Wednesday, February 27, 2008

क्या बर्फ सचमुच पिघलेगी ?


समूचे विश्व में पिछले 15-20 वर्षों में राज्नैतिक घटनाक्रम लगातार बदलता रहा है. या यूं कहें कि इसे बदलने के प्रयास लगातार कामयाब होते दिख रहे हैं.
मेरी दो छात्रायें वियतनाम से हैं. उनसे बात करता हूं तो पता लगता है,उन्हे एहसास ही नहीं कि वियतनाम कभी बंटा हुआ भी था. जर्मनी में इतनी वारिशें हुई हैं कि आम जर्मन के लिये पूर्वी और पश्चिमी जर्मनी का फर्क़ धुल गया सा लगता है. दूसरी तरफ सोवियत संघ कब का समाप्त हुआ. चेकोस्लोवाकिया बंट गया, फिलस्तीनी अब भी अपनी ज़मीन के लिये लड रहे हैं. टिब्बत, चीन, ताईवान का मुद्दा समाप्त नही हो पाया है. यानी दो तरह के हालात हैं दुनिया में . कहीं लोग जुड रहे हैं और कहीं बिखर ( बिछुड) रहे हैं.

आज जब खबर आयी कि दो कोरिय्याई देश ( दक्षिण कोरिया व उत्तर कोरिया) के बीच मत्भेद समाप्त करने के लिये अमरीका भी प्रयास कर रहा है तो अनायास ही मुझे 1989 की अपनी प्योंग्यांग ( उत्तर कोरिया की राजधानी) यात्रा याद आ गयी.
अमरीका ने सौ से अधिक सदस्यों वाला एक संगीत समूह ( आर्केस्त्रा)दोनों देशों की यात्रा पर भेजा है, जो संगीत के माध्यम से दूरियां घटाने का प्रयास करेगा. प्योंगयांग में इसे सराहा गया है तथा इस ग्रुप को लोकप्रियता भी मिली है.एक प्रकार से यह उस प्रयास का विस्तार ही है, जिसे दोनो देशों के प्रमुख पिछले अनेक वर्षों से करते आ रहे हैं. आने वाला समय ही बतायेगा कि बर्फ वाकई पिघलेगी अथवा नहीं.

मेरी प्योंगयांग यात्रा- 1989
1988 के ओलम्पिक खेल सियोल ( दक्षिण कोरिया) को मिले थे, इससे दोनो कोरिय्याई देशों मे और दूरी बढ गयी थी. सोवियत संघ तब तक अस्तित्व में था और उसके प्रयास के बावजूद प्योंगयांग को खेलों की मेज़बानी नहीं
मिल पायी थी,जब कि प्योंगयांग ने खेलों की पूरी तैयारी कर रखी थी.इस तैयारी का लाभ उठाने के लिये तथा प्योंगयांग की साख बढाने के लिये 1989 में सोवियत संघ की मदद से विश्व युवा समारोह आयोजित किया गया था.

उन दिनों सोवियत संघ के तत्वावधान में एक अंतर्राष्ट्रीय युवा संघटन काम करता था( अधिकांश साम्यवादी देशों मे इसका खूब प्रसार था). भारत समेत अन्य देशों में भी साम्यवादी व समाजवादी विचारधारा वाले संग्ठन इससे सम्बद्ध थे.भारत में दक्षिणपंथी दलों ( भाजापा आदि) को छोडकर अन्य ( कांग्रेस,जनता-परिवार्, सभी रंग के कम्युनिस्ट ,तेलुगु देशम इसमें शामिल थे, सपा तब अस्तित्व में नहीं थी तथा बसपा बहुत छोटी पार्टी थी )

इस विश्व युवा समारोह में भाग लेने हेतु भारत से लगभग 400 युवा लोगो का एक दल भेजा गया था, जिसमे करीब 350 राजनैतिक दलों की युवा शाखाऑ के प्रतिनिधि थे व शेष 50 में युवा खिलाडी, संगीतज्ञ, पत्रकार आदि शामिल थे.सौभाग्य से में भी इसमें शरीक हुआ और प्योंगयांग की सैर का लाभ उठाया.राजनैतिक रूप से सक्रिय होने के कारण घटना क्रम में मेरी भी कुछ भूमिका थी. (वह भी धीरे धीरे इस लेख श्रंखला में आयेगा.)

चूंकि सारा खेल सोवियत संघ द्वारा प्रायोजित था अत: जाहिर है कि आन्दोलन का अगुआ होने के नाते खर्च भी उसे ही वहन करना था. पूरे विश्व से युवाओं को लेकर विश्व युवा समारोह हेतु प्योंगयांग पहुंचाने का दायित्व रूसी विमान सेवा ऐरोफ्लोट ने ही उठाया.

भारत से यह प्रतिनिधिमंडल ऐरोफ्लोट विमान सेवा मे सवार हुआ. ( शायद 9 मई 1989 को), और पाकिस्तान के एक एयर्पोर्ट ( शायद लाहोर-ठीक से याद नहीं) पर एक घंटा रुका,फिर ताश्कन्द, खबरस्त ,आदि होता हुआ लगभग 18 घंटे बाद प्योंग्यांग पहुंचा.
रास्ते में क्या क्या हुआ?,प्योंगयांग की यात्रा कैसी रही? अमरीकी पर्तिनिधि भी थे क्या? आदि आदि रोचक जानकारी मैं दूंगा -स्मय समय पर आने वाली पोस्ट में श्नै: श्नै:.(यदि रुचि है तो )इंतज़ार कीज़िये.

2 comments:

Mired Mirage said...

लिखिये, हमें प्रतीक्षा है ।
घुघूती बासूती

mamta said...

अगली कडियों की प्रतीक्षा रहेगी।