Saturday, September 5, 2009

कौवों के कोसने के गायें नहीं मरा करती उर्फ भाजपा को गाली देना एक शगल क्यों बनता जा रहा है?

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सबसे पहले एक शाकाहारी स्पष्टीकरण. फिलहाल मैं भाजपा का कोई प्रवक्ता नहीं हूं .अपने ब्लोग को दलगत राजनीति से दूर रखने की भरसक कोशिश की है. हालांकि कभी कभार छुट्पुट टिप्पणियां ज़रूर की होंगी. यह स्पष्टीकरण इसलिये आवश्यक है कि इस पोस्ट को सही परिप्रेक्ष्य में देखा जाये.

प्रतिक्रियावश इस पोस्ट को लिखने की आवश्यकता क्यों पड़ी फिलहाल इसका ज़िक्र मैं अभी न उचित समझता हूं और न आवश्यक .
जब प्रधान मंत्री मन मोहन सिंह ने भाजपा में चल रही उठापटक पर चिंता जताई थी तो वह ( सम्भवत: ) एक आम भारतीय की पीड़ा को ही व्यक्त कर र्हे होंगे,ऐसा मेरा मानना है. हालांकि भाजपाई अध्यक्ष को वह नागवार गुजरा. मैं भले ही भाजपा का सदस्य नहीं हूं पर प्रधान मंत्री मन मोहन सिंह की ही भांति मानता हूं कि लोकतंत्र को स्वस्थ बनाये रखने के लिये मुख्य विपक्षी दल का मज़बूत रहना भी ज़रूरी है.

भाजपा में जूतों में दाल बंट रही है .इसे सब ने ही देखा है. इसकी तुलना महाभारत से की जाये या गली-मुहल्ले के स्तर वाली घटिया गुटबाजी से, यह अपनी अपनी सोच है. किंतु जहां एक ओर प्रधान मंत्री मन मोहन सिंह जैसी सोच है , वहीं दूसरी ओर इस जूतम पैज़ार पर चटकारे लेने वालों की भी कमी नहीं है.

भारत में केन्द्रीय स्तर की दलीय् राजनीति सिद्धांतत: अभी भी इतनी परिपक्व नहीं है, कि विचारधारा के आधार पर ध्रुवीकरण हो. पिछले 20- 22वर्षों से प्रदेशों में व केन्द्र में खिचडी सरकारों का ही प्रभुत्व रहा है. इससे न भाजपा अछूती रही न कांग्रेस और न ही कम्युनिस्ट. सबने बहती गंगा में हाथ धोये हैं.

कमोबेश सबही दलों में सिर फुटौव्वल के दौर चले हैं ,सभी दलों में टूट-फूट भी हुई है. सभी ने विचारधारा को ( और कहीं कहीं तो देश की अस्मिता को भी) ताक पर रख कर समझोते किये हैं. ज़िक्र न भी किया जाये तो सभी ऐसे उदाहरणों के वाक़िफ हैं. एक हाथ से दोस्ती और दूसरी से पीठ में छुरा भोंकने वाले एक नहीं कई कई उदाहरण सामने आये हैं. और कोई भी दल , हां हां कोई भी, इसका अपवाद नहीं है.

जैसा कि मैने पहले कहा, भाजपा को गाली देना एक शगल बनता जा रहा है, विशेषकर तथाकथित प्रबुद्ध, प्रगतिवादी, आदि आदि कहलाना पसन्द करने वालों में.

इन सभी से एक गुज़ारिश है. भैया जी, पहले तनिक अपने गिरेबान में भी झांको न . पर उपदेश कुशल बहुतेरे.
किंतु सच्चाई यह है कि कौवों के कोसने के गायें नहीं मरा करती.
भाजपा का सदस्य अथवा प्रवक्ता न होते हुए भी मैं आशावान हूं कि वह एक बार फिर पटरी पर आयेगी तथा भारतीय लोकतंत्र आने वाले वर्षों में और भी मज़बूत होगा.
आमीन.

5 comments:

Dr. Kumarendra Singh Sengar said...

जैसा कि मैने पहले कहा, भाजपा को गाली देना एक शगल बनता जा रहा है, विशेषकर तथाकथित प्रबुद्ध, प्रगतिवादी, आदि आदि कहलाना पसन्द करने वालों में.

इन सभी से एक गुज़ारिश है. भैया जी, पहले तनिक अपने गिरेबान में भी झांको न . पर उपदेश कुशल बहुतेरे.
किंतु सच्चाई यह है कि कौवों के कोसने के गायें नहीं मरा करती.
भाजपा का सदस्य अथवा प्रवक्ता न होते हुए भी मैं आशावान हूं कि वह एक बार फिर पटरी पर आयेगी तथा भारतीय लोकतंत्र आने वाले वर्षों में और भी मज़बूत होगा.
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AAPKA YAHI KAH DENA HI SAB KUCHH KAHTAA HAI.

संजय बेंगाणी said...

कौवों के कोसने के गायें नहीं मरा करती.

सटीक कहावत है.

अरविन्द चतुर्वेदी Arvind Chaturvedi said...

डा. सेंगर,
आपने मेरी बात पसन्द की, धन्यवाद.

अरविन्द चतुर्वेदी Arvind Chaturvedi said...

@संजय भाई,
और मैने बिना किसी का भी नाम लिये अपनी बात कह दी.
धन्यवाद्

aditya kumar gupta said...

Very Nice said.....