Tuesday, September 18, 2007

जन्मतिथि एवम पुण्य तिथि पर काका हाथरसी को श्रद्धांजलि


आज हास्य रस के पुरोधा कवि श्री काका हाथरसी का जन्म दिन भी है और पुण्य तिथि भी. आज के दिन सन 1906 में काका का जन्म हुआ और सन 1995 में आज के ही दिन काका परलोक सिधार गये थे . कम लोगों को उनका असली नाम पता है- वह प्रभु दयाल गर्ग के नाम से जाने जाते थे ,परंतु काका नाम अधिक मशहूर हुआ. हास्य उनके जीवन का अभिन्न अंग था,उनकी जीवन शैली थी. वह हास्य को भरपूर जीते थे.

उनके इस सिद्धांत को रेखांकित करती कविता है-

डाक्टर वैद्य बता रहे ,कुदरत का कानून
जितना हंसता आदमी, उतना बढ़ता खून
उतना बढ़ता खून, हास्य मेँ की कंजूसी
सुन्दर सूरत मूरत पर छाई मनहूसी
कंह काका कवि,हास्य व्यंग्य जो पीते डट के,
रहती सदा बहार ,बुढापा पास न फटके.



काका की जनप्रिय पुस्तकों में -काका के कारतूस, काका की फुलझडियां, का का की कचहरी ,काक्दूत, काका के प्रहसन महामूर्ख सम्मेलन, चकल्ल्स,काका की चौपाल , आदि दर्जनों पुस्तकें है जिनके दर्जनों संस्करण बिक चुके हैं.

काका ने विशुद्ध हास्य लिखा, गुद्गुदाने वाले व्यंग्य को कविता में पिरोया.
उनकी 'विद्यार्थी' की परिभाषा इस प्रकार है


पूज्य पिता की नाक में डाले रहो नकेल
रेग्युलर होते रहो तीन साल तक फेल
तीन साल तक फेल. भाग्य चमकाता ज़ीरो
बहुत शीघ्र बन जाओगे कालेज के हीरो
कह काका कविराय ,वही सच्चा विद्यार्थी
जो निकाल कर दिखला दे विद्या की अर्थी.

काका की कलम से कोई विषय अछूता नही रहा. रिश्वत पर उन्होने ये लिखा--

रिश्वत रानी धन्य तू तेरे अगणित नाम
हक्-पानी उपहार औ बख्शीश ,घूस इनाम
बख्शीश ,घूस इनाम ,भेंट, नज़राना, पगडी
तेरे कारण खाऊ मल की इनकम तगडी
कह काका कविराय ,दौर दौरा दिन दूना
जहां नहीं तू देवी,वह महकमा है सूना.

मेरी हार्दिक श्रद्धांजलि.

Monday, September 17, 2007

टी वी देखकर समय से पहले बड़े हो रहे हैं बच्चे


एक टीवी कार्यक्रम मे ग्यारह वर्षीया बच्ची ने मोहक नृत्य प्रस्तुत किया . विशेषज्ञ पैनल सदस्य ने आलोचना के बाद कहा कि अब एक धुन बजेगी, धुन वाला फिल्मी गाना पहचान कर उस पर नृत्य करके दिखाना होगा. फिर यादों की बारात फिल्म का एक लोक्प्रिय गाना बजाया गया. बच्ची उसे नहीं पहचान पाई. एंकर महिला ने संगीतज्ञों से कहा "कोई ऐसा गाना बजायॆ, जिससे बच्चे रिलेट कर सकें तथा आसानी से पहचान कर सकें". फ़िर गाने की धुन बजी ' भीगे होंठ तेरे प्यासा मन मेरा, लगे अभ्र सा मुझे तन तेरा, कभी मेरे साथ एक रात गुजार,...'. झट से बच्चे ने गाना पहचान लिया.

ये है आजकल की नई पीढी.

उसी कार्यक्रम में बच्चों के मुख से गाये जाने वाले और गाने कैसे होंगे, सहज ही अन्दाज़ा लगाया जा सकता है.
कुछ समय पहले मैने 'अमूल मैचो अंडर वीयर' के विज्ञापन पर एक पोस्ट लिखकर उसे अश्लील की संज्ञा दी थी.मेरे एक प्रोफेसर मित्र ने उस समय यही कहा था,जो इस पोस्ट का शीर्षक है-टी वी देखकर समय से पहले बड़े हो रहे हैं बच्चे .
अभी पूर्व भारत के एक नगर में पुलिस ने कुछ सार्वजनिक पार्कॉं में छापे मार कर अश्लील हरकतें करते हुए कुछ नाबालिग बच्चों को पकडा था.

ये है आजकल की नई पीढी.

स्कूलों में आये दिन होने वाली सांस्कृतिक कार्यक्रमों में ' चोली के पीछे ...से लेकर,कांटा लगा ..जैसे लोकप्रिय गानों पर नृत्य करते आठवर्ष से लेकर बारह वर्ष की आयु वाले बच्चे मिल जायेंगे. इन्हे ये गाने गाने की प्रेरणा भी अपने शिक्षकों से ही मिली होगी ये भी सच है.
हिन्दी के अनेक चैनलों पर इस प्रकार के कार्यक्रम हैं .बूगी वूगी, छोटे उस्ताद, होन्हार, आदि कार्यक्रम मूलत: बच्चों में छिपे टेलेंट को बाहर लाने के लिये भले हों, किंतु क्या इन्हे अनियंत्रित करके हम बच्चों के असमय जवान नहीं बना रहे ?
दोष किसका है? टेलीविजन का ? या हम सबका ?

Thursday, September 13, 2007

वो इत्र लगाकर ,इस तरह अकड़ता क्यूं है ?

ख्वाब कांटों की तरह आंख में गड़ता क्यूं है ?
तमाम चेहरों से चिपकी हुई जड़ता क्यूं है ?


हमें मालूम है खुशबू कहां से लाया है .
वो इत्र लगाकर ,इस तरह अकड़ता क्यूं है ?

कि जिसके पढ़ने से नफरत में डूब जाता है,
तू ऐसे मज़हबों की पुस्तकें पढ़ता क्यूं है ?

बिखर क्यूं जाता है, हर बार इकट्ठा होकर ,
तुम्हारा कुनबा बार बार उजड़ता क्यूं है ?

ये सच और झूठ का झगड़ा नहीं मिटने वाला,
तू ख्वाम्खां के सवालात में पड़ता क्यूं है ?

हरेक शख्स पे उंगली उठाई है तुमने ,
किसी ने तुझ पे उठाई तो बिगड़ता क्यूं है ?

साथ खुशियों में निभाया है मेरा आज तलक ,
आज जब गम का ये साया है, बिछड़ता क्यूं है ?

Wednesday, September 12, 2007

सचिन तेन्दुलकर्: दुर्भाग्य का शिकार या किसी साजिश का ?


शुक्र है कि क्रिकेट मैच अब वीडियो कैमरों के साये में ही होते है. कहीं कोई भी चूक हुई तो तुरंत फुरंत पकड में आ जाती है. यही बात मैचों की अम्पायरिंग पर भी लागू होती है.

अम्पायर जब गलती कर देता है, तो कम से कम उसे स्वयम पता होता है कि गल्ती हुई है,भले ही अन्य लोगों ने वो गलती नोटिस भी न की हो.
खिलाडी को भी पता होता है क़ि कितनी बार आउट होते हुए भी अम्पायर की गलती से उसे जीवनदान मिल जाता है. कई महान खिलाडी हुए हैं जो ऐसे अवसरों पर स्वयं ‘वाक’ (walk) कर जाते हैं.अब जमाना बदल गया है.
Moral values बदल गयी है.Cricket अब कहीं ज्यादा competetive हो गया है.अब ‘वाक’ करने वाले कम ही होते हैं. इसके ठीक उलट कभी कभी अम्पायर से दूसरी किस्म की गलती भी हो जाती है. यानि खिलाडी आउट न होते हुए भी अम्पायर द्वारा आउट दे दिया जाना.कोई भी स्तरीय अम्पायर जान बूझ कर तो ऐसा करने से रहा.किंतु जब बार बार किसी टीम को लगे कि उसकी विरोधी टीम के खिलाडियों को आउट नहीं दिया जा रहा अथवा टीम विशेष ( या खिलाडी विशेष) को निशाना बनाकर फैसले दिये जा रहे हैं तो क्रिकेट का मजा चला जाता है.
टीम विशेष के साथ अम्पायरों के पक्षपाती व्यवहार के एक नहीं अनेक उदाहरण हैं और क्रिकेट खेलने वाली सभी टीमें कभी न कभी इसका शिकार हुई हैं.

ताजा सन्दर्भ सचिन तेन्दुलकर का है,विशेष्कर अभी हाल में सम्पन्न England दौरे का. पूरी श्रंखला में पांच अवसर ऐसे रहे जहां सचिन इस ‘दुर्भाग्यपूर्ण’ स्थिति का शिकार बने.
1.लोर्डस के मैदान पर पहले टैस्ट की पहली इनिंग में स्टीव बकनर द्वारा पगबाधा(LBW) दिया जाना जब leg से बाहर जाती inswinger पैर पर लगी.

2.उसी मैच की दूसरी इनिंग में फिर स्टीव बकनर द्वारा के off stump बाहर जाती गेंद पर फिर lbw दिया जाना जब के वह forward भी खेल रहे थे.

3.टेंटब्रिज में दूसरे टेस्ट की पहली इनिंग में 91 के निजी स्कोर पर फिर lbw ,जब कि गेंद साफ तौर पर बाहर जा रही थी. इस बार अम्पायर थे साइमन टुफ्फेल .

4. 99 के अपने स्कोर पर अम्पायर इयान गुल्ड द्वारा विकेट के पीछे कैच आउट तब जब कि गेंद सचिन के कोहनी के guard से लग कर गयी थी .

5. एक बार फिर,इस बार अलीम डार द्वारा कैच आउट जब कि बल्ले और गेंद के बीच बहुहुहुहुत सारा फासला था, और साफ तौर पर कैच नहीं था.
इसे दुर्भाग्य कह कर टालना नादानी है.किंतु प्रश्न है कि अम्पायरों को सचिन से क्या दुश्मनी या खुन्नस हो सकती है,कि अनेक देश के अम्पायर बार बार ऐसी भूल करें, वो भी तब जब उनके पास टीवी replay का भी विकल्प मौजूद था.
फिर क्या सचिन के विरुद्ध कोई साजिश है ? मैं तो निश्चित तौर पर इसे एक साजिश समझता हूं,परंतु किसके द्वारा और क्यूं रची जा रही है ये साजिश, फिलहाल् समझ से परे है .

Tuesday, September 11, 2007

नए पाठक भी,नए ब्लौगर भी

मान लीजिये आप ऐसे लोगों के बीच हैं जिन्होने कभी गाय नहीं देखी. आप उन लोगों को गाय दिखायें ,गाय के गुण समझायें,दूध,दही के फायदे बतायें, और फिर उनके कहने पर गाय को दुह कर दिखायें . अब उन सबको पता होगा कि गाय के क्या फायदे हैं.

जी हां, लग्भग ऐसा ही हुआ .आज सुबह.
जैसा कि सरकारी रीति-रिवाज है आज कल 'हिन्दी पखवाडा' मनाया जा रहा है.सभी सरकारी विभागों में आजकल हिन्दी कार्यशालायें चल रही हैं. इनके लिये विशेष बजट होता है.इन कार्यशालाओं में अतिथि वक्ता बुलाये जाते हैं और हिन्दी भाषा पर बात चीत होती है.
एक ऐसा ही संस्थान है एम एम टी सी ( Minerals & Metals Trading Corporation). प्रत्येक वर्ष की भांति,इस वर्ष भी दो-दिवसीय कार्य शाला आयोजित थी. पिछले अनेक वर्षों से मैं वक्ता के रूप में वहां जाता रहा हूं. इस वर्ष भी आमंत्रित था. इस बार मैने विषय रखा था -इंटर्नेट पर हिन्दी.MMTC के scope complex,नई दिल्ली स्थित सभागार में आज ही मेरा वक्तव्य होना था.

और मैने इसे हिन्दी ब्लौग्गिंग की कार्यशाला बना दी. कार्यशाला में जो कर्मचारी उपस्थित थे, उनमें से मात्र कुछ ने ब्लौग के बारे में सुन रखा था. 'हिन्दी ब्लौग' से प्राय: अपरिचित थे.Projector की मदद से विशाल screen पर सारा कुछ देखा जा सकता था.

मैने. हिन्दी के औज़ार से शुरू किया. फिर याहू टूल बार तक पहुंचा.मेरे laptop में याहू टूल बार स्थापित है. मैने हिन्दी टूल, हिन्दी खोज (MMTC को ही खोज कर दिखाया . एक सज्जन का नाम टाइप करके खोजा, वो गद्गद हो गये. पत्रिकाओं में निरंतर, सृजनगाथा, वेब्दुनिया की साइट दिखाई.वेब दुनिया पर पहले 'साहित्य',उसमें 'कविता' उसमें भी अटल बिहारी वाज्पेयी की 'गीत नया गाता हूं' खोज कर दिखाए और कहा कि अब आप इस पर टिप्पणी भी कर सकते हो.सीधा वेब्साइट प्रदर्षित करता हुआ फिर एग्ग्रीग्रेटर तक पहुंचा. नारद ,चिट्ठाजगत्, हिन्दिब्लौग्स और ब्लौगवाणी तक सब दिखाया, जितनी तकनीकी जानकारी थी ,वह सब शेयर किया.

फिर एक दम् नया ब्लौग (ताजा ताजा) बनाकर दिखाया कि ब्लोग कैसे बनाते है. ( नये ब्लौग का नाम है बृज गोकुलम्,अभी इसपर एक टेस्ट पोस्ट ही डाली थी, यह दिखाने के लिये कि कैसे पोस्ट बनाते हैं.)
फिर ब्लौग पर दिखने वाले अन्य साजो-सामान ( लिंक, टिप्पणी, आदि आदि) दिखा कर व बनाकर समझाई. अपने नये ब्लौग ( बृज गोकुलम) पर अपनी ही टिप्पणी करके दिखाई.

फ़िर मेरे प्रिय चिट्ठों पर आया. शुरुआत हिन्द युग्म से
और इस ब्लौग पर ढेर सारे लिंक्स् का प्रदर्शन किया. वहां से सारथी जी के चिट्ठे पर जाकर वही सब समझाया.
इस बीच हिन्दी ब्लौग्गिंग के बारे जितना जानता था ,सब कुछ समझा दिया.

ये सब हो रहा था, सब के सामने और वो सुनने वाले देखने वाले सब भौचक्के होकर देख रहे थे. लगभग 1.30 बजे भोजनवकाश के कारण मुझे यह लाइव डिमोंस्ट्रशन समाप्त करना पडा.
भोजन के दौरान भी लोगों ने कई प्रश्न पूछे. लिंक्स मे दिखे कुछ नामों ( अलोक पुराणिक ,पंगेबाज, पर भी चर्चा हुई, मैने जितेन्द्र चौधरी मैथिली जी व सिरिल गुप्त का विशेष उल्लेख किया एवम उनकी जानकारी में वृद्धि की)

सभी ने इस नई जानकारी का स्वागत किया और प्रशंसा भी की. मुझे विश्वास है कि इनमें से कई आज ही हिन्दी ब्लौग्स से कुछ ग्रहण करेंगे. हमें नये पाठक भी मिलेंगे और नये चिट्ठाकार भी.ऐसी आशा है.

Monday, September 10, 2007

कितनी सस्ती जान ?

अपने अपने मन में आस्था, श्रद्धा, विश्वास भरे हुए , उल्लसित व प्रफुल्लित होकर पारम्परिक धार्मिक मेलों में जाने वाले झुंडों को हम अक्सर देखते आये हैं. हम में से अनेकों ने इस प्रकार के मेलों मे स्वयम भी हिस्सा लिया होगा . ऐसे मेलों में परिजनों, नाते-रिश्ते दारों. मित्रों, पडोसियों आदि के साथ लुत्फ भी उठाया होगा . आनन्द के साथ साथ पुण्य भी अर्जित करके संतोष प्राप्त किया होगा.
राजस्थान के जैसलमेर जिले में प्रति वर्ष सूफी संत् रामदेवरा का मेला लगता है.इस मेले में हिन्दू –मुस्लिम सभी भाग लेते हैं. त्वचा की बीमारी आदि के इलाज़ के लिये दूर दूर से ग्रामीण पहुंचते हैं.. इसी मेले में जा रहे थे वो 200 लोग अपने परिजनों, नाते-रिश्ते दारों. मित्रों, पडोसियों आदि के साथ. मन में आस्था, श्रद्धा, व विश्वास भरे हुए उन लोगों ने सपनों में भी नहीं सोचा होगा कि उनके साथ कोई हादसा हो जायेगा क्योंकि आनन्द के साथ साथ पुण्य कमाना मेले में जाने का मुख्य उद्देश्य था. प्रकृति को शायद यह मंजूर नहीं था. राजसमन्द ज़िले में चारभुजा नामक स्थान पर एक बडी दुर्घटना में इस दल के लग्भग 90 श्रद्धालु काल-के गाल में समा गये.
प्रकृति का प्रकोप कहें या मानव की भूल ? क्या पाप था उनका ? क्या वे किसी गलत उद्देश्य पर जा रहे थे ?
इन प्रश्नों के उत्तर ढूंढने पर भी नहीं मिलते.
सडक हादसो में हमारे देश में सैकडो जानें रोज़ चली जाती हैं. अधिकांश्तया जो शिकार होते हैं वे निर्दोष होते हैं. जान से इस प्रकार हाथ धोने वालों में पैदल या साइकिल पर चलने वाले ज्यादा होते है. ग्रामीण ,अशिक्षित, गरीब, कुल मिलाकर वह वर्ग जिसे अंग्रेज़ी में have-nots कहा जाता है. इनके पीछे आंसू बहाने वाले तो बहुत होते है, हां, उनके आंसू पोंछने वाला कोई नहीं होता. सडक हादसों के साथ साथ इसमें आतंकवाद के शिकार भी जोड लें. राजनैतिक ,अराजकता ,दंगे-फसाद आदि में मरने वाले भी शामिल करें तो यह तादाद कई गुना बढ जाती है. चाहे बिहार, छतीसगढ आदि में नक्सल्वादी( अतिवादी) हमलों के शिकार हों, अलीगढ,भागलपुर , कोयम्बटूर या गोधरा में साम्प्रदायिक दंगों के शिकार . या फिर राजसमन्द जैसे सडक हादसे में मारे गये कतई निर्दोष व्यक्ति.प्राकृतिक आपदाओं मे गयी जानें तो जैसे ‘ऊपर’ से लिखा कर ही लाते हैं ये नादान लोग. ये बेकसूर लोग अपनी जान की कुर्बानी व्यर्थ में ही दे रहे है. किसी को कोई फर्क़ नही पडता सिवाय उनके ,जो इन पर आर्थिक रूप से निर्भर रहे हों या उनको, जिनका मृत जनों के साथ पारिवारिक व आत्मीय रिश्ता रहा हो.

प्रशासन ऐसी घट्नाओं पर ‘चिंत्ता व दुख प्रकट’ करता है. यदि वे कोई वोट बेंक रहे हों ( सामूहिक रूप से) तो कोई स्थानीय नेता (या नेता के विशेष निर्देश पर् कोई अधिकारी) ऐसे स्थान पर जा कर ‘कुछ” आर्थिक मदद की घोषणा करता है.मीडिया के लिये “एक और खबर” भर होतें हैं ये लोग. य़ा फिर एक दिन की सुर्खिया बनने का सस्ता सामान भर.
मरना इनकी नियति है. बेखटके मस्त जिन्दगी जीते जीते अचानक खत्म हो जाना, कभी किसी के लिये राजनैतिक रोटियां सेकने का कच्चा माल बन जाना. तो कभी किसी और बेकसूर (?) को सजा दिला जाना. ( जैसा कि राज्समन्द वाले हादसे मे हुआ है-या होने जा रहा है,: एक लघु स्तर के कर्मचारी को इस आरोप में निलमबित किया गया है कि उसने ट्रक में बैठे 200 लोग देखकर चालान क्यों नहीं किया))

वाकई जान सस्ती है.खास कर ऐसे लोगों की जान- जो किसी से शिकायत नही कर सकते. जो आम बोल चाल की भाषा में ‘महत्वहीन’ हैं. जिन्हे मात्र कुछ हज़ार रुपयों का मुआबजा देकर सीन से गायब कर दिया जा सकता है.
राजसमन्द मे मारे गये लोगों को मेरी श्रद्धांजलि.

Monday, August 27, 2007

आतंकवाद से क्यों मात खा रहे हैं हम ?



बडे फक़्र के साथ आज़ादी की साठवीं वर्षगांठ हम मना रहे हैं. एक उन्नत ,विकसित राष्ट्र के जो सपने आज़ादी के लिये संघर्ष करने वाली हमारी पिछली पीढी ने देखे थे, उनमे से अनेक पूरे हुये हैं और हम पूरे गर्व के साथ इन उपलब्धियों का उल्लेख करते है. अर्थ, विज्ञान ,स्वास्थ्य ,शिक्षा जैसे अनेक क्षेत्रों में महत्वपूर्ण - विश्व स्तर की उपलब्धियों के बावज़ूद हम सुरक्षा के मुद्दे पर इतने कमज़ोर ,शक्तिहीन व प्रभावहीन क्यों हैं?

आज अंग्रेज़ी दैनिक Times of India की lead story पढकर भौंचक रह गया. मात्र पिछले तीन वर्षों मे भारत में आतंकवाद की भेंट चढने वालों मे भारत का विश्व में दूसरा स्थान है. इस अवधि में भारत के 3600 से अधिक लोगों की जानें गयी हैं .( हमसे अधिक जन-हानि उथाने वाले दिशों में सिर्फ ईराक़ हमसे आगे है). यानि प्रतिदिन के औसत पर ह्म लगभग तीन कुर्बानियां देते आ रहे है. यहां तक कि अफगानिस्तान, कोलम्बिया,रूस,सूडान जैसे देश भी हमसे कहीं पीछे हैं.

पिछले लग्भग 25 वर्षों से किसी न किसी रूप में हम आतंकवाद से जूझ रहे हैं . पहले पंजाब जलता रहा जिसे हमारे पडोसी देश की भरपूर शह मिलती रही. देश की जनता ने अत्यंत संयम से काम लिया. जम्मू व काश्मिर में तो आग अभी तक सुलगती आ रही है. शायद ही कोई दिन पूरी तरह शांति से गुजरता हो. उत्तर-पूर्व के अनेक राज्य आतंकवाद से जूझते आ रहे है तथा वहां की शांतिप्रिय जनता अब तो प्राय: इसकी अभ्यस्त सी हो गयी है. इन प्रभावित राज्यों के अतिरिक्त देश के अनेक प्रमुख नगरों की भोली भाली निरीह जनता ,जिसे soft target कहा जाता है ऐसी घटनाओं का दर्द झेलती आ रही है. दिल्ली, बंगलौर, हैदराबाद, मुम्बई आदि नगरों में अनेक मासूम अपनी जान की कुर्बानी दे चुके हैं.

क्या कारण है कि भारत यह सब सहता आ रहा है?
हमारी व्यवस्था इतनी कमज़ोर क्यों है?
हमारा खुफिया तंत्र सालों से सो क्यों रहा है. भारत क्यों नहीं इजराइल जैसे देशों के साथ ऐसे समझौते करके विशेष प्रशिक्षण की व्यवस्था करता ताकि हम आतंकवादियों का खुला मुक़ाबला कर सकें?
सरकारें आती हैं, चली जाती हैं. स्वरक्षा, सुरक्षा पर लगातार बढते बजट के बावजूद भारत का पूरा तंत्र इतना कमज़ोर क्यों है?

आतंक्वादियों के मंसूबे पूरे होते जाते हैं परंतु हमारा तंत्र क्यों सदैव नपुंसक ही बना हुआ है?
कब तक आखिर , आखिर कब तक ?
समय आ गया है कि हम जागें और् उठ खडे हों इस दानव के खिलाफ.कोई भी कुर्बानी छोटी है हमारी सुरक्ष के सामने.

भाई संजय बेंगाणी की टिप्पणी बडी माक़ूल है, उसका वहा तो जवाब तो मैने लिख दिया, परंतु सोचा कि पूरे लेख का लब्बो-लुबाब तो यही होना चाहिये था. वह यों है:




रास्ता कठिन या दुष्कर नहीं होता, विशेष कर तब जब हम अपने अस्तित्व के लिये लड रहे हों .

हमारे अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्ध किस काम के यदि हम अपने लिये सुरक्षा के लिये आवश्यक technology जुटा ना सकें.
तय करना होगा कि भारत ऐसे समझोते करे जहां हमारी अपनी सुरक्षा खतरे में पडे तो दस बीस देश हमारे साथ खडे हों.

.....और सौ की सीधी एक बात . खत्म कर दो ना नासूर को जो हमारे देश पर पडोस से नज़रें गडाये खडा है. ..और अपनी ताक़त के दम पर , झुकाओ ना उन दूसरी ताक़तों को जिनका डर है हमॆं.

...दुनिया झुकती है. झुकाने वाला चाहिये ...

चक दे इंडिया !!!!!!!!





कल ही शाहरुख खान की 'चक दे इंडिया' देखी.फिल्म के बारे में पहले पढ रखा था. लगता था कि चलो और कुछ नहीं तो टाइम पास ही सही. किंतु जैसे जैसे फिल्म आगे बढती गयी, involvement भी बढता गया.
जब फिल्म में इंडिया की टीम womens hockey का world-cup खेल रही थी तो इतना अधिक interest आने लगा जैसे कि कोइ लाइव match चल रहा हो.
आज इस फिल्म पर ndtv द्वारा किया गया feature देखा , जिसमें anchoring एक ब्लौगर साथी रवीश कुमार कर रहे थे. पूर्व हौकी खिलाडी ज़फर इक़बाल ने कहा कि फिल्म देखते देखते कई बार वो कुछ इमोश्नल हो गये और उनके आंसू निकल पडे, तो लगा कि मैं अकेला नहीं हूं जो इस फिल्म को देख्कर भावनाओं में बहने लगा था.

फिल्म में भारतीय टीम की जो महिला खिलाडी हैं,उनका चयन, चरित्र चित्रण तो कबिले तारीफ है ही, एक एक छोटी सी घटना भी कुछ न कुछ सन्देश दे कर जाती है
कुल मिलाकर यह फिल्म न केवल खेल के प्रति उत्साह जगाती है , बल्कि इसका मुख्य प्रभाव है देश के प्रति चेतना, टीम भावना का महत्व व संघर्ष की प्रेरणा.

खुद भी देखें और सबको दिखायें.

Wednesday, August 15, 2007

तुम हो पहरेदार चमन के




राजनीति और साहित्य दो अलग अलग धारायें है. बहुत कम लोग ही मुझे मिले हैं जिनका दोनों से ही सम्बन्ध है. प्रो. उदय प्रताप सिंह एक ऐसी ही शख्सियत हैं समाज्वादी पार्टी के सांसद है. लोकसभा व राज्यसभा दोनो में रहे हैं. पिछले 18-19 वर्षों से सक्रिय राजनीति में हैं.
प्रो. उदय प्रताप सिंह का कविता से पुराना सम्बन्ध है. अध्यापक रहे हैं.पिछले 40-50 वर्षों से लगातार लिखते आ रहे हैं.मेरी प्रोफेसर उदय प्रताप जी से जान-पहचान लग्भग 17 वर्षों से है. फिलहाल मैं राजनीति में सक्रिय नहीं हूं फिर भी साहित्यिक,सांसकृतिक कार्यक्रमों में मुलाक़ात हो ही जाती है.
पिछले 11 अगस्त को मेरी संस्था " अक्ष" की ओर से एक साहित्यिक आयोजन था,जिसमें पुस्तक के लोकार्पण के अतिरिक्त लघु कवि सम्मेलन भी था. उदय प्रताप् जी आमंत्रित थे.उन्होने देशभक्ति से ओत-प्रोत एक रचना पढी जिसमे उन्होने चन्द्र शेखर आज़ाद की जनम्स्थली बदरका को प्रणाम कहा.मेरे विशेष अनुरोध पर उन्होने एक रचना पढी, जिसका सम्बन्ध लोकतंत्र की पहरेदारी से है. लोकतंत्र में जनता का एक सजग् प्रहरी के रूप में जो दायित्व है,उसी को रेखांकित करती है ये कविता.
उदय प्रताप सिंह जी की अनुमति लेकर यहां यह कविता संक्षिप्त रूप में प्रस्तुत है:


ऐसे नहीं जागकर बैठो तुम हो पहरेदार चमन के ,
चिंता क्या है सोने दो यदि सोते हैं सरदार चमन के.
वैसे भी ये बड़े लोग हैं, अक्सर धूप चढ़े जगते हैं
व्यवहारों से कहीं अधिक तस्वीरों में अच्छे लगते हैं
इनका है इतिहास गवाही जैसे सोये वैसे जागे
इनके स्वार्थ सचिव चलते हैं नई सुबह के रथ के आगे
माना कल तक तुम सोये थे लेकिन ये तो जाग रहे थे
फिर भी कहां चले जाते थे ,जाने सब उपहार चमन के
ऐसे नहीं जागकर बैठो.......


जिनको आदत है सोने की उपवन की अनुकूल हवा में
उनका अस्थिशेष भी उड जाता है बनकर धूल हवा में
लेकिन जो संघर्षों का सुख सिरहाने रखकर सोते हैं
युग के अंगडाई लेने पर वे ही पैगम्बर होते हैं
जो अपने को बीज बनाकर मिट्टी में मिलना सीखे हैं
सदियों तक उनके सांचे में धलते हैं व्यवहार चमन के
ऐसे नहीं जागकर बैठो......


यह आवश्यक नहीं कि कल भी होगी ऐसी बात चमन में
ऐन बहारों में ठहरी है कांटों की बारात चमन में
कल की आने वाली कलियां पिछले खाते जमा करेंगी
तब इन कागज़ के फूलों की गलती कैसे क्षमा करेंगी
उस पर मेरी क़लम गवाही बिना सत्य के कुछ ना कहेगी
केवल बातों के सिक्के से चलते थे व्यापार चमन के
ऐसे नहीं जागकर बैठो...

( समारोह की पूरी रपट लग से एक पोस्ट में दी जायेगी)

चित्र 1 :मंच पर श्री उदय प्रताप सिंह कवि अरविन्द पथिक को प्रशस्ति पत्र भेंट करते हुए
चित्र 2:अरविन्द चतुर्वेदी का कविता पाठ्
चित्र 3 : मंच पर श्री उदय प्रताप सिंह,प.सुरेश नीरव,उ.प्र.सरकार के मंत्री यश्वंत सिंह,दिल्ली सरकार के मंत्री डा. ए.के.वालिया

Monday, August 6, 2007

अपने हाथों का खिलौना न बनाना मुझको

अपने हाथों का खिलौना न बनाना मुझको ,
हो सके तो किसी मूरत सा सजाना मुझको.


मैं जो मिट्टी हूं तो एक बीज़ मिला दे मुझमें,
में हूं पत्थर तो अहिल्या सा बनाना मुझको.


बून्द हूं तो किसी दरिया में समा जाने दो ,
मैं जो दरिया हूं तो सागर में मिलाना मुझको.


हूं जो नफरत तो मुझे ,क़त्ल करके दफनाना,
मैं मोहब्बत हूं तो सीने से लगाना मुझको.


मैं जो आकाश दिखूं,ओढना चादर की तरह ,
दिखूं धरती तो, बिछौने सा बिछाना मुझको.


जो हूं कांटा तो मुझे दिल में छुपा कर रखना,
फूल हूं तो किसी मन्दिर में चढाना मुझको.



मैं हूं दोहा, तो किसी पाठ् सा पढ जाना मुझे,
मैं गज़ल हूं तो ज़रा झूम के गाना मुझको.