Thursday, October 18, 2007

'एंटर एट योर ओन रिस्क'


उम्दा लकडी के केबिन में प्रवेश के लिये अपार्दर्शी शीशे का दरवाजा.दरवाजे के बीचोबीच लगी एक तख्ती ,जिस पर लिखी हुई रहस्यमयी सी इबारत- " enter at your own risk.Everything is going wrong today".( अर्थात अन्दर आना जोखिम भरा हो सकता है,आज सब कुछ गलत सलत हो रहा है ) देखने वाला एक बार तो चौंक ही जाय. अगर आपने यह तख्ती पढने के बाद भी केबिन में जाने की हिम्मत की तो दरवाजा खोलते ही सामने की दीवार पर एक और तख्ती "come on in, everything else has gone wrong". ( अन्दर आइये, बाकी सब कुछ गडबड है ).

जी हां, यह केबिन था डा. राजेन्द्र कुमार पचौरी का. हैदराबाद स्थित एड्मिनिस्ट्रेटिव स्टाफ कौलेज औफ इंडिया ( ASCI) में डा. पचौरी senior faculty member थे .शायद 1980 तक. वही आर.के.पचौरी, जिनके नेट्रत्व में चलने वाले अंतरऋअष्ट्रीय संस्थान IPCC को इस वर्ष के नोबल पुरुस्कार के लिये चुना गया है.

1977 में मैं आई आई टी बम्बई में रिसर्च स्कौलर था. Hyderabad के Administrative Staff College of India जैसी प्रसिद्ध संस्था से Project Associate पद हेतु प्रस्ताव आया तो तुरंत तैयार हो गया. मई 1977 में जोइन किया. पहले ही दिन अपने कार्यालय से बाहर निकला तो बगल के केबिन पर निगाह गयी जहां वो तख्ती लगी हुई ठीक जिसका मैने शुरु में जिक्र किया .मैं प्रोजेक्ट एसोसिअट था, वह भी नया नया. हिम्मत नही हुई . बाद में मेरे अन्य सहयोगी भारत भूषण ( जो आगे चल कर Hindustan Times के सम्पादक पद पर भी पहुंचे) ने पचौरी साहब से परिचय कराया. मै Economics Area था, जबकि भारत भूषन Opeartions Management एरिया मे, जिसके प्रमुख थे डा. पचौरी.

फिर तो रोज़ का मिलना . शायद 1980 तक, जब तक डा. पचौरी वहां रहे. फिर अचानक पता लगा कि टाटा समूह ने एक कोष स्थापित करके दिल्ली में नया संस्थान खोला है " टाटा एनर्जी रिसर्च इंस्टिटयूट" ( जो बाद में TERI के नाम से मशहूर हुआ. बाद में शायद टाटा के हाथ खींच लेने के कारण ,TERI का नाम बदलकर The Energy Research Institute हो गया.

1977 से आजतक, डा. पचौरी की वेश भूषा, चाल ढाल में कोई परिवर्तन नहीं. अथक लगन. नितांत स्पष्ट ध्येय, लक्ष्य एकदम साफ. ऊर्जा सम्बन्धी लगभग सभी सरकारी फैसलों की पृष्ठभूमि में डा. पचौरी की सोच व लौबीयिंग. पर्यावरण से जुडे हर मुदे पर सबसे पहली राय डा. पचौरी की ही होती आयी है,पिछले तीस वर्षो में. मैने अपना पहला शोध पत्र " the substitution of energy and energy inputs in manufacturing industries" भी डा. पचौरी से प्रेरित होकर ही लिखा था 1978 में. हालांकि बाद में मैं commercial research की तरफ मुड गया और एक advertising agency में market research division में कार्य सम्हाल लिया.

डा. पचौरी ने अपनी लगन, मेहनत से विश्व एवं भारत मे नाम कमाया है. ईश्वर करें वह और सफलता अर्जित करते रहें तथा देश का नाम रोशन करें.

Tuesday, October 9, 2007

सौ करोड की रैली और कांशीराम्


कल 9 अक्टूबर बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशीराम की पुण्यतिथि के अवसर पर बसपा की ओर से एक विशाल रैली लख्ननऊ में आयोजित होने जा रही है. बहन मायावति ने इसे 'सावधान रहो, आगे बढ़ो' रैली का नाम दिया है. इस रैली पर सौ करोड रु. खर्च होने का अनुमान है. ऐसा भी बताया गया है कि इस अवसर पर कांशीराम के नाम पर लगभग 4000 करोड रु. की परियोजनाओं की घोषणा की जायेगी.
समाज की बेहतरी के लिये प्रस्तावित सभी परियोजनाओं का स्वागत है. किंतु मायावती की मंशा कांशीराम को भीम राव अम्बेडकर के बराबर खडा करने की अधिक लगती है. सावधान रहो-पर किससे ? अब सरकार आपकी सोशल इंजीनीयरिंग के चलते आ गयी. जिससे आपको सबसे अधिक खतरा था- तिलक तराजू और तलवार-वे भी आपके साथ आ गये ( कब तक, ये अलग बात है).
आगे बढो- मतलब यूपी के आगे. हां ये सपना तो ठीक है. परंतु इसके लिये सौ करोड रु. का खर्च ?

यदि यही सौ करोड रु. रैली पर खर्च न करके उन परिवारों के लिये खर्च किये जाते जो, राजनीति से तो कही नहीं ज़ुडे -परंतु जिनके घर कब चूल्हा जलेगा कब नही-उन्हे भी पता नहीं. इस रैली के बलबूते मायावती जी कितनी 'आगे बढेंगी' कहना अभी तो मुश्किल है, परंतु, यदि कुछ अत्यंत निर्धन परिवरों की पहचान करके ये सौ करोड उनमे बांटे जाते तो वे परिवार निश्चित्त ही आगे बढ जाते.शायद कांशीराम जी की आत्मा को भी ज्यादा शांति प्राप्त होती.

Sunday, October 7, 2007

क्या चिट्ठाकारी डायरी लेखन है ?

पिछले रविवार को हिन्द युग्म के शैलेश भाई से भेंट हुई. वे हिन्द युग्म की पुरस्कार योजना में पुरस्कृत कवियों को देने के लिये मेरे कविता संग्रह की प्रतियां लेने आये थे. ( यूं मज़ाक में इसे चिट्ठाकर मिलन भी कह सकते हैं). बात चीत हिन्द युग्म के प्रयासों को लेकर शुरू हुई. शैलेश भाई ने आगे की कुछ योजनाओं की भी बात की. मेरी राय में शैलेश में गज़ब का उत्साह भी है और अद्भुत जीवट भी. मेरा मानना है कि यदि इस तरह के प्रतिबद्ध लोग हिन्दी को मिलते रहें तो न केवल भाषा का बल्कि, अंतर्जाल पर भी हिन्दी का भविष्य उज्ज्वल है.

बातचीत के क्रम मे हिन्दी चिट्ठाकारों के बीच समय समय पर उठते विवादों , aggregators की भूमिका, नये एग्ग्रीगटर्स पर भी चर्चा हुई. विवादों पर मेरी राय थी कि इसमें दोनों ही पक्ष दोषी हैं . मैने शैलेश को बताया कि मेरी राय में चिट्ठाकारी कुछ कुछ डायरी लेखन की तरह ही है. बस फर्क़ ये है कि डायरी हम आम तौर पर दूसरों को दिखाने के लिये नही लिखते. ( क्या वाकई ?- यदि ऐसा होता तो डायरी लेखन में भी प्रतिष्ठित व्यक्ति झूठ की मिलावट नहीं करते. हालांकि यह अलग विवाद का विषय है). जब कि blogging is like leaving your personal diary for public exposure. जिस तरह डायरी में हम अपने निजी विचार व्यक्त करते है ,बिना किसी प्रतिबन्ध के, उसी प्रकार ब्लौग पर भी हम अप्ने विचार सार्वजनिक रूप से व्यक्त करते हैं.डायरी और चिट्ठे में पहला अंतर तो यह है कि यदि हम पाखंड का सहारा न लेकर ईमानदारी से अपनी मन की सोच को ब्लोग पर व्यक्त करते है, तो यह लगभग डायरी लेखन ही हुआ. दूसरा अंतर तात्कालिकता को लेकर है. डायरी लिखने के तुरंत बाद सार्वजनिक नही होती ( या की जाती), जबकि ब्लौग पर हम जो भी लिखते है, चाहते भी हैं कि यह तुरंत लोगों की नज़र में भी आ जाये ( यहीं पर एग्ग्रेगेटर्स् की भूमिका है) ऐसे ब्लौग्गर कम ही होंगे जो ब्लौग पर अपनी पोस्ट सिर्फ स्वांत: सुखाय ही लिखते हैं. ( शायद ऐसे ही ब्लौग्गर को किसी एग्ग्रीगटर पर पंजीकरण की आवश्यकता नहीं होती होगी).

शैलेश भाई को में अपनी बात समझा रहा था कि किसी ब्लौग्गर को किसी अन्य ब्लौग्गर की पोस्ट पर undully harsh टिप्पणी करने से बचना चाहिये. प्रतिक्रिया देना एक बात है, टांग खिंचाई ( व्यंग की भाषा मे, भी ठीक समझी जा सकती है), परंतु, अनावश्यक विवाद से बचना ही श्रेयस्कर है. कम से कम में तो ये ही मानता हूं.

मैं यह कदापि नहीं कह रहा कि हमें ब्लौग सिर्फ पढना चाहिये और टिप्पण से बचना चाहिये. ( नही, बल्कि मै तो यहां सारथी जी से पूर्ण सहमत हूं कि अधिक से अधिक टिप्पणी देना भी ब्लोग्गिंग मुख्य उद्देश्य है.) अनावश्यक , सिर्फ विवाद पैदा करने की दृष्टि से की गयी वे टिप्पणियां जिनमें भाषा की मर्यादा रेखा भी लांघ दी जाती है, को में अनुचित मानता हूं.
हालांकि शैलेश भारतवासी के साथ हुई बातचीत में कुछ विशॆष विवादों तथा चिट्ठों का जिक्र भी आया था, परंतु वह यहां जान बूझकर नहीं दिया गया.

मैं बहुत अनुभवी चिट्ठाकर तो हूं नही, अत: बेहतर हो यदि कुछ अनुभवी व जानकार चिट्ठाकर इस पर प्रकाश डालें.

कम से कम में तो इसे अंन्यथा नहीं लूंगा.

Tuesday, September 25, 2007

तुम हो पहरेदार चमन के -उदय प्रताप सिंह्







राजनीति और साहित्य दो अलग अलग धारायें है. बहुत कम लोग ही मुझे मिले हैं जिनका दोनों से ही सम्बन्ध है. प्रो. उदय प्रताप सिंह एक ऐसी ही शख्सियत हैं समाज्वादी पार्टी के सांसद है. लोकसभा व राज्यसभा दोनो में रहे हैं. पिछले 18-19 वर्षों से सक्रिय राजनीति में हैं.
प्रो. उदय प्रताप सिंह का कविता से पुराना सम्बन्ध है. अध्यापक रहे हैं.पिछले 40-50 वर्षों से लगातार लिखते आ रहे हैं.मेरी प्रोफेसर उदय प्रताप जी से जान-पहचान लग्भग 17 वर्षों से है. फिलहाल मैं राजनीति में सक्रिय नहीं हूं फिर भी साहित्यिक,सांसकृतिक कार्यक्रमों में मुलाक़ात हो ही जाती है.
पिछले 11 अगस्त को मेरी संस्था " अक्ष" की ओर से एक साहित्यिक आयोजन था,जिसमें पुस्तक के लोकार्पण के अतिरिक्त लघु कवि सम्मेलन भी था. उदय प्रताप् जी आमंत्रित थे.उन्होने देशभक्ति से ओत-प्रोत एक रचना पढी जिसमे उन्होने चन्द्र शेखर आज़ाद की जनम्स्थली बदरका को प्रणाम कहा.मेरे विशेष अनुरोध पर उन्होने एक रचना पढी, जिसका सम्बन्ध लोकतंत्र की पहरेदारी से है. लोकतंत्र में जनता का एक सजग् प्रहरी के रूप में जो दायित्व है,उसी को रेखांकित करती है ये कविता.
उदय प्रताप सिंह जी की अनुमति लेकर यहां यह कविता संक्षिप्त रूप में प्रस्तुत है:


ऐसे नहीं जागकर बैठो तुम हो पहरेदार चमन के ,
चिंता क्या है सोने दो यदि सोते हैं सरदार चमन के.
वैसे भी ये बड़े लोग हैं, अक्सर धूप चढ़े जगते हैं
व्यवहारों से कहीं अधिक तस्वीरों में अच्छे लगते हैं
इनका है इतिहास गवाही जैसे सोये वैसे जागे
इनके स्वार्थ सचिव चलते हैं नई सुबह के रथ के आगे
माना कल तक तुम सोये थे लेकिन ये तो जाग रहे थे
फिर भी कहां चले जाते थे ,जाने सब उपहार चमन के
ऐसे नहीं जागकर बैठो.......


जिनको आदत है सोने की उपवन की अनुकूल हवा में
उनका अस्थिशेष भी उड जाता है बनकर धूल हवा में
लेकिन जो संघर्षों का सुख सिरहाने रखकर सोते हैं
युग के अंगडाई लेने पर वे ही पैगम्बर होते हैं
जो अपने को बीज बनाकर मिट्टी में मिलना सीखे हैं
सदियों तक उनके सांचे में ढ्लते हैं व्यवहार चमन के
ऐसे नहीं जागकर बैठो......


यह आवश्यक नहीं कि कल भी होगी ऐसी बात चमन में
ऐन बहारों में ठहरी है कांटों की बारात चमन में
कल की आने वाली कलियां पिछले खाते जमा करेंगी
तब इन कागज़ के फूलों की गलती कैसे क्षमा करेंगी
उस पर मेरी क़लम गवाही बिना सत्य के कुछ ना कहेगी
केवल बातों के सिक्के से चलते थे व्यापार चमन के
ऐसे नहीं जागकर बैठो...

( समारोह की पूरी रपट अलग से एक पोस्ट में दी जायेगी)

चित्र 1 : सर्व श्री पंडित सुरेश नीरव( मुख्य कौपी सम्पादक,कादम्बिनि पत्रिका ),भरत चतुर्वेदी, उदय प्रताप सिंह , अरविन्द चतुर्वेदी
चित्र 2:उदय प्रताप जी द्वारा डा. वालिया ( वित्त मंत्री, दिल्ली सरकार) का स्वागत ,साथ हैं उ.प्र.सरकार के मंत्री यश्वंत सिंह
चित्र 3 : मंच पर श्री उदय प्रताप सिंहका स्वागत केशव गान्धी द्वारा
चित्र 4: मंच पर पंडित सुरेश नीरव( मुख्य कौपी सम्पादक,कादम्बिनि पत्रिका ),भरत चतुर्वेदी, उदय प्रताप सिंह , अरविन्द चतुर्वेदी

Monday, September 24, 2007

शादी से पहले कितने अफेयर थे आपके ?

कल रात INDIA TV पर 'आप की अदालत' देख रहा था. कार्यक्रम में हास्य कलाकार राजू श्रीवास्तव की पेशी के अंतिम दौर में आमंत्रित श्रोताओं के प्रश्न पूछने की बारी आई. एक 10 वर्ष का बच्चा खड़ा हुआ .प्रश्न था कि " शादी से पहले आप के कितने अफेयर रहे थे ?"

में सन्न रह गया. इसलिये कि प्रश्न पूछने वाले की उम्र मात्र 10 वर्ष थी.
दस वर्ष की उम्र और ऐसा प्रश्न ?
(कंटेंट बिल का विरोध करने वालो .देख लो )
कम से कम कार्यक्रम के एडिटर को तो सोचना चाहिये. कोई लाइव प्रोगराम तो था नही.
राजू श्रीवास्तव भी भोंचक्क. यह क्या प्रश्न आया ,और आया भी तो किससे ?
उत्तर दिया- " यह बच्चो का प्रश्न नही है.जरूर इसे किसी और ने पुछ्वाया है ". फिर भी बता दिया कि जिससे मेरा अफेयर था ,उसी से शादी भी हो गयी.

यह मैने इसलिये लिखा है कि इससे आज कल के बच्चों की मानसिकता पता चलती है.

अभी मैने कुछ दिन पहले एक पोस्ट लिखी थी कि "टी वी देखकर समय से पहले बड़े हो रहे हैं बच्चे".
इस पोस्ट पर टिप्पणी में समीर लाल, नीरज दीवान ,सुरेश चिपलुंकर ,देवी एवं नीशू ने भी इस विषय पर चिंता जताई थी. मैं समझता हूं कि वर्तमान युग मैं हमारे समाज की बडी समस्याओं में से एक है यह - कि कैसे सामना करें हम अपनी संस्कृति पर होने वाले आक्रमणों का ?

कभी कभी हम बहुत खुश होते हैं कि हमारे बच्चे बहुत होशियार हैं .यह पीढ़ी पिछली पीढी से चार कदम आगे है. किंतु हर जगह आगे ही रहे ,इसमें खतरे हैं. हमें समय रहते चेत् जाना चाहिये .यही हमारे बच्चों के लिये बेहतर है.

Sunday, September 23, 2007

मिनि ब्लौगर( अचानक) मीट: पब्लिक के बीच में

दिल्ली और अनेक स्थानों पर ब्लौगर मीट अक्सर चर्चा का विषय बनती रही है. इनमे से एक ( बड़ी मीट –दिल्ली –जुलाई 07) पर मैने भी एक (अ)रपट लिखी थी. मुझे नहीं पता कि ब्लौगर मीट में अधिकतम हिस्सेदारी का रिकार्ड क्या है.शायद जुलाई वाली मीट ने ही रिकौर्ड बनाय था. अब छोटी सी छोटी मीट का रिकार्ड पूछने की आवश्यकता नही. जाहिर है कि न्यूनतम संख्या दो ही होगी. ( य़दि किसी ब्लौगर मीट में दो से भी कम ब्लौगर आयें , इस का मतलब है कि ऐसी रपट करने वाला खुद फंतासी के अधार पर ही रपट बना रहा होगा ). जिस मीट का मॅं यहां जिक्र करने जा रहा हूं, वह सम्पन्न हुई 20 सितम्बर 07 को, दिल्ली के द्वारका क्षेत्र में, और इस मीट में सिर्फ दो ही ब्लौगर शामिल हुए. ( अभी मात्र एक माह पूर्व हमारे एक ब्लौगर साथी ने दो ब्लौगरों की एक काल्पनिक मुलाक़ात् पर एक धांसू व्यब्ग्य से भरपूर् पोस्ट भी लिखी थी.,)फिर भी मैं यह रिपोर्ट लिख रहा हूं. द्वारका ,नई दिल्ली के महाराष्ट्र मित्र मंडल द्वारा प्रत्येक वर्ष गणेशोत्सव मनाया जाता रहा है.इस वर्ष भी 16 सितम्बर से 23 सित्रम्बर तक यह उत्सव मनाया गया. इस उत्सव के अंतर्गत 20 सितम्बर को एक कवि सम्मेलन आयोजित किया गया था तथा इस कार्यक्रम की सन्योजक थीं डा. कीर्ति काले. अब प्रश्न है कि इससे ब्लौगरों को क्या ? हां मैं उसी मीट पर आ रहा हूं . हुआ यूं कि कीर्ति जी ने हिन्दी अकदमी के सहयोग से आयोजित इस कवि सम्मेलन के लिये कवियों को आमंत्रित किया था, जिसमे एक हिन्दी ब्लौगर सुनीता (चोटिया) शन्नू कवि के रूप में शामिल थी. वहीं दूसरी ओर स्वतंत्र रूप से मुझे ( अरविन्द चतुर्वेदी) भी कविता पाठ हेतु आमंत्रित कर रखा था. निर्धारित समय पर जब सब कवि उपस्थित हुए तो इसमें दो हिन्दी ब्लौगर भी आमने-सामने हुए. पहले मंच के बाहर, फिर मंच पर , और फिर रात लग्भग 12 बजे भोजन पर यह मीट सम्पन्न हुई. हां ब्लौगरी पर चर्चा नही हुई पर कविता पर जरूर् हुई. यह मिनि मीट ‘अचानक’ इसलिये कही गयी क्यों कि दोनो ही ब्लौगरों को पहले से पता नही था कि मीट होने वाली है. क़वि सम्मेलन में मैने हास्य रचनायें प्रस्तुत की तथा सुनीता जी ने ‘कन्यादान’ विषय पर एक भावुक रचना प्रस्तुत की. मीट के अवसर पर दोनो ब्लौगरों के ( अ-ब्लौगर) जीवन साथी भी उपस्थित रहे. लो हो गयी मीट की एक और रपट.

करुणानिधि या घृणा निधि


तमिल लिपि में क तथा ग के लिये एक ही अक्षर इस्तेमाल किया जाता है.उसी तरह ख तथा घ के लिये भी एक ही अक्षर है. जब उच्चारण करते है तो क, ख ग, अथवा घ में विशेष फर्क़ नहीं होता. इस के आधार पर ‘करुणा’ तथा ‘घृणा’ तमिल भाषा बोलने व लिखने वाले के लिये शब्दिक रूप में एक दूसरे से बहुत दूर नहीं कहे जा सकते.
तमिल नाड के मुख्यमंत्री एम घृणा निधि ने पिछले सप्ताह भग्वान राम के प्रति जो उद्गार व्यक्त किये है, वे यथा नाम तथा गुण ही सिद्ध करते हैं. यानि कि वह करुणा के निधि न होकर घृणा के ही निधि ( खज़ाना) हैं.
गलत स्त्रोत बताकर तथा ‘बाल्मिकि रामायण” से गलत उद्धरण देकर आखिरकार यह शख्स क्या सिद्ध करना चाहता है ? राम का सम्पूर्ण चरित इस अधम व्यक्ति के लिये एक कल्पना मात्र हैं ,जिसका कोई प्रमाण नही है. यहां तक ही होता गनीमत थी. यह श्ख्स कहता है कि राम सुरापान करते थे, सीता अपने आप रावण के साथ गयी क्यों कि वह उसे चाहती थी.
जो राम को मानना चाहे माने, न मानना चाहे ना माने. हमें इसॅसॆ कोई गुरेज़ नहीं. किंतु हैरानी है कि लोकतंत्रिक पद्धति से चुने गये इस व्यक्ति को अन्य ( उसके लिये-उत्तर भारत के लोग, राम भक्त, आस्थावान्, प्रार्थना रत अथवा रावण- वध करने वाले ) किसी की आस्था, विश्वास पर चोट करने का हक़ किसने दिया.
क्या मुख्य मंत्री किसी भी कनून से ऊपर है? इस घृणा की निधि द्वार दिये गये बयान Criminal Procedure Code (Cr PC की धारा 156(3) व Indian Penal Code की धारा 295 ए ( किसी अन्य की धार्मिक भावनाओं को जान-बूझ कर आहत करना) तथा धार व 298 ( धामिक भावनायें को चोटृ पहुंचाने सम्बन्धी बयान देना)का उल्लंघन है.
इस व्यक्ति व इसकी पार्टी का एक ही उद्देश्य है कि- उत्तर भारतीयॉ से घृणा, राम के नाम से घृणा, और हा इस घृणाको आगे फैलाने का प्रयास.
राम सेतु के मुद्दे पर जिस प्रकार करुणानिधि, टी आर बालू, तथा द्रमुक सरकार के अन्य मंत्री आर्कट वीरासामी ने जिस प्रकार के बयान दिये हैं, उससे तो ये लगता है कि कांग्रेस ने रामसेतु की सुपारी DMK को दे दी है.

गालियों का दुरुस्त जबाब

मैं तो समझता था कि ईर्ष्या ,डाह अथवा जलन एक भारतीय गुण ही है. परंतु भारत के आगे निकलकर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न व्यवसायों से जुडे लोगों के विचार सुनकर या पढ़कर आश्चर्य होता है.कुछ दिन पूर्व मैने अपनी एक पोस्ट पर टिप्पणी में लिखा था कि सचिन तेन्दुलकर की सफलता से गोरी चमड़ी (मेरा आशय क्रिकेट खेलने वाले देशों से ही है) के लोग थोडा जलते हैं. आज INDIA TV नामक CHANNEL पर एक 'विशेष' कार्यक्रम में आस्ट्रेलियाई खिलाडियों द्वारा भारतीय क्रिकेट टीम के उपहास एवं वरिष्ठ खिलाडियों - विशेषकर Sachin Tendulakar व Saurav Ganguli को चुन चुन कर दी गयी गालियां सुनकर बडा ताज्जुब हुआ. अफसोस भी क्यों कि क्रिकेट को एक Gentelman's game माना जाता रहा है. जब BCCI के अधिकारियों तक बात पहुंची तो उसकी तरफ से राजीव शुक्ल ने बचाव में एक बयान जारी कर दिया. BCCI की ओर से जारी बयान तो मात्र एक औपचारिकता ही है.
किंतु आस्ट्रेल्याई मौखिक गुंडा गर्दी का सबसे माक़ूल जबाब भारतीय 20-20 टीम ने दिया. कंगारू यह कहते नहीं थक रहे थे कि भारतीय टीम को धूल चटा देंगे, मसल कर रख देंगे ( they will make a mincemeat of indian team),आदि आदि. इस का जबाब खेल के मैदान में ही दिया जाना सबसे उचित था .
धोनी व भारतीय टीम ने ऐसी टीम को चारों खाने चित्त किया जो इस पूरे टूर्नामेंट की सबसे फेवरिट टीम बतायी जा रही थी तथा जिसका सट्टा बज़ार में भी सबसे कम भाव था. ज़िस भारतीय टीम को वे मसलने का सपना पाले थे , उसने उनके सही मानों में छक्के छुडाकर फाइनल् में प्रवेश किया.

भारतीय टीम इस अद्भुत विजय हेतु बधाई की पात्र तो है ही, इस बात के लिये विशॆष् बधाई की हक़्दार है कि आस्ट्रेलियाई घमंड को चूर किया ( वैसे कुछ दिन पूर्व ही ज़िम्बाब्वे की टीम उन्हें हराके चेतावनी दे गयी थी). परंतु रस्सी के जल जाने पर भी जो एंठन बची थी ,आज उसे निकाल कर भारतीय टीम ने कमाल का काम किया है.

हां फाइनल में जो होगा ( पाकिस्तान के साथ) देख लेंगे, परंतु शेर बनने वाले को बिल्ली बनाकर भेजना जरूरी था.

फिर कहना चाहता हूं- चक दे INDIA.

Friday, September 21, 2007

ओफिस (कार्यालय )में कैसे सोएं ?




कुछ लोग अपने कार्यालय में काम करने ही जाते है. कुछ लोग मात्र टाइमपास के लिये. कुछ कार्यालय को जनसम्पर्क करने हेतु एक बेहतर विकल्प के रूप में लेते हैं.कुछ लोग सब कुछ चाहते हैं मगर थोडा थोड़ा.

परंतु सचाई यह है कि , यदि अवसर प्राप्त हो तो, अधिकांश व्यक्ति ( दोनो पुरुष कर्मचारी व महिला कर्मचारी ) कुछ देर के लिये ही सही, काम के बीच में कुछ पल आनंद ,शांति के लिये निकालने से गुरेज़ नही करेंगे . .
मेरे एक मित्र है डा. करन भाटिया, रुड़की में हाइड्रोलोजी संस्थान में वैज्ञानिक हैं. आई आई टी बम्बई में ( 1977) में होस्टल में हम साथ साथ थे. अब मुलाकातें बहुत कम होती हैं ( पिछले 15 वर्ष में शायद दो ही बार मिले हैं). ई-मेल से सम्पर्क बना रहता है.
पिछले सप्ताह मुझे भाटिया जी ने प्यारे से कार्टूंस भेजे. वही सबके साथ share कर रहा हूं.