Sunday, June 13, 2010

मेरी यूरोप यात्रा-10- कुछ और पेरिस...



20.04.10 मंगलवार

आज शोपिंग का कार्यक्रम था. तय हुआ था 9.30 बजे . निकल पडेंगे ताकि सब कुछ निबटा कर दोपहर बाद की ट्रेन से वापस ग्रेनोबल जा सकें. पिछली रात सोते सोते बहुत देर हो गयी थी. टी वी का रिमोट लौक हो गया ,फिर मेकेनिक को बुला कर ठीक कराया. फिर अन्य लिखा पढी / नेट / चेट में दो बज गये.






सुबह नीन्द तब खुली जब दरवाजे पर लगभग पीटने की आवज़ें आयीं. हां यह पीटर ही था. ( पीटर ,ज़ाहिर है पीटेगा ही !!!!!) .पीटर ने बताया कि अन्य सभी नाश्ता कर के इंतज़ार करते रहे और फिर फुटकर शौपिंग के लिये निकल गये हैं . बिल्कुल युद्धस्तर पर तैयार होना पडा. भाग कर ब्रेक फास्ट किया. वहां भी सब कुछ समेटा जा चुका था ,जो मिला ,काम चलाया. लगभग दो-ढाई घंटे का शौपिंग का समय था. परफ्यूम ज़रूरी था, अन्य कुछ पेरिस की यात्रा को यादगार बनाने के लिये ... . बाज़ार में घूमते घूमते मैं अन्य साथियों से अलग हो गया. नियत स्थान पर मिलना तय हुआ था. शौपिंग आदि पूरी कर के धीरे धीरे सब वहीं मिल गये.






सब अपने अपने पसन्द का खाने खाना चाहते थे. पीटर हमें पास ही ऐसे क्षेत्र में ले गया जहां भिन्न प्रकार के अनेक भोजनालय थे. हमने चुना ‘हिमालयन’ जो वस्तुत: एक पाकिस्तानी रेस्त्रां था. खाना मिला दाल तड़का, चावल आदि.
जब हम फिर स्टेशन पहुंचे तो ट्रेन मे अभी 45 मिनट का समय था. हवाई यात्रा बन्द होने से ट्रेन में भीड काफी बढ गयी थी.वेटिंग रूम में मुशकिल से बैठने की ज़गह मिली.

पेरिस से ग्रेनोबल वापसी के सफर में पीटर से भारतीय संस्कृति आदि पर लम्बी चर्चा हुई. कृष्नेन्दु के साथ समय-काटू पहेलियां आदि. आठ बजे के बाद हम वापस पहुंचे . इस बार मेरा कमरा बदल गया था , बाकी सभी को वही कमरे मिले जो वह पेरिस जाने से पहले छोड कर गये थे. बाज़ार जाकर दूध,फल आदि खरीदे. फिर इंडियन बाज़ार के गुल्शन रात्रा से भेण्ट हुई. मैने उन्हें बताया कि उनकी दुकान का ज़िक्र मैं अपने ब्लोग पर करूंगा. ( रात्रा खुश हुआ !!!)

लेट लतीफी में नाश्ता भी गया. 21.04.10 बुधवार

आज का दिन अब तक का सबसे बोरिंग दिन कहा जा सकता है.
देर से सो कर उठा. सोचा स्काइप पर दिल्ली बात की जाये. कोशिश की ,नहीं मिला. फिर ई-मेल आदि चेक करने में लग गया. फिर एक बार स्काइप कनेक्शन की कोशिश की. इस बीच भूल भी गया कि नाश्ते का समय सिर्फ 9.30 तक है. घडी देखी 9.35 हो चुके थे.भाग कर नीचे रेस्ट्रां में पहुंचा तो सब कुछ समाप्त. मुझे शालीन (??) तरीके से बताया गया –“ दे टाइम इस ओवेर” .
ब्रेकफास्ट लगाने वाली महिला ने सिर्फ इतनी सहानुभूति दिखाई कि मुझे ब्रेड ,कोर्न फ्लेक्स ( दूध तो कमरे में था ही) ‘उठा कर’ ले जाने की अनुमति दे दी.( ना कोई फल, ना जूस, ना योगर्ट,) . मरता क्या न करता, जो मिला वही लेके रूम पर आ गया.




पिछले रात की खरीदारी काम आयी. I had fruits and milk bought last night. दूध गरम किया Corn flakes मिलाया. एक सेव ,एक नाशपाती के साथ तीन स्लाइस ब्रेड. ऊपर से कौफी. हो गया नाशता.

फिर आराम से नहा कर, पूजा आदि के बाद तैयार होकर पहुंचा Grenoble ecole de management . गेल फोइल्ल्र्ड ( जो वहां business manager है) ने बताया कि आपने Academic director के साथ तय meeting जो 11.00 बजे थी मिस कर दी है. वह होटल में मेरे पुराने वाले कमरे का फोन मिलाता रहा . Miscommunication as he tried my old room to inform. I did not pickup ( I was'nt there ). मेरी अगली मीटिंग एम बी ए डाइरेक्टर के साथ 3.30 पर थी. मैं लंच करके वापस होटल आ गया.मेरे पास अभी भी एक घंटा था. मैने रूम चेंज करके वापस पुराना रूम मांगा जो बिना हिचक के मिल गया.
मीटिंग से लोटकर फिर सामान पैक किया ताकि फिर उसी रूम में शिफ्ट कर सकूं. शाम को पैदल सैर को निकला. वापस आकर बेटे से एक घंटा स्काइप पर बातॆं हुई और इस बीच मैने उसे सात चित्र भी भेजे.





मन नहीं लग रहा , उसके बाद. लगता है मेरे छात्र डिनर के लिये चले गये होंगे . मेरी उनसे बात नहीं हो पायी क्यों कि मैं स्स्काइप पर व्यस्त था. अब अकेले जाने का तो बिल्कुल ही मन नहीं था.आलस्य और भूख का सम्बन्ध तब समझ में आया जब अकेले बाहर जाकर खाना खाने का मन नहीं था. रेडी-टू-ईट वाले खाने के पेकेट (MTR) भी थे पर आलस्य था कि बनाने ( गर्म करने ) का भी मन नहीं था. सोचता रहा कि बनाऊं कि नहीं . फ़िर दो फल ( एक सेव और एक नाशपाती)खा लिया , कौफी पी ली,बस् हो गया.
कभी मन उदास हो तो संगीत एक राहत देता है यह सोचकर लेप्टोप से गाने सुनने का मन बनाया. पहले आधे घण्टे परेशान रहा क्यों कि लेपटोप में आवाज़ नहीं आ रही थी. गाना सुनने का मन था . आवाज़ नहीं आई , सोचा चलो आई पी एल का सेमी फाइनल मैच u-tube पर देखेंगे. मैच तो लग गया, पर बिना आवाज़ के मज़ा ही नहीं आ रहा था. खूब कोशिश की पर कुछ नहीं हुआ.अचानक ध्यान गया कि लेप टोप में तो ईयर प्लग लगाया हुआ है और इसीसे आवाज़् नहीं आ रही है.खूब हंसा अपने ऊपर ,हां मन का टेंशन निकल गया.

22.04.10 बृहस्पतिवार
आज सिर्फ 2.30 पर एक मीटिंग तय थी, अत:सुबह का कोई तनाव नहीं था , किंतु नाश्ता कर के फिर तैयार हुआ. और 12.30 पर कैफेटेरिया पहुंच गया. लंच में कटे फल , एक सेव, फ्रेंच टोस्ट और ओरेंज़ जूस लिया. फिर वापस आकर 2.30 की मीटिंग के लिये फिर गया. फ्रांस में भी अनेक देशों के लोग आकर सदियों से बसे हैं .उन्ही में एक थे डा. ऍब्देल्क्रीम ( अब्दुल करीम ही सही लगता है) , जो ग्रेनोबल मेनेजमेंट स्कूल मे exchange programme के निदेशक हैं. अगले सत्र व अगले वर्ष फिर से आने के कार्यक्रम पर उनसे मीटिंग तय थी.

शाम को पहली बार MTR का पेकेट वाला खाना बनाया. पेकेट पर लिखे निर्देश पढे. पहले विकल्प के तौर पर चावल के पेकेट को ज़रा खोलकर ओवेन में रखा. अब दूसरा तरीक आजमाना था. सो राज़मा के पैकेट को उबलते पानी में 5 मिनट रखा. यूं देखा जाय तो कोई खास नहीं पर काम चलाने के लिये बुरा नहीं था.
खाना चाहे कैसा भी बना हो पर बनाने वाले को तो वही सबसे स्वादिष्ट लगता है. हालांकि इसमें मेरा कोई खास योगदान नहीं था, सिर्फ गर्म करने का ज़रिया ही तो था मैं. पर फिर भी लगा कि जैसे मैने ही बनाया है सो पूरे रुचि के साथ चठ्खारे ले ले कर खाया.

1 comment:

काजल कुमार Kajal Kumar said...

धन्यवाद हमें भी सैर कराने के लिए.