है अन्धेरों भरी ज़िन्दगी आजकल
ढूंढते हैं सभी रोशनी आजकल
खूबसूरत समां खुशनुमा वादियां,
ऐसे सपने भी आते नहीं आजकल
वादा करना,मुकरना तो आदत बना
लोग करते हैं यूं दिल्लगी आजकल
रहजनी जिनका पेशा था कल तक यहां,
वो भी करने लगे रहबरी आजकल
सब्ज़ पत्तों ने ओढा कुहासा घना
जंगलों जंगलों तीरगी आजकल
राम मुंह से कहें और बगल में छुरी
ऐसे होने लगी बन्दगी आजकल
चान्द बादल में खुद को छुपाता फिरे,
बहकी बह्की लगे चान्दनी आजकल
सर से गायब हुई चूनरी ओढनी
और दुपट्टॆ भी दिखते नहीं आजकल
- डा. अरविन्द चतुर्वेदी
Sunday, May 22, 2011
Tuesday, May 17, 2011
उड़ने की होड़ में हमारे पंख कट गये
सच को दबाने के लिये हथियार लिये है,
हर आदमी अब हाथ में अखबार लिये है.
बगलों में तंत्र मंत्र की गठरी दबाये है,
अब संत भी आंखों में चमत्कार लिये है.
उड़ने की होड़ में हमारे पंख कट गये,
हर दूसरा पंछी यहां तलवार लिये है .
हर पूजा अधूरी है बिना फूल के शायद,
हर फूल दिलों में ये अहंकार लिये है.
आता है झूमता हुआ इक डाकिये सा वो,
बादल है, बारिशों के समाचार लिये है.
जिसने बनाये ताज़ कटी उनकी उंगलियां,
सीने में यही दर्द तो फनक़ार लिये है. **
मैं उससे बिछड़ तो गया, इस पार हूं मगर,
वो मेरे ख्वाब आंख में उस पार लिये है. **
डा.अरविन्द चतुर्वेदी
हर आदमी अब हाथ में अखबार लिये है.
बगलों में तंत्र मंत्र की गठरी दबाये है,
अब संत भी आंखों में चमत्कार लिये है.
उड़ने की होड़ में हमारे पंख कट गये,
हर दूसरा पंछी यहां तलवार लिये है .
हर पूजा अधूरी है बिना फूल के शायद,
हर फूल दिलों में ये अहंकार लिये है.
आता है झूमता हुआ इक डाकिये सा वो,
बादल है, बारिशों के समाचार लिये है.
जिसने बनाये ताज़ कटी उनकी उंगलियां,
सीने में यही दर्द तो फनक़ार लिये है. **
मैं उससे बिछड़ तो गया, इस पार हूं मगर,
वो मेरे ख्वाब आंख में उस पार लिये है. **
डा.अरविन्द चतुर्वेदी
Tuesday, April 12, 2011
देश के लिये उठे हाथ
दिल्ली के जंतर मंतर पर 5 से 9 अप्रैल 2011 तक जो लोकतंत्र का यज्ञ हुआ, उस ने हम सब देशवासियों में नई आशा का संचार किया है. लोग भविष्य के प्रति आशांवित हैं और एक नये प्रकार का आत्मविश्वास उपजा है.
इस समूची उपलब्धि पर मेरे बह्त पुराने ( आई आई टी बम्बई 1976-77) मित्र व वैज्ञानिक डा. शाहिद अब्बास अब्बासी ने मुझे एक चार पंक्तियों की रचना भेजी है,मैं चाहता हूं सभी लोगों तक पहुंचे.

हर दश्त को भी अब से बहारें मिलें खुदा
हर शख्स खुश दिखे वो नज़ारे मिलें खुदा
जो चल पड़ा है कारवां अब ना रुके कभी
इस मुल्क को हज़ारों हज़ारे मिलें खुदा
- डा. शाहिद अब्बास अब्बासी, पोंडिचेरी विश्वविद्यालय , पुदुच्चेरी.
इस समूची उपलब्धि पर मेरे बह्त पुराने ( आई आई टी बम्बई 1976-77) मित्र व वैज्ञानिक डा. शाहिद अब्बास अब्बासी ने मुझे एक चार पंक्तियों की रचना भेजी है,मैं चाहता हूं सभी लोगों तक पहुंचे.

हर दश्त को भी अब से बहारें मिलें खुदा
हर शख्स खुश दिखे वो नज़ारे मिलें खुदा
जो चल पड़ा है कारवां अब ना रुके कभी
इस मुल्क को हज़ारों हज़ारे मिलें खुदा
- डा. शाहिद अब्बास अब्बासी, पोंडिचेरी विश्वविद्यालय , पुदुच्चेरी.
लेबल:
AnnaHazaare,
अन्ना हज़ारे,
डा.अब्बासी
Friday, March 18, 2011
मज़े लो होली में
नाचो दे दे ताल, मजे लो होली में,
गालों मलो गुलाल, मजे लो होली में.
रंग बिरंगे चेहरों में ढून्ढो धन्नो,
घर हो या ससुराल , मजे लो होली में.
हुश्न एक के चार नज़र आयें देखो,
एनक करे कमाल , मजे लो होली में
चढे भंग की गोली ,डगमग पैर चलें,
बहकी बहकी चाल, मजे लो होली में.
ऐश्वर्या जब तुम्हे पुकारे ‘अंकल जी’,
छूकर देखो गाल, मजे लो होली में
छेडछाड में पिट सकते हो ,भैया जी,
गैंडे जैसी खाल ? मजे लो होली में.
बीबी बोले मेरे संग खेलो होली,
बैठो सड्डे नाल , मजे लो होली में.
गालों मलो गुलाल, मजे लो होली में.
रंग बिरंगे चेहरों में ढून्ढो धन्नो,
घर हो या ससुराल , मजे लो होली में.
हुश्न एक के चार नज़र आयें देखो,
एनक करे कमाल , मजे लो होली में
चढे भंग की गोली ,डगमग पैर चलें,
बहकी बहकी चाल, मजे लो होली में.
ऐश्वर्या जब तुम्हे पुकारे ‘अंकल जी’,
छूकर देखो गाल, मजे लो होली में
छेडछाड में पिट सकते हो ,भैया जी,
गैंडे जैसी खाल ? मजे लो होली में.
बीबी बोले मेरे संग खेलो होली,
बैठो सड्डे नाल , मजे लो होली में.
Thursday, February 17, 2011
प्रधान मंत्री तो निरा भोन्दू है रे !!!!
ये कैसा सरदार है जो अपनी मज़बूरियां गिनाता है ?
बिना रीढ़ की हड्डी के हैं मनमोहन सिंह !!!!!
यह प्रधानमंत्री कुर्सी चिपकू है !!!!
कल की मीडिया कांफ्रेंस से मनमोहन सिंह के प्रशसकों को एक बडा धक्का लगा है. भले ही सरकार घिसट घिसट के चल रही हो, भले ही अर्थशास्त्री प्रधान मंत्री के रहते महंगायी ने अपने सारे पुराने रिकोर्ड तोड़ दिये हों, भले ही संप्रग की सरकार को घोटालों की सरकार की संज्ञा दी जाती रही हो, कम से कम मनमोहन सिंह पर व्यक्तिगत रूप से कीचड़ कम ही उछला गया था. ऐसा अब तक इसलिये हो रहा था क्यों कि मनमोहन जी ने अब तक अपना मुंह ही नहीं खोला था.
अब तो सारा मुलम्मा उतर गया. कलई खुल गयी और सारा का सारा भेद जग ज़ाहिर हो गया. अब तो कुछ भी छिपा नहीं रह गया. क्यों कि खुद प्रधान मंत्री जी ने सरेआम स्वीकार कर लिया कि उनके रीढ़ की हड्डी ही नहीं है.
देश गर्त में जाये तो जाये, सरकार में उनके मातहत मंत्री अरबों खरबों का चूना देश को लगा कर अपने खज़ाने भरते रहें , आम आदमी पिसता रहे, मगर मनमोहन जी चुप थे, चुप हैं और चुप रहेंगे क्योंकि ....”मैं नहीं चाहता कि सरकार गिर जाये और दुबारा चुनाव कराना पडे”
अरे भाई साफ साफ कहो न कि हम कुर्सी चिपकू हैं ,कुर्सी छोडेंगे नहीं , कुछ करेंगे भी नहीं. देश भाड़ में जाता है तो जाये. .... क्यों कि मैं कुछ बोलूंगा तो ..सरकार गिर जायेगी... मेरी गद्दी चली जायेगी. चुनाव करना पडेगा...
मैं तो गठबन्धन को बचाने के लिये प्रधानमंत्री बनाया गया हूं. मेरी आका ने कहा कि चाहे कुछ .... हां हां चाहे कुछ भी कीमत चुकाना पडे, सरकार नहीं गिरना चाहिये.
देश भाड़ में जाता है तो जाये.....
आदमी मरता है तो मरे... मेरी सरकार के मंत्री दोनों हाथों से देश को लूट रहे हों तो लूटें..
मैं चुप रहूंगा.... मैं चुनाव नहीं होने दूंगा.... गठबन्धन की मज़बूरी जो है...
मुझे दोष मत दो ... मैं भ्रष्टाचार नहीं देख पा रहा तो क्या हुआ? मैं क्या करूं अगर मेरे मंत्री देश लूट रहे हैं? गठबन्धन की सरकार है ना.... क्या आप ये छोटी सी बात भी नहीं समझते ?
क्या कहा? मैं भोन्दू हूं ? मेरी रीढ़ की हड्डी नहीं हैं ?
कुछ भी कह लो ... मैं नहीं हटूंगा..... मैं गद्दी नहीं छोडूंगा ... जै हिन्द... जै हिन्द ... जै गठबन्धन ... जै माता सोनिया....जै राहुल जी.....
बिना रीढ़ की हड्डी के हैं मनमोहन सिंह !!!!!
यह प्रधानमंत्री कुर्सी चिपकू है !!!!
कल की मीडिया कांफ्रेंस से मनमोहन सिंह के प्रशसकों को एक बडा धक्का लगा है. भले ही सरकार घिसट घिसट के चल रही हो, भले ही अर्थशास्त्री प्रधान मंत्री के रहते महंगायी ने अपने सारे पुराने रिकोर्ड तोड़ दिये हों, भले ही संप्रग की सरकार को घोटालों की सरकार की संज्ञा दी जाती रही हो, कम से कम मनमोहन सिंह पर व्यक्तिगत रूप से कीचड़ कम ही उछला गया था. ऐसा अब तक इसलिये हो रहा था क्यों कि मनमोहन जी ने अब तक अपना मुंह ही नहीं खोला था.
अब तो सारा मुलम्मा उतर गया. कलई खुल गयी और सारा का सारा भेद जग ज़ाहिर हो गया. अब तो कुछ भी छिपा नहीं रह गया. क्यों कि खुद प्रधान मंत्री जी ने सरेआम स्वीकार कर लिया कि उनके रीढ़ की हड्डी ही नहीं है.
देश गर्त में जाये तो जाये, सरकार में उनके मातहत मंत्री अरबों खरबों का चूना देश को लगा कर अपने खज़ाने भरते रहें , आम आदमी पिसता रहे, मगर मनमोहन जी चुप थे, चुप हैं और चुप रहेंगे क्योंकि ....”मैं नहीं चाहता कि सरकार गिर जाये और दुबारा चुनाव कराना पडे”
अरे भाई साफ साफ कहो न कि हम कुर्सी चिपकू हैं ,कुर्सी छोडेंगे नहीं , कुछ करेंगे भी नहीं. देश भाड़ में जाता है तो जाये. .... क्यों कि मैं कुछ बोलूंगा तो ..सरकार गिर जायेगी... मेरी गद्दी चली जायेगी. चुनाव करना पडेगा...
मैं तो गठबन्धन को बचाने के लिये प्रधानमंत्री बनाया गया हूं. मेरी आका ने कहा कि चाहे कुछ .... हां हां चाहे कुछ भी कीमत चुकाना पडे, सरकार नहीं गिरना चाहिये.
देश भाड़ में जाता है तो जाये.....
आदमी मरता है तो मरे... मेरी सरकार के मंत्री दोनों हाथों से देश को लूट रहे हों तो लूटें..
मैं चुप रहूंगा.... मैं चुनाव नहीं होने दूंगा.... गठबन्धन की मज़बूरी जो है...
मुझे दोष मत दो ... मैं भ्रष्टाचार नहीं देख पा रहा तो क्या हुआ? मैं क्या करूं अगर मेरे मंत्री देश लूट रहे हैं? गठबन्धन की सरकार है ना.... क्या आप ये छोटी सी बात भी नहीं समझते ?
क्या कहा? मैं भोन्दू हूं ? मेरी रीढ़ की हड्डी नहीं हैं ?
कुछ भी कह लो ... मैं नहीं हटूंगा..... मैं गद्दी नहीं छोडूंगा ... जै हिन्द... जै हिन्द ... जै गठबन्धन ... जै माता सोनिया....जै राहुल जी.....
लेबल:
ManMoahanSingh,
PM,
प्रधानमंत्री,
मनमोहन सिंह
Monday, January 3, 2011
Sunday, November 14, 2010
समीर भाई का दिल्ली मिलन : एक अनियमित ब्लोगर की ओर से एक अरपट
लगभग दो माह पूर्व समीरलाल जी की एक मेल प्राप्त हुई थी जिसमें सूचना थी कि 11 नवम्बर को दिल्ली आयेंगे. तारीख नोट कर ली गयी, फिर अगली सूचना का इंतज़ार रहा. दीवाली पर शुभकामना का आदान प्रदान हुआ ,परंतु समीर जी की ओर से दिल्ली आने का ज़िक्र न पाकर सोचा शायद कार्यक्रम बदल गया हो.
12 तारीख को मैने सोचा कि यदि समीरभाई आ रहे हैं तो किसी न किसी ब्लोग पर तो सूचना होगी ही. चिट्ठाजगत पर गया तो झकाझक टाइम्स और फिर नुक्कड से पूरी जानकारी मिली.तुरंत 13 तारीख के दोपहर बाद के अन्य कार्यक्रम रद्द किये और सूचना दे दी कि मैं भी पहुंचूंगा.
क़ई बार मिलते मिलते रह गये समीर भाई से. 2008 के सुनिता शानू जी के कार्यक्रम में पहुंच नहीं पाया. 2009 में अमरीका गया पर 21 दिन बिताकर भी कनाडा न जा सका. 2010 में फिर कार्यक्रम बना और समीर जी से तय भी हो गया कि नियग्रा फाल्स पर भेंट होगी .पर मेरे कुछ छात्रों को वीसा न मिला और फिर कार्यक्रम बदला.
शनिवार को लगभग 3 बजे ढूंढते ढूंढते नियत स्थान पहुंचा और दूर से ही अविनाश जी नज़र आ गये.बालेन्दु दाधीच जी के अतिरिक्त वहां एकत्र अन्य ब्लोगरों से अपरिचित था अत: परिचय कराया अविनाश जी ने.
चाय-पानी का एक दौर चल चुका था. ( वो वाली चाय गर्म थी-दीपक बाबा जी!!),मेरे लायक बिना चीनी की चाय भी थी.
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सक्रिय ब्लोगर व पाठक न होने के नाते 2008-09 मे ब्लोग जगत पर छाये बन्धुओं से अपरिचित था. पहले मिला तारकेश्वर गिरि जी से. मैने पूछा क्या लिखते हैं? उन्होने बताया कि मुख्यत: ब्लोग पर गन्दगी फैलाने वाले कुछ ब्लोगरों को कस कर जवाब देता हूं . उन्होने दो तीन ऐसे धतकर्मी ब्लोगरों के नाम भी गिनाये ... ( ...जाने भी दो यारो...)
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नीरज जाट जी मिले. कहा गया कि इनके ब्लोग पर एक पहेली आती है ,जो वाकई चुनौतीपूर्ण होती है. नीरज जी ने बताया के वह किसी ....अंटी..चोर से परेशान हैं ,जो बहुत मेहनत करके पहेली का हल खोज़ लेता है और अपने ब्लोग पर जाकर लिख देता है कि नीरज जाट की पहेली का उत्तर ..फलाना .. है. लोग पहले उस ब्लोग पर जाकर हल पढते हैं और फिर्..इस ब्लोग पर जवाब देते हैं... ******************************************************************
रचना जी मिलीं. 2007 के एकाधिक ब्लोगर सम्मेलन में भेंट हो चुकी थी. तब तक कुछ और मित्र भी जुड चुके थे. अचानक बहस जैसी छिड गयी कि लोग ब्लोग क्यों लिखते हैं . ज़ाहिर है राय भिन्न भिन्न थी. मैने इसमें जोड़ा कि यहां कोई रचना वापस करने वाला सम्पादक नहीं है. कोई भी भाव हो,भावना हो, विषय हो, या भाषा हो,साहित्य लिखिये,गाली दीजिये, सब चलता है... ******************************************************************
अजय झा जी से भी भेंट हुई, ब्लोग अनेक बार देखा था परंतु,मुलाकात पहली थी. सुरेश य़ादव , शेखावत जी, अनिल कौशिक जी, शाह्नवाज सिद्दीकी, आदि से परिचय हुआ-पहली बार. तब तक राजीव तनेजा भी आते दिखे. पुराने ब्लोगरों में से वह भी परिचित चेहरा थे.
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3.15 पर परिसर में एक गाडी घुसी और भारी भरकम शख्सियत उतरी ( या कहें अवतरित हुई) ,हां ,हां वही उड़न तश्तरी...
फिर सतीश सक्सेना जी से परिचय हुआ ,जो समीर जी के रथ के सारथी थे
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तय हुआ कि अन्दर हाल मे चला जाये .इस बीच जिस रफ्तार से भाइयों के फोनी कैमरे क्लिक हो रहे थे, लग रहा था कि कई ब्लोगर सचित्र विवरण देने वाले है.. यही सोच कर मैने अपने कैमरे को ज़हमत नहीं दी.... *******************************************************************
कार्यक्रम के बीच व अंत में जिन अन्य ब्लोगरों के नाम पता चला –विनोद पांडे, राम बाबू, टी एस दराल, पदम सिंह, एम वर्मा,दीपक बाबा. कार्यक्रम शुरु होनेपर पधारे – सुनीता शानू जी, निर्मल वैद्य, अपुर्व बजाज, मोहिन्दर कुमार जी...
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अनिल कौशिक जी ने प्रायोजक का परिचय भी दिया और बीज वक्तव्य भी क्योंकि अविनाश जी को मोबाइल से फुर्सत ही नहीं मिल रही थी. फिर सुरेश यादव जी के साथ परिचय शुरु हुआ. सब दो दो मिनट बोलते रहे. अधिकांश ने अपने ब्लोग का परिचय भी दिया और ब्लोग –ब्लोगिंग –ब्लोगर पर लघु वक्तव्य भी. मुख्य वक्ताओं में बालेन्दु शर्मा जी ने चेताया कि 2010 के आंकड़ों के अनुसार ब्लोगरी बढ तो रही है ,परंतु विकास की दर कम हो रही है.उन्होने प्रश्न चिन्ह लगाया के कहीं हम कम समय में बहुत ज्यादा पाने की उम्मीद तो नहीं कर रहे.मज़ेदार रहा उनकी पांच पृष्ठों का कविता पाठ. इस खोज पूर्ण व व्यंग्य बाणों से भरी कविता में जैसे ही किसी ब्लोग्गर ( टाइप) का ज़िक्र आताअ, सतीश जी पूछते –यह आप्पने बारे में ही कह रहे हैं ना ? एक बार जब बिना पढे टिप्पणी करने का जिक्र हुआ ,तो समीर भाई ने धीरे से पूछा-यह किसके बारे में है?
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प्रसिद्ध व्यंग्यकार प्रेम जनमेजय जी पर अध्यक्षता मानो थोप सी गयी .कहा गया कि आप वरिष्ठ हैं अत: आपं अंत में बोलेंगे. प्रेम जी ने वरिष्ठता लेने से सरासर इंकार कर दिया और चन्द वाक्यों मे वाचस्पति जी को धन्यवाद देकर अपना वक्तव्य समाप्त घोषित कर दिया. उन्होने कहा कि मुझे तो अविनाश जी ने सिखाया है और मैं तो छोटा सा ब्लोगर ही हूं *******************************************************************
अब बारी थी मुख्य अतिथि समीर जी की. उन्होने ब्लोगिंग के प्रयोजन, मंतव्य, उपयोगिता ,विकास , भविष्य सभी विषयों को समेटा.एक विषय पर उनकी रचना जी से लम्बी बहस होते होते बचाई अनिल कौशिक जी ने . बह्स थी कि आप अपने ही घर मे नया ब्लोगर क्यों नहीं बनाते. रचना जी का आग्र्ह था कि पुरुष ब्लोगरों को चाहिये कि वे अपनी पत्नियों को भी ब्लोग लिखना सिखाये ताकि पाठक भी बढॆं और लेखक भी.
समीर जी ने अपने शरीर के अनुपात में भारी भरकम तर्क पेश किये. मैदान तो उन्हे मारना ही था.
फुरसतिया वाले अनूप शुक्ल जी का जिक्र भी आया. सतीश सक्सेना जी ने कहा कि कहा जायेगा कि मैं समीर जी के गुट में आ गया हूं. समीर भाई ने बताया कि वह किसी विवाद में नहीं रहते,न किसी विवाद पर टिप्पणी ही करते हैं .उनका किसी के प्रति दुराव नहीं है, न वह किसी के विरोधी गुट में हैं.
उन्होने माना के अनूप शुकल जी उनके गुरु हैं और वह गुरु के विरोध में कैसे हो सकते हैं ?
******************************************************************
अंत मे ग्रुप फोटो का प्रस्ताव था ,परंतु यू एन आई टी वी वाले आ गये तो व्यवधान हो गया.लोग तितर बितर से होरहे थे क्यों कि बाहर ( गर्म? ) चाय का एक और दौर था.
मुझे फिर फीकी चाय मिल गयी थी. मैं प्रसन्न भी था . संतुष्ट भी. एक एक कर के सब से बिदा ली और मैं ये गया...वो गया.... *******************************************************************
प्रवासी संसार, नुक्क्ड ,अविनाश जी व अन्य आयोजकों को धन्यवाद.
12 तारीख को मैने सोचा कि यदि समीरभाई आ रहे हैं तो किसी न किसी ब्लोग पर तो सूचना होगी ही. चिट्ठाजगत पर गया तो झकाझक टाइम्स और फिर नुक्कड से पूरी जानकारी मिली.तुरंत 13 तारीख के दोपहर बाद के अन्य कार्यक्रम रद्द किये और सूचना दे दी कि मैं भी पहुंचूंगा.
क़ई बार मिलते मिलते रह गये समीर भाई से. 2008 के सुनिता शानू जी के कार्यक्रम में पहुंच नहीं पाया. 2009 में अमरीका गया पर 21 दिन बिताकर भी कनाडा न जा सका. 2010 में फिर कार्यक्रम बना और समीर जी से तय भी हो गया कि नियग्रा फाल्स पर भेंट होगी .पर मेरे कुछ छात्रों को वीसा न मिला और फिर कार्यक्रम बदला.
शनिवार को लगभग 3 बजे ढूंढते ढूंढते नियत स्थान पहुंचा और दूर से ही अविनाश जी नज़र आ गये.बालेन्दु दाधीच जी के अतिरिक्त वहां एकत्र अन्य ब्लोगरों से अपरिचित था अत: परिचय कराया अविनाश जी ने.
चाय-पानी का एक दौर चल चुका था. ( वो वाली चाय गर्म थी-दीपक बाबा जी!!),मेरे लायक बिना चीनी की चाय भी थी.
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सक्रिय ब्लोगर व पाठक न होने के नाते 2008-09 मे ब्लोग जगत पर छाये बन्धुओं से अपरिचित था. पहले मिला तारकेश्वर गिरि जी से. मैने पूछा क्या लिखते हैं? उन्होने बताया कि मुख्यत: ब्लोग पर गन्दगी फैलाने वाले कुछ ब्लोगरों को कस कर जवाब देता हूं . उन्होने दो तीन ऐसे धतकर्मी ब्लोगरों के नाम भी गिनाये ... ( ...जाने भी दो यारो...)
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नीरज जाट जी मिले. कहा गया कि इनके ब्लोग पर एक पहेली आती है ,जो वाकई चुनौतीपूर्ण होती है. नीरज जी ने बताया के वह किसी ....अंटी..चोर से परेशान हैं ,जो बहुत मेहनत करके पहेली का हल खोज़ लेता है और अपने ब्लोग पर जाकर लिख देता है कि नीरज जाट की पहेली का उत्तर ..फलाना .. है. लोग पहले उस ब्लोग पर जाकर हल पढते हैं और फिर्..इस ब्लोग पर जवाब देते हैं... ******************************************************************
रचना जी मिलीं. 2007 के एकाधिक ब्लोगर सम्मेलन में भेंट हो चुकी थी. तब तक कुछ और मित्र भी जुड चुके थे. अचानक बहस जैसी छिड गयी कि लोग ब्लोग क्यों लिखते हैं . ज़ाहिर है राय भिन्न भिन्न थी. मैने इसमें जोड़ा कि यहां कोई रचना वापस करने वाला सम्पादक नहीं है. कोई भी भाव हो,भावना हो, विषय हो, या भाषा हो,साहित्य लिखिये,गाली दीजिये, सब चलता है... ******************************************************************
अजय झा जी से भी भेंट हुई, ब्लोग अनेक बार देखा था परंतु,मुलाकात पहली थी. सुरेश य़ादव , शेखावत जी, अनिल कौशिक जी, शाह्नवाज सिद्दीकी, आदि से परिचय हुआ-पहली बार. तब तक राजीव तनेजा भी आते दिखे. पुराने ब्लोगरों में से वह भी परिचित चेहरा थे.
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3.15 पर परिसर में एक गाडी घुसी और भारी भरकम शख्सियत उतरी ( या कहें अवतरित हुई) ,हां ,हां वही उड़न तश्तरी...
फिर सतीश सक्सेना जी से परिचय हुआ ,जो समीर जी के रथ के सारथी थे
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तय हुआ कि अन्दर हाल मे चला जाये .इस बीच जिस रफ्तार से भाइयों के फोनी कैमरे क्लिक हो रहे थे, लग रहा था कि कई ब्लोगर सचित्र विवरण देने वाले है.. यही सोच कर मैने अपने कैमरे को ज़हमत नहीं दी.... *******************************************************************
कार्यक्रम के बीच व अंत में जिन अन्य ब्लोगरों के नाम पता चला –विनोद पांडे, राम बाबू, टी एस दराल, पदम सिंह, एम वर्मा,दीपक बाबा. कार्यक्रम शुरु होनेपर पधारे – सुनीता शानू जी, निर्मल वैद्य, अपुर्व बजाज, मोहिन्दर कुमार जी...
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अनिल कौशिक जी ने प्रायोजक का परिचय भी दिया और बीज वक्तव्य भी क्योंकि अविनाश जी को मोबाइल से फुर्सत ही नहीं मिल रही थी. फिर सुरेश यादव जी के साथ परिचय शुरु हुआ. सब दो दो मिनट बोलते रहे. अधिकांश ने अपने ब्लोग का परिचय भी दिया और ब्लोग –ब्लोगिंग –ब्लोगर पर लघु वक्तव्य भी. मुख्य वक्ताओं में बालेन्दु शर्मा जी ने चेताया कि 2010 के आंकड़ों के अनुसार ब्लोगरी बढ तो रही है ,परंतु विकास की दर कम हो रही है.उन्होने प्रश्न चिन्ह लगाया के कहीं हम कम समय में बहुत ज्यादा पाने की उम्मीद तो नहीं कर रहे.मज़ेदार रहा उनकी पांच पृष्ठों का कविता पाठ. इस खोज पूर्ण व व्यंग्य बाणों से भरी कविता में जैसे ही किसी ब्लोग्गर ( टाइप) का ज़िक्र आताअ, सतीश जी पूछते –यह आप्पने बारे में ही कह रहे हैं ना ? एक बार जब बिना पढे टिप्पणी करने का जिक्र हुआ ,तो समीर भाई ने धीरे से पूछा-यह किसके बारे में है?
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प्रसिद्ध व्यंग्यकार प्रेम जनमेजय जी पर अध्यक्षता मानो थोप सी गयी .कहा गया कि आप वरिष्ठ हैं अत: आपं अंत में बोलेंगे. प्रेम जी ने वरिष्ठता लेने से सरासर इंकार कर दिया और चन्द वाक्यों मे वाचस्पति जी को धन्यवाद देकर अपना वक्तव्य समाप्त घोषित कर दिया. उन्होने कहा कि मुझे तो अविनाश जी ने सिखाया है और मैं तो छोटा सा ब्लोगर ही हूं *******************************************************************
अब बारी थी मुख्य अतिथि समीर जी की. उन्होने ब्लोगिंग के प्रयोजन, मंतव्य, उपयोगिता ,विकास , भविष्य सभी विषयों को समेटा.एक विषय पर उनकी रचना जी से लम्बी बहस होते होते बचाई अनिल कौशिक जी ने . बह्स थी कि आप अपने ही घर मे नया ब्लोगर क्यों नहीं बनाते. रचना जी का आग्र्ह था कि पुरुष ब्लोगरों को चाहिये कि वे अपनी पत्नियों को भी ब्लोग लिखना सिखाये ताकि पाठक भी बढॆं और लेखक भी.
समीर जी ने अपने शरीर के अनुपात में भारी भरकम तर्क पेश किये. मैदान तो उन्हे मारना ही था.
फुरसतिया वाले अनूप शुक्ल जी का जिक्र भी आया. सतीश सक्सेना जी ने कहा कि कहा जायेगा कि मैं समीर जी के गुट में आ गया हूं. समीर भाई ने बताया कि वह किसी विवाद में नहीं रहते,न किसी विवाद पर टिप्पणी ही करते हैं .उनका किसी के प्रति दुराव नहीं है, न वह किसी के विरोधी गुट में हैं.
उन्होने माना के अनूप शुकल जी उनके गुरु हैं और वह गुरु के विरोध में कैसे हो सकते हैं ?
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अंत मे ग्रुप फोटो का प्रस्ताव था ,परंतु यू एन आई टी वी वाले आ गये तो व्यवधान हो गया.लोग तितर बितर से होरहे थे क्यों कि बाहर ( गर्म? ) चाय का एक और दौर था.
मुझे फिर फीकी चाय मिल गयी थी. मैं प्रसन्न भी था . संतुष्ट भी. एक एक कर के सब से बिदा ली और मैं ये गया...वो गया.... *******************************************************************
प्रवासी संसार, नुक्क्ड ,अविनाश जी व अन्य आयोजकों को धन्यवाद.
लेबल:
ब्लॉगर मिलन्,
समीर लाल
Tuesday, September 28, 2010
साहित्यकार एवम पत्रकार श्री कन्हैया लाल नन्दन : एक श्रद्धांजलि
नन्दन जी नाम तो धर्मयुग के समय से ही सुनता आ रहा था. उन्हे देखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ 1981 में . 10,दरियागंज से टाइम्स की पत्रिकायें निकलती थी. इस बिल्डिंग के ठीक सामने एक छोटी सी चाय की दुकान थी जिसे एक सरदार जी चलाते थे. मैं विज्ञापन एजेंसी ACIL की research division में senior executive था और कलकत्ता से ट्रांसफर हो कर दिल्ली आया था और वहीं पास में मेरा कार्यालय था. लंच के समय वहां चाय पीने के बहाने नियमित आने वालों में थे महेश दर्पण, सुभाष अखिल, सुरेश उनियाल, धीरेन्द्र अस्थाना,रमेश बत्रा. कभी कभी यहां अन्य बडे लेखकों कहानी कारों, पत्रकारों के दर्शन हो जाया करते थे.ऐसे एक बार नदन जी से भी मिलना हुआ. ( वहां एकाध बार सर्वेश्वर जी, योगेश गुप्त, आनन्द स्वरूप वर्मा ,अवध नाराय्ण मुद्गल आदि से भी सामना हुआ था). मैं उन दिनों 'वामा' पत्रिका के लिये लिखता था ( सुश्री मृणाल पांडे सम्पादक थीं),बाद में दस दरियागंज से प्रकाशित 'दिनमान' में भी लिखा,जब सतीश झा सम्पादक बने थे.
कविता का शौक था अत: साहित्यकारों का सानिध्य भाता था. उन्ही दिनों दूरदर्शन पर किसी कवि सम्मेलन मे नन्दन जी की वह कविता जिसमें वह समुद्र से वार्तालाप करते हैं सुनी.जिसमें वह समुद्र को उसके पानी के खारेपन के अतिरिक्त अन्य खामियां गिनाते हैं , बस वहीं से मैं श्री नन्दन का प्रशंसक बन गया. उसके बाद तो जैसे जैसे उन्हे पढता और सुनता गया ,उतना हे उनके प्रति सकारात्मक भाव बनते गये.
मैं मालवीय नगर में रहता था. वहीं एक बार 'सागर रत्ना' नामक रेस्त्रां में उनसे भेंट हुई. मैं कानपुर का हूं और यह जानकर खुशी हुई कि नन्दन जी का समय भी कानपुर में बीता तो आत्मीयता बढी.
बाद में जब मेरी पहला कविता संग्रह 'नक़ाबों के शहर में' प्रकाशित हुआ( जिसकी भूमिका डा. केदार नाथ सिंह् ने लिखी थी)तो इसकी एक प्रति मैने नन्दन जी को भी भेंट की. उनदिनों नन्दन जी एक स्तम्भ 'जरिया-नजरिया' लिखते थे और इसी स्तम्भ में उन्होने 'मेरी पसन्द' नाम से कुछ कवितायें देना प्रारम्भ किया. इसी स्तम्भ में उन्होने मेरी एक कविता का ज़िक्र भी किया और मेरा परिचय भी अपने स्तम्भ में दिया. मैं गद्गद हुआ और उनके घर ( 132 कैलाश हिल्ल्स) जाकर मिला.
1999 में मेरा गज़ल संग्रह प्रकाशनाधीन था. मेरे अनुरोध पर वह उसकी भूमिका लिखने के लिये तैयार हो गये.( देखें उनके हस्त-लिखित अग्रलेख की प्रति). मेरी गज़लों पर प्रतिक्रिया देते हुए उन्होने लिखा "... और इस तरह अरविन्द जी दुष्यंत की जलाई हुई मशाल का दंडमूल थामे आगे बढते हुए नज़र आते हैं ..". इस अग्र-लेख का शीर्षक भी उन्होने ही दिया- " इंसानी ज़िन्दगी के अक्स"
फिर वह गिरने से चोट लगने के कारण AIIMS में भर्ती रहे तो उन्हे देखने भी गया. उन्हे बातचीत में जानकारी हो गयी थी कि मेरी पत्नी provident fund ( भविष्य निधि ) में प्रवर्तन अधिकारी हैं . उन्हे अपनी पुराने नियोक्ता से धनराशि मिलने में कुछ कठिनाई हो रही थी. मेरे अनुरोध ( कि मैं उनके घर आकर जानकारी ले लूंगा) करने के बावज़ूद वह स्वयं मेरे घर आये और सारे कागज़ -आदि सौंप गये.


फिर जब उनका संग्रह ' बंजर धरती पर इन्द्र धनुष' ( जो उनके स्तम्भ -मेरी पसन्द - में छपी कविताओं आदि का संग्रहीत रूप था), तो इसमें भी उन्होने मेरी कविता को स्थान दिया ( पृष्ठ 155-156, देखें स्कैन प्रति).इस पुस्तक के विमोचन पर जो डा. कर्ण सिंह ने किया था, दिल्ली का पूरा साहित्य जगत उपस्थित था.


मेरी उनसे अंतिम मुलाक़ात पिछले वर्ष एक साहित्यिक गोष्ठी में हुई थी ,जिसमे उन्होने मेरी पसन्द की कविता 'सूरज की पेशी' सुनाई थी. मैने कुछ दोहे व गज़ल पढी थीं जिसे उन्होने सराहा .
बहुत कम ही ऐसे साहित्यकार रहे हैं जो स्फल पत्रकार भी बने . टाइम्स समूह में यह परम्परा ही रही.नन्दन जी इन्ही गिने चुने साहित्यकारों मे से थे. बाद में एलेक्ट्रोनिक मीडिया आने के बाद भी वह इन-चैनल के सम्पादक रहे.
नन्दन जी अपने प्रिय पाठकों, मित्रों, सहकर्मियों आदि में अपने स्वभाव के चलते लोकप्रिय बने रहे. वह ऐसी शख्सियत नहीं थे जो आसानी से भुलाई जा सके.
मेरी श्रद्धांजलि.




कविता का शौक था अत: साहित्यकारों का सानिध्य भाता था. उन्ही दिनों दूरदर्शन पर किसी कवि सम्मेलन मे नन्दन जी की वह कविता जिसमें वह समुद्र से वार्तालाप करते हैं सुनी.जिसमें वह समुद्र को उसके पानी के खारेपन के अतिरिक्त अन्य खामियां गिनाते हैं , बस वहीं से मैं श्री नन्दन का प्रशंसक बन गया. उसके बाद तो जैसे जैसे उन्हे पढता और सुनता गया ,उतना हे उनके प्रति सकारात्मक भाव बनते गये.
मैं मालवीय नगर में रहता था. वहीं एक बार 'सागर रत्ना' नामक रेस्त्रां में उनसे भेंट हुई. मैं कानपुर का हूं और यह जानकर खुशी हुई कि नन्दन जी का समय भी कानपुर में बीता तो आत्मीयता बढी.
बाद में जब मेरी पहला कविता संग्रह 'नक़ाबों के शहर में' प्रकाशित हुआ( जिसकी भूमिका डा. केदार नाथ सिंह् ने लिखी थी)तो इसकी एक प्रति मैने नन्दन जी को भी भेंट की. उनदिनों नन्दन जी एक स्तम्भ 'जरिया-नजरिया' लिखते थे और इसी स्तम्भ में उन्होने 'मेरी पसन्द' नाम से कुछ कवितायें देना प्रारम्भ किया. इसी स्तम्भ में उन्होने मेरी एक कविता का ज़िक्र भी किया और मेरा परिचय भी अपने स्तम्भ में दिया. मैं गद्गद हुआ और उनके घर ( 132 कैलाश हिल्ल्स) जाकर मिला.
1999 में मेरा गज़ल संग्रह प्रकाशनाधीन था. मेरे अनुरोध पर वह उसकी भूमिका लिखने के लिये तैयार हो गये.( देखें उनके हस्त-लिखित अग्रलेख की प्रति). मेरी गज़लों पर प्रतिक्रिया देते हुए उन्होने लिखा "... और इस तरह अरविन्द जी दुष्यंत की जलाई हुई मशाल का दंडमूल थामे आगे बढते हुए नज़र आते हैं ..". इस अग्र-लेख का शीर्षक भी उन्होने ही दिया- " इंसानी ज़िन्दगी के अक्स"
फिर वह गिरने से चोट लगने के कारण AIIMS में भर्ती रहे तो उन्हे देखने भी गया. उन्हे बातचीत में जानकारी हो गयी थी कि मेरी पत्नी provident fund ( भविष्य निधि ) में प्रवर्तन अधिकारी हैं . उन्हे अपनी पुराने नियोक्ता से धनराशि मिलने में कुछ कठिनाई हो रही थी. मेरे अनुरोध ( कि मैं उनके घर आकर जानकारी ले लूंगा) करने के बावज़ूद वह स्वयं मेरे घर आये और सारे कागज़ -आदि सौंप गये.


फिर जब उनका संग्रह ' बंजर धरती पर इन्द्र धनुष' ( जो उनके स्तम्भ -मेरी पसन्द - में छपी कविताओं आदि का संग्रहीत रूप था), तो इसमें भी उन्होने मेरी कविता को स्थान दिया ( पृष्ठ 155-156, देखें स्कैन प्रति).इस पुस्तक के विमोचन पर जो डा. कर्ण सिंह ने किया था, दिल्ली का पूरा साहित्य जगत उपस्थित था.


मेरी उनसे अंतिम मुलाक़ात पिछले वर्ष एक साहित्यिक गोष्ठी में हुई थी ,जिसमे उन्होने मेरी पसन्द की कविता 'सूरज की पेशी' सुनाई थी. मैने कुछ दोहे व गज़ल पढी थीं जिसे उन्होने सराहा .
बहुत कम ही ऐसे साहित्यकार रहे हैं जो स्फल पत्रकार भी बने . टाइम्स समूह में यह परम्परा ही रही.नन्दन जी इन्ही गिने चुने साहित्यकारों मे से थे. बाद में एलेक्ट्रोनिक मीडिया आने के बाद भी वह इन-चैनल के सम्पादक रहे.
नन्दन जी अपने प्रिय पाठकों, मित्रों, सहकर्मियों आदि में अपने स्वभाव के चलते लोकप्रिय बने रहे. वह ऐसी शख्सियत नहीं थे जो आसानी से भुलाई जा सके.
मेरी श्रद्धांजलि.




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Nandan KL,
कन्हैयालाल नन्दन
Wednesday, September 22, 2010
टाइम्स ओफ इंडिया-खबर बेटे की या बाप की? रिपोर्टर को भी नहीं पता ? Times of India :ALL in the FAMILY ??
सम्पादक तो सम्पादक ,रिपोर्टर को भी नहीं पता कि क्या पिछले दिन क्या खबर लगायी गयी थी और उसका क्या फोलो-अप जाना है. खबर बाप की और फोलो-अप बेटे का.
जी हां ,प्रतिष्ठित 'राष्ट्रीय" दैनिक टाइम्स ओफ इंडिया का है यह हाल.
पहली ख़बर छपी 17 सितम्बर को . पूर्व कानून मंत्री शांती भूषण के हवाले से . रिपोर्टर धनंजय महापात्र ने लिखा कि श्री भूषण ने मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिख कर कहा कि कि 16 पूर्व मुख्य न्यायाधीशों में से कम से कम आठ् निश्चित रूप से भ्रष्ट थे . ज़ाहिर है ऐसा कहने से उनके ऊपर कोर्ट की अवमानना का मामला बन सकता था. खबर में कहा गया था कि श्री शांती भूषण ने चुनौती देते हुए यह आरोप लगाये और कहा कि यदि हिम्मत है तो मेरे ऊपर अवमानना का केस दर्ज़ किया जाये.

खबर महत्वपूर्ण तो थी ही. अनेक लोगों ने श्री शांतीभूषण ने इस कदम को सराहनीय और वाकई साहसी, हिम्मत वाला बताया . ( मैने तो तुरंत ट्विटर Twitter पर अपनी टिप्पणी भी दे डाली, देखें : http://twitter.com/ArvindChaturved
http://twitter.com/bhaarateeyam
मैने तो अपनी टिप्पणी में twitter पर लिखा कि श्री शांतीभूषण को एक कदम बढ़ कर उनके नामों का खुलासा करना चाहिये.
दो दिन बाद 19 सितम्बर के Time of India में पहले पेज पर छपी खबर देखकर चोंकने की बारी मेरी थी. श्री शांतीभूषण वाली 17 सितम्बर की खबर का फोलो-अप था और इसमें श्री शांतीभूषण का ज़िक्र न होकर उनके बेटे ( और वकील ) प्रशांत भूषन का नाम आ रहा था. मुझे लगा कि मैने ही गलत पढा होगा. मैने खबर की पुष्टि के लिये इसी अखबार की website देखी .

उसी रिपोर्टर (धंनंजय महापात्र) ने दो दिन बाद जाने वाले फोलो-अप् में लिखा कि श्री प्रशांत भूषण ( जिन पर अवमानना का मामला दर्ज़ किये जाने की सम्भावना है) ने आज उन नामों का खुलासा करते हुए प्रमाण भी प्रस्तुत किये .
अब खबर का तो मलीदा बन गया ना?
खबर की तो जान ही निकल गयी. 17 तारीख को कुछ आरोप लगाये श्री शांती भूषण ने और 19 सितम्बर की रपट में उनके नाम्को गायब करके छाप दिया नाम उनके बेटे का.!!!
वाह टाइम्स ओफ इंडिया वाह !!!
मैं सोच रहा था कि चलो भूल हो गयी पर शायद अगले दिन /या उससे भी अगले दिन सम्पादक् की ओर से कुछ क्षमा याचना तो होगी ही अखबार के पहले पेज पर.
परंतु रिपोर्टर तो रिपोर्टर ,शायद सम्पादक महोदय ने भी नहीं पढी यह खबरें.
यह हाल है हमारे राष्ट्रीय मीडिया का.
जी हां ,प्रतिष्ठित 'राष्ट्रीय" दैनिक टाइम्स ओफ इंडिया का है यह हाल.
पहली ख़बर छपी 17 सितम्बर को . पूर्व कानून मंत्री शांती भूषण के हवाले से . रिपोर्टर धनंजय महापात्र ने लिखा कि श्री भूषण ने मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिख कर कहा कि कि 16 पूर्व मुख्य न्यायाधीशों में से कम से कम आठ् निश्चित रूप से भ्रष्ट थे . ज़ाहिर है ऐसा कहने से उनके ऊपर कोर्ट की अवमानना का मामला बन सकता था. खबर में कहा गया था कि श्री शांती भूषण ने चुनौती देते हुए यह आरोप लगाये और कहा कि यदि हिम्मत है तो मेरे ऊपर अवमानना का केस दर्ज़ किया जाये.
खबर महत्वपूर्ण तो थी ही. अनेक लोगों ने श्री शांतीभूषण ने इस कदम को सराहनीय और वाकई साहसी, हिम्मत वाला बताया . ( मैने तो तुरंत ट्विटर Twitter पर अपनी टिप्पणी भी दे डाली, देखें : http://twitter.com/ArvindChaturved
http://twitter.com/bhaarateeyam
मैने तो अपनी टिप्पणी में twitter पर लिखा कि श्री शांतीभूषण को एक कदम बढ़ कर उनके नामों का खुलासा करना चाहिये.
दो दिन बाद 19 सितम्बर के Time of India में पहले पेज पर छपी खबर देखकर चोंकने की बारी मेरी थी. श्री शांतीभूषण वाली 17 सितम्बर की खबर का फोलो-अप था और इसमें श्री शांतीभूषण का ज़िक्र न होकर उनके बेटे ( और वकील ) प्रशांत भूषन का नाम आ रहा था. मुझे लगा कि मैने ही गलत पढा होगा. मैने खबर की पुष्टि के लिये इसी अखबार की website देखी .

उसी रिपोर्टर (धंनंजय महापात्र) ने दो दिन बाद जाने वाले फोलो-अप् में लिखा कि श्री प्रशांत भूषण ( जिन पर अवमानना का मामला दर्ज़ किये जाने की सम्भावना है) ने आज उन नामों का खुलासा करते हुए प्रमाण भी प्रस्तुत किये .
अब खबर का तो मलीदा बन गया ना?
खबर की तो जान ही निकल गयी. 17 तारीख को कुछ आरोप लगाये श्री शांती भूषण ने और 19 सितम्बर की रपट में उनके नाम्को गायब करके छाप दिया नाम उनके बेटे का.!!!
वाह टाइम्स ओफ इंडिया वाह !!!
मैं सोच रहा था कि चलो भूल हो गयी पर शायद अगले दिन /या उससे भी अगले दिन सम्पादक् की ओर से कुछ क्षमा याचना तो होगी ही अखबार के पहले पेज पर.
परंतु रिपोर्टर तो रिपोर्टर ,शायद सम्पादक महोदय ने भी नहीं पढी यह खबरें.
यह हाल है हमारे राष्ट्रीय मीडिया का.
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