पिछले आठ माह में सिर्फ तीन -चार पोस्ट ही लिख पाया और अंत में घोषित भी कर दिया था कि कुछ दिनों तक व्यस्तता के कारण ब्लोग पर नहीं दिखूंगा.
तीन दिन पहले औपचारिक दस्तक भी दी थी ,और कहा था कि: " चौंकना मत ..अगर मेरी दस्तक सुनो".
और अब दस्तक के बाद हाज़िर हूं ,फिर से.
इन दिनों बहुत कुछ भोगा, बहुत कुछ सहा. अनेक बार मन हुआ कि कुछ लिखूं पर .....
दरअसल ,मैं आई आई टी दिल्ली में शोध छात्र (हूं) था, और शोध प्रबन्ध को अंतिम रूप देने में व्यस्त था. 30 दिसम्बर को अपना शोध प्रबन्ध प्रस्तुत कर दिया ,तब जाकर दिल को सुकून हुआ. लगा कि एक बडी जिम्मेदारी से मुक्त हुआ.
मैं अपने मित्रों से भी क्षमा चाहूंगा कि उनके ब्लोग भी पढ नहीं सका , इस दौरान टिप्पणी भी नहीं कर सका ,हालांकि नुकसान मेरा ही रहा क्योंकि अनेक पढने ,गुनने और सीखने योग्य सामग्री से वंचित ही रहा .
कुछ मित्रों के आमंत्रण पर उनके साथ उपस्थित भी न हो सका.मुझे विश्वास है, मित्र गण अन्यथा न लेंगें.
पिछले तीन दिनों में एग्रीगेटर के माध्यम से बहुत कुछ पढा तो जाना कि आखिर ब्लोग पर क्या क्या चल रहा है.
पिछले वर्ष की तरह ,पुन: सक्रिय होने का प्रयास करूंगा.
तो..... मिलता हूं.
Sunday, January 4, 2009
Friday, January 2, 2009
चौंकना मत अगर मेरी दस्तक सुनो
चौंकना मत अगर मेरी दस्तक सुनो
देके आने की पहले, खबर आऊंगा.
दूर था इसलिये सबने देखा नहीं
हर जगह देखना अब नज़र आऊंगा.
-अरविन्द चतुर्वेदी
देके आने की पहले, खबर आऊंगा.
दूर था इसलिये सबने देखा नहीं
हर जगह देखना अब नज़र आऊंगा.
-अरविन्द चतुर्वेदी
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Sunday, September 21, 2008
कवि सम्मेलन
महाराष्ट्र मित्र मंडल द्वारा गणेशोत्सव 2008 के अवसर पर इस माह की 3 तारीख को द्वारका ( नई दिल्ली )में एक भव्य कवि सम्मेलन आयोजित किया गया. अध्यक्षता वरिष्ठ कवि श्री लक्ष्मी शंकर बाजपेयी ने की एवं संचालन डा. कीर्ति काले ने किया. सम्मेलन का प्रारम्भ कीर्ति काले द्वारा प्रस्तुत सरस्वती वन्दना से हुआ. तत्पश्चात मनोहरलाल रत्नम ने हास्य रचनाएं सुनाकर श्रोतागणों को हंसाया. फिर रमेश गंगेले ,अरविन्द चतुर्वेदी,अशोक शर्मा ,महेश गर्ग बेधडक अमर नाथ अमर ,दिनेश रघुवंशी,कीर्ति काले का काव्य पाठ हुआ. समापन लक्ष्मी शंकर बाजपेयी की मधुर रचनाओं केसाथ हुआ. इस अवसर पर काव्य पाठ के कुछ अंश प्रस्तुत हैं. (शेष बाद में प्रस्तुत करूंगा)
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कवि सम्मलेन
Monday, July 14, 2008
दुमदार दोहे : महंगाई और न्यूक्लियर डील
पिछले कुछ कवि सम्मेलनों में मैने राजनैतिक सन्दर्भ वाले कुछ दुमदार दोहे सुनाये एवम श्रोताओं ने इन्हे बहुत पसन्द किया.
प्रस्तुत हैं कुछ ऐसे ही दुमदार दोहे .
कम्युनिस्टों के खेल ने किया रंग में भंग,
आडवाणी जी पीटते घर में ढोल मृदंग .
गीत सावन के गायें,
चलो सरकार बनायें.
अमर सिंह जी कर रहे तेरह मे से तीन,
मनमोहन निश्चिंत हो ,बजा रहे हैं बीन.
दाल में कुछ है काला,
समर्थन मिलने वाला .
डील डील सब कर रहे ,इसका ओर न छोर,
सिंह मुलायम देखते अमरीका की ओर.
दूर की कौडी लाई
ज़ेब में सी बी आई.
शिरडी पहुंची सोनिया, लेने आशिर्वाद,
जनता भई नाराज तो, आये सांई याद .
बडा गडबड घोटाला,
इलेक्शन आने वाला.
यू पी में हल्ला मचा, हाय हाय चहुं ओर
माल सहारा तोड दे, माया का है ज़ोर.
न लेना इससे पंगा
करा देगी ये दंगा.
साइकल महंगी हो गयी ,इसका क्या है राज ?
दाम तेल के बढ गये, साइकल पर शिवराज.
सी एम अब काम करेगें
कार के दाम गिरेंगे .
मुझसे यूं कहने लगे चिदम्बरम महाराज
महंगा है पेट्रोल तो, होता क्यूं नाराज ?
ज़रा सा पैदल चल ले,
पैर मज़बूत तू कर ले .
राबडी जी कहने लगीं,कर घूंघट की ओट
अगले आम चुनाव में हमको देना वोट .
किचन में आलू होंगे
मिनिस्टर लालू होंगे .
संसद में नारे लगे ,सुन लो माई बाप
आधी महिला सीट हों,आधे पर हों आप .
चेयर पर नारी होगी,
सभी पर भारी होगी.
प्रस्तुत हैं कुछ ऐसे ही दुमदार दोहे .
कम्युनिस्टों के खेल ने किया रंग में भंग,
आडवाणी जी पीटते घर में ढोल मृदंग .
गीत सावन के गायें,
चलो सरकार बनायें.
अमर सिंह जी कर रहे तेरह मे से तीन,
मनमोहन निश्चिंत हो ,बजा रहे हैं बीन.
दाल में कुछ है काला,
समर्थन मिलने वाला .
डील डील सब कर रहे ,इसका ओर न छोर,
सिंह मुलायम देखते अमरीका की ओर.
दूर की कौडी लाई
ज़ेब में सी बी आई.
शिरडी पहुंची सोनिया, लेने आशिर्वाद,
जनता भई नाराज तो, आये सांई याद .
बडा गडबड घोटाला,
इलेक्शन आने वाला.
यू पी में हल्ला मचा, हाय हाय चहुं ओर
माल सहारा तोड दे, माया का है ज़ोर.
न लेना इससे पंगा
करा देगी ये दंगा.
साइकल महंगी हो गयी ,इसका क्या है राज ?
दाम तेल के बढ गये, साइकल पर शिवराज.
सी एम अब काम करेगें
कार के दाम गिरेंगे .
मुझसे यूं कहने लगे चिदम्बरम महाराज
महंगा है पेट्रोल तो, होता क्यूं नाराज ?
ज़रा सा पैदल चल ले,
पैर मज़बूत तू कर ले .
राबडी जी कहने लगीं,कर घूंघट की ओट
अगले आम चुनाव में हमको देना वोट .
किचन में आलू होंगे
मिनिस्टर लालू होंगे .
संसद में नारे लगे ,सुन लो माई बाप
आधी महिला सीट हों,आधे पर हों आप .
चेयर पर नारी होगी,
सभी पर भारी होगी.
Sunday, June 29, 2008
जा रहा हूं, मगर लौट कर आऊंगा
जा रहा हूं, मगर लौट कर आऊंगा,
सबसे कहना सही वक्त पर आऊंगा.
मैं जवां हूं, भट्कने में कुछ डर नहीं,
जब भी थक जाऊंगा,अपने घर आऊंगा.
दूर था ,इसलिये सबने देखा नहीं
हर जगह देखना अब नज़र आऊंगा.
जंग छोटी - बडी कोई होती नहीं
जंग जैसी भी हो जीत कर आऊंगा.
चौंकना मत अगर मेरी दस्तक सुनो,
देके आने की पहले खबर ,आऊंगा .
आगे जो भी सफर,होंगे अपने ही पर
पंख थे जो पराये, कतर आऊंगा .
आके वापस दुबारा न जाना पडे,
पूरा करके ही अपना सफर आऊंगा.
**********************************************************
सबसे कहना सही वक्त पर आऊंगा.
मैं जवां हूं, भट्कने में कुछ डर नहीं,
जब भी थक जाऊंगा,अपने घर आऊंगा.
दूर था ,इसलिये सबने देखा नहीं
हर जगह देखना अब नज़र आऊंगा.
जंग छोटी - बडी कोई होती नहीं
जंग जैसी भी हो जीत कर आऊंगा.
चौंकना मत अगर मेरी दस्तक सुनो,
देके आने की पहले खबर ,आऊंगा .
आगे जो भी सफर,होंगे अपने ही पर
पंख थे जो पराये, कतर आऊंगा .
आके वापस दुबारा न जाना पडे,
पूरा करके ही अपना सफर आऊंगा.
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Saturday, June 28, 2008
Friday, June 27, 2008
मैं यहीं हूं, यहीं कहीं हूं
अप्रैल 2007 में चिट्ठाकारी शुरु करने के बाद यह दूसरा मौका है कि मेरे सभी ब्लौग ( भारतीयम, बृजगोकुलम एवं दिल्ली एक्सप्रेस) लगभग दो माह तक नितांत सूने व खामोश रहे.
कारण गिनाने से क्या फायदा? बस यही काफी होगा कि परिवारिक व्यस्ततायें तथा विवश्तायें समय निकालने ही नही देती. हां अभी कुछ और वक़्त लगेगा.
इस बीच यदि ब्लोग से दूर रहा हूं तो समय अन्य कार्यों में लग ही रहा है अत: कुछ खिन्नता तो है पर कुंठा नहीं.
रचनात्मक लेखन, कवि सम्मेलन भी निरंतर जारी हैं.
कुछ यात्रायें भी ,इस बीच, हो गयीं. इन यात्राओं का विवरण भी शीघ्र ही किसी ब्लोग पर आयेगा.
एक अधूरी सी गज़ल अगली पोस्ट में कल ही दूंगा.
जा रहा हूं मगर लौट कर आऊंगा.......
कारण गिनाने से क्या फायदा? बस यही काफी होगा कि परिवारिक व्यस्ततायें तथा विवश्तायें समय निकालने ही नही देती. हां अभी कुछ और वक़्त लगेगा.
इस बीच यदि ब्लोग से दूर रहा हूं तो समय अन्य कार्यों में लग ही रहा है अत: कुछ खिन्नता तो है पर कुंठा नहीं.
रचनात्मक लेखन, कवि सम्मेलन भी निरंतर जारी हैं.
कुछ यात्रायें भी ,इस बीच, हो गयीं. इन यात्राओं का विवरण भी शीघ्र ही किसी ब्लोग पर आयेगा.
एक अधूरी सी गज़ल अगली पोस्ट में कल ही दूंगा.
जा रहा हूं मगर लौट कर आऊंगा.......
Tuesday, April 15, 2008
क़ैसे हुआ प्यार अन्धा ? क़्यों होता है प्यार पागल ? अजब कहानी सुनी पहली बार्
जब भी प्यार का जिक्र आता है, यह ज़ुमला बार बार दोहराया जाता है कि 'प्यार अंधा होता है' (Love is Blind). साथ ही यह भी कहा जाता है कि प्यार में प्रेमी पागल हो जाते हैं. (Love is always accompanied by madness)
इन परिभाषाओं को सिद्ध करने वाली ,एक नहीं अनेक जीवंत घटनायें हमें आये दिन सुनने को मिल जाती है. किंतु ऐसा क्यों होता है? मैने कभी इस को ढूंढने का प्रयास नहीं किया और न ही यह कहीं पढने में आया कि 'प्यार क्यों अंधा होता है' या प्यार में प्रेमी क्यों पागल हो जाते हैं.मनोविज्ञान के विद्यार्थियों को इसका कारण ज़रूर मालूम होगा. परंतु मैने इस का एक विचित्र वर्णन पढा तो मैने सोचा क्यों न इसे औरों को भी बताया जाये.
मेरे एक मित्र हैं डा. क़रण भाटिया.बिजनौर में एक इंजीनीयरिंग कालेज के निदेशक हैं. आई आई टी बम्बई में होस्टल में हम साथ थे. ( शायद पहले भी किसी पोस्ट में जिक्र आया है)वे अक्सर रोचक सामग्री ई-मेल से भेजते रहते हैं.आज एक मेल में उन्होने 'another beutiful story' शीर्षक से जो सामग्री भेजी,मुझे बहुत भाई और हिन्दी में अनुदित करके मैं यहां प्रस्तुत कर रहा हूं.( मैने इसमें थोडा संशोधन अपनी तरफ से भी कर दिया है)
बात तब की है जब ईश्वर ने मनुष्य की रचना नहीं की थी. हां रचने के लिये सारी सामग्री जुटा ली थी. इस सामग्री में बहुत से मानवीय गुण भी थे, जो मनुष्य के शरीर बनाने के बाद उसमें डाले जाने थे.
इन गुणों में घृणा, सुन्दरता, कोमलता, लचीलापन, प्यार, सच, झूठ, मक्कारी, बे ईमानी ,शर्मो-हया, पागलपन, अकुलाहट, धोखा, आदि आदि सारे गुण शामिल थे,जो ईश्वर को भिन्न भिन्न शरीरों में अलग अनुपात में डालने थे.ईश्वर ने उन सबको एक खुले स्थान पर छोड़ दिया और कहा जाओ कुछ देर खेलो.
सारे गुणों ने मिल्कर छुपन-छुपाई (hide & seek) खेलने का फैसला लिया. सभी गुणों को छुपना था और पागलपन् (madness) को ढूंढने का जिम्मा दिया गया.
सच ने कहा वह पेड के पीछे छिपेगा. झूठ ने कहा कि वह चट्टान के पीछे छिपेगा ,किंतु छिपा जाकर तालाब में .घृणा छिपी जाकर झाडी में. इस तरह सभी गुण जाकर छुप गये तो पागलपन उन्हे ढूंढने निकला.
सबसे पहले ज़ाहिर है सच पकडा गया,क्यों कि वह सबके सामने था. प्यार अकेला ऐसा गुण था जो कहीं छुप ही नही पा रहा था. जब कुछ समझ में नहीं आया तो प्यार गुलाब के फूल में जाकर छुप गया. पागलपन ने बडी जुगत लगायी और धीरे धीरे सबको पकड लिया. प्यार तो फूल में छिपा था अत: पकड में नहीं आया.
फिर 'चुगली' ने जाकर चुपचाप पागलपन को बता दिया कि प्यार तो गुलाब के फूल में छिपा है. बस फिर क्या था. पागलपन ने इधर उधर अभिनय करके गुलाब की क्यारी पर छलांग लगा दी. गुलाब के सारे के सारे कांटे प्यार के बदन मे गढ गये ,यहां तक कि कांटे प्यार की आखों में भी चुभ गये और प्यार अन्धा हो गया.
खूब बावेला मचा. कोहराम सुनकर ईश्वर आया तो देखा कि प्यार तो अन्धा हो गया है और उसे कुछ सूझ नहीं रहा है. जब सारी घटना की जानकारी ईश्वर को हुई तो उसने पागलपन को आदेश दिया कि चूंकि तुम्हारे कारण से प्यार अंधा हुआ है अत: इसकी जिम्मेदारी अब तुम्हारी ही है. अब तुम इसे कभी अकेला नहीं छोडोगे, और हमेशा इसके साथ रहोगे.
तब से प्यार के साथ साथ पागल पन भी रहता है.अन्धा तो प्यार हो ही गया था.
इन परिभाषाओं को सिद्ध करने वाली ,एक नहीं अनेक जीवंत घटनायें हमें आये दिन सुनने को मिल जाती है. किंतु ऐसा क्यों होता है? मैने कभी इस को ढूंढने का प्रयास नहीं किया और न ही यह कहीं पढने में आया कि 'प्यार क्यों अंधा होता है' या प्यार में प्रेमी क्यों पागल हो जाते हैं.मनोविज्ञान के विद्यार्थियों को इसका कारण ज़रूर मालूम होगा. परंतु मैने इस का एक विचित्र वर्णन पढा तो मैने सोचा क्यों न इसे औरों को भी बताया जाये.
मेरे एक मित्र हैं डा. क़रण भाटिया.बिजनौर में एक इंजीनीयरिंग कालेज के निदेशक हैं. आई आई टी बम्बई में होस्टल में हम साथ थे. ( शायद पहले भी किसी पोस्ट में जिक्र आया है)वे अक्सर रोचक सामग्री ई-मेल से भेजते रहते हैं.आज एक मेल में उन्होने 'another beutiful story' शीर्षक से जो सामग्री भेजी,मुझे बहुत भाई और हिन्दी में अनुदित करके मैं यहां प्रस्तुत कर रहा हूं.( मैने इसमें थोडा संशोधन अपनी तरफ से भी कर दिया है)
बात तब की है जब ईश्वर ने मनुष्य की रचना नहीं की थी. हां रचने के लिये सारी सामग्री जुटा ली थी. इस सामग्री में बहुत से मानवीय गुण भी थे, जो मनुष्य के शरीर बनाने के बाद उसमें डाले जाने थे.
इन गुणों में घृणा, सुन्दरता, कोमलता, लचीलापन, प्यार, सच, झूठ, मक्कारी, बे ईमानी ,शर्मो-हया, पागलपन, अकुलाहट, धोखा, आदि आदि सारे गुण शामिल थे,जो ईश्वर को भिन्न भिन्न शरीरों में अलग अनुपात में डालने थे.ईश्वर ने उन सबको एक खुले स्थान पर छोड़ दिया और कहा जाओ कुछ देर खेलो.
सारे गुणों ने मिल्कर छुपन-छुपाई (hide & seek) खेलने का फैसला लिया. सभी गुणों को छुपना था और पागलपन् (madness) को ढूंढने का जिम्मा दिया गया.
सच ने कहा वह पेड के पीछे छिपेगा. झूठ ने कहा कि वह चट्टान के पीछे छिपेगा ,किंतु छिपा जाकर तालाब में .घृणा छिपी जाकर झाडी में. इस तरह सभी गुण जाकर छुप गये तो पागलपन उन्हे ढूंढने निकला.
सबसे पहले ज़ाहिर है सच पकडा गया,क्यों कि वह सबके सामने था. प्यार अकेला ऐसा गुण था जो कहीं छुप ही नही पा रहा था. जब कुछ समझ में नहीं आया तो प्यार गुलाब के फूल में जाकर छुप गया. पागलपन ने बडी जुगत लगायी और धीरे धीरे सबको पकड लिया. प्यार तो फूल में छिपा था अत: पकड में नहीं आया.
फिर 'चुगली' ने जाकर चुपचाप पागलपन को बता दिया कि प्यार तो गुलाब के फूल में छिपा है. बस फिर क्या था. पागलपन ने इधर उधर अभिनय करके गुलाब की क्यारी पर छलांग लगा दी. गुलाब के सारे के सारे कांटे प्यार के बदन मे गढ गये ,यहां तक कि कांटे प्यार की आखों में भी चुभ गये और प्यार अन्धा हो गया.
खूब बावेला मचा. कोहराम सुनकर ईश्वर आया तो देखा कि प्यार तो अन्धा हो गया है और उसे कुछ सूझ नहीं रहा है. जब सारी घटना की जानकारी ईश्वर को हुई तो उसने पागलपन को आदेश दिया कि चूंकि तुम्हारे कारण से प्यार अंधा हुआ है अत: इसकी जिम्मेदारी अब तुम्हारी ही है. अब तुम इसे कभी अकेला नहीं छोडोगे, और हमेशा इसके साथ रहोगे.
तब से प्यार के साथ साथ पागल पन भी रहता है.अन्धा तो प्यार हो ही गया था.
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Philosophy,
दर्शन,
प्यार
Friday, April 11, 2008
तिब्बतियों से एक सवाल
मैं उन सभी तिब्बतियों से एक सवाल पूछना चाहता हूं जो चीन में आयोजित होने वाले ओलम्पिक खेलो का विरोध कर रह्वे है. आखिर उन्हें अपने एक राजनैतिक प्रश्न को लेकर ओलम्पिक खेलों के प्रति विरोध करने का क्या अधिकार है?
तिब्बत में मानवाधिकार का प्रश्न एक अलग प्रश्न है . ओलम्पिक खेलों का आयोजन इससे बिलकुल अलग देखा जाना चाहिये.
ओलम्पिक खेलों का आयोजन का एक पवित्र लक्ष्य है,जिसका राजनीति से कोई सम्बन्ध नही है.यह एक संयोग हो सकता है कि इस वर्ष ओलम्पिक खेलों का आयोजन चीन में हो रहा है . ओलम्पिक खेलों पर किसी एक देश का एकाधिकार नही है. ये खेल समूचे विश्व के खेल हैं. इनका आयोजन एक पवित्र लक्ष्य को लेकर ही होता आया है.
चीन का शासक कौन है ? वहां क्या शासन प्रणाली है?
चीन के शासकों के सम्बन्ध वहां की प्रजा से कैसे हैं और कैसे होने चाहिये. चीन के एक प्रांत तिब्बत में क्या राजनैतिक समस्या है ? उसका क्या हल है? आदि आदि ... अनेकों प्रश्न ऐसे हैं जिन पर अलग अलग लोगों की राय अलग भी हो सकती है?
परंतु इन सभी प्रश्नों को ओलम्पिक के आयोजन से कदापि नही जोडा जाना चाहिये.
ओलम्पिक की मशाल की अपनी एक महत्ता है. राजनैतिक प्रश्नों को बीच में ला कर ओलम्पिक की भावना से खिल्वाड किया जा रहा है, यह गलत है. इसकी निन्दा व भर्त्सना की जानी चाहिये.
मैं सभी तिब्बतियों से अपील करता हूं कि वह ओलम्पिक मशाल के विरुद्ध अपना आन्दोलन वापस ले लें.उनके सभी प्रश्न ज़ायज़ हैं, उन पर पूरे विश्व का ध्यान आकर्षित हो चुका है. उन पर विचार किया जाना चाहिये. चीन सरकार को इसका हल निकालना चाहिये. परंतु ओलम्पिक खेलों में इस प्रश्न को लेकर विघ्न डालना ठीक नहीं .यदि खेलों पर इस विरोध की काली छाया असर डालती है, तो सबसे ज्यादा असर खिलाडियों पर ही पडेगा, जिन्होने पिछले चार वर्ष सिर्फ खेलों की तैयारियों मे ही लगायें हैं.
तिब्बत में मानवाधिकार का प्रश्न एक अलग प्रश्न है . ओलम्पिक खेलों का आयोजन इससे बिलकुल अलग देखा जाना चाहिये.
ओलम्पिक खेलों का आयोजन का एक पवित्र लक्ष्य है,जिसका राजनीति से कोई सम्बन्ध नही है.यह एक संयोग हो सकता है कि इस वर्ष ओलम्पिक खेलों का आयोजन चीन में हो रहा है . ओलम्पिक खेलों पर किसी एक देश का एकाधिकार नही है. ये खेल समूचे विश्व के खेल हैं. इनका आयोजन एक पवित्र लक्ष्य को लेकर ही होता आया है.
चीन का शासक कौन है ? वहां क्या शासन प्रणाली है?
चीन के शासकों के सम्बन्ध वहां की प्रजा से कैसे हैं और कैसे होने चाहिये. चीन के एक प्रांत तिब्बत में क्या राजनैतिक समस्या है ? उसका क्या हल है? आदि आदि ... अनेकों प्रश्न ऐसे हैं जिन पर अलग अलग लोगों की राय अलग भी हो सकती है?
परंतु इन सभी प्रश्नों को ओलम्पिक के आयोजन से कदापि नही जोडा जाना चाहिये.
ओलम्पिक की मशाल की अपनी एक महत्ता है. राजनैतिक प्रश्नों को बीच में ला कर ओलम्पिक की भावना से खिल्वाड किया जा रहा है, यह गलत है. इसकी निन्दा व भर्त्सना की जानी चाहिये.
मैं सभी तिब्बतियों से अपील करता हूं कि वह ओलम्पिक मशाल के विरुद्ध अपना आन्दोलन वापस ले लें.उनके सभी प्रश्न ज़ायज़ हैं, उन पर पूरे विश्व का ध्यान आकर्षित हो चुका है. उन पर विचार किया जाना चाहिये. चीन सरकार को इसका हल निकालना चाहिये. परंतु ओलम्पिक खेलों में इस प्रश्न को लेकर विघ्न डालना ठीक नहीं .यदि खेलों पर इस विरोध की काली छाया असर डालती है, तो सबसे ज्यादा असर खिलाडियों पर ही पडेगा, जिन्होने पिछले चार वर्ष सिर्फ खेलों की तैयारियों मे ही लगायें हैं.
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Tibbet,
Torch
आपका दिल कहां है ?
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