाग्य चमकाता ज़ीरो
बहुत शीघ्र बन जाओगे कालेज के हीरो
कह काका कविराय ,वही सच्चा विद्यार्थी
जो निकाल कर दिखला दे विद्या की अर्थी.
काका की कलम से कोई विषय अछूता नही रहा. रिश्वत पर उन्होने ये लिखा--
रिश्वत रानी धन्य तू तेरे अगणित नाम
हक्-पानी उपहार औ बख्शीश ,घूस इनाम
बख्शीश ,घूस इनाम ,भेंट, नज़राना, पगडी
तेरे कारण खाऊ मल की इनकम तगडी
कह काका कविराय ,दौर दौरा दिन दूना
जहां नहीं तू देवी,वह महकमा है सूना.
मेरी हार्दिक श्रद्धांजलि.
लेबल:
kaka hathrasi,
poet,
काका हाथरसी
Monday, September 17, 2007
टी वी देखकर समय से पहले बड़े हो रहे हैं बच्चे

एक टीवी कार्यक्रम मे ग्यारह वर्षीया बच्ची ने मोहक नृत्य प्रस्तुत किया . विशेषज्ञ पैनल सदस्य ने आलोचना के बाद कहा कि अब एक धुन बजेगी, धुन वाला फिल्मी गाना पहचान कर उस पर नृत्य करके दिखाना होगा. फिर यादों की बारात फिल्म का एक लोक्प्रिय गाना बजाया गया. बच्ची उसे नहीं पहचान पाई. एंकर महिला ने संगीतज्ञों से कहा "कोई ऐसा गाना बजायॆ, जिससे बच्चे रिलेट कर सकें तथा आसानी से पहचान कर सकें". फ़िर गाने की धुन बजी ' भीगे होंठ तेरे प्यासा मन मेरा, लगे अभ्र सा मुझे तन तेरा, कभी मेरे साथ एक रात गुजार,...'. झट से बच्चे ने गाना पहचान लिया.
ये है आजकल की नई पीढी.
उसी कार्यक्रम में बच्चों के मुख से गाये जाने वाले और गाने कैसे होंगे, सहज ही अन्दाज़ा लगाया जा सकता है.
कुछ समय पहले मैने 'अमूल मैचो अंडर वीयर' के विज्ञापन पर एक पोस्ट लिखकर उसे अश्लील की संज्ञा दी थी.मेरे एक प्रोफेसर मित्र ने उस समय यही कहा था,जो इस पोस्ट का शीर्षक है-टी वी देखकर समय से पहले बड़े हो रहे हैं बच्चे .
अभी पूर्व भारत के एक नगर में पुलिस ने कुछ सार्वजनिक पार्कॉं में छापे मार कर अश्लील हरकतें करते हुए कुछ नाबालिग बच्चों को पकडा था.
ये है आजकल की नई पीढी.
स्कूलों में आये दिन होने वाली सांस्कृतिक कार्यक्रमों में ' चोली के पीछे ...से लेकर,कांटा लगा ..जैसे लोकप्रिय गानों पर नृत्य करते आठवर्ष से लेकर बारह वर्ष की आयु वाले बच्चे मिल जायेंगे. इन्हे ये गाने गाने की प्रेरणा भी अपने शिक्षकों से ही मिली होगी ये भी सच है.
हिन्दी के अनेक चैनलों पर इस प्रकार के कार्यक्रम हैं .बूगी वूगी, छोटे उस्ताद, होन्हार, आदि कार्यक्रम मूलत: बच्चों में छिपे टेलेंट को बाहर लाने के लिये भले हों, किंतु क्या इन्हे अनियंत्रित करके हम बच्चों के असमय जवान नहीं बना रहे ?
दोष किसका है? टेलीविजन का ? या हम सबका ?
Thursday, September 13, 2007
वो इत्र लगाकर ,इस तरह अकड़ता क्यूं है ?
ख्वाब कांटों की तरह आंख में गड़ता क्यूं है ?
तमाम चेहरों से चिपकी हुई जड़ता क्यूं है ?
हमें मालूम है खुशबू कहां से लाया है .
वो इत्र लगाकर ,इस तरह अकड़ता क्यूं है ?
कि जिसके पढ़ने से नफरत में डूब जाता है,
तू ऐसे मज़हबों की पुस्तकें पढ़ता क्यूं है ?
बिखर क्यूं जाता है, हर बार इकट्ठा होकर ,
तुम्हारा कुनबा बार बार उजड़ता क्यूं है ?
ये सच और झूठ का झगड़ा नहीं मिटने वाला,
तू ख्वाम्खां के सवालात में पड़ता क्यूं है ?
हरेक शख्स पे उंगली उठाई है तुमने ,
किसी ने तुझ पे उठाई तो बिगड़ता क्यूं है ?
साथ खुशियों में निभाया है मेरा आज तलक ,
आज जब गम का ये साया है, बिछड़ता क्यूं है ?
तमाम चेहरों से चिपकी हुई जड़ता क्यूं है ?
हमें मालूम है खुशबू कहां से लाया है .
वो इत्र लगाकर ,इस तरह अकड़ता क्यूं है ?
कि जिसके पढ़ने से नफरत में डूब जाता है,
तू ऐसे मज़हबों की पुस्तकें पढ़ता क्यूं है ?
बिखर क्यूं जाता है, हर बार इकट्ठा होकर ,
तुम्हारा कुनबा बार बार उजड़ता क्यूं है ?
ये सच और झूठ का झगड़ा नहीं मिटने वाला,
तू ख्वाम्खां के सवालात में पड़ता क्यूं है ?
हरेक शख्स पे उंगली उठाई है तुमने ,
किसी ने तुझ पे उठाई तो बिगड़ता क्यूं है ?
साथ खुशियों में निभाया है मेरा आज तलक ,
आज जब गम का ये साया है, बिछड़ता क्यूं है ?
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